लेखिका: रुबाब फ़ातिमा
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | वह गुलिस्ताँ जो कभी फूलों से महकता था, आज ख़ून की सुर्ख़ी में डूबा हुआ दिखाई देता है। अम्न का पैग़ाम, इस्तिक़ामत का जज़्बा, मज़लूमों की आवाज़ और उम्मत की ढाल, सब एक ऐसी अज़ीम शख़्सियत से वाबस्ता थे जिसकी पूरी ज़िंदगी राह-ए-ख़ुदा में मुजाहिदत और क़ुर्बानी से इबारत थी।
ऐसी अज़ीम हस्ती के बारे में क़लम लिखने से आज़िज़ महसूस होता है, जिसने ज़ुल्म-ओ-सितम और हर तरह की मुश्किलात का डट कर मुक़ाबला किया, मगर कभी हक़ के ख़िलाफ़ ज़बान न खोली। उन्होंने हमेशा बातिल को ललकारा और हर दौर के यज़ीदों की नींदें हराम की रखीं।
ऐ हमारे रहबर-ए-शहीद! हमें आप से बे-हद मुहब्बत है, क्योंकि आप के वुजूद से एक रूहानी बाप की शफ़क़त और सरपरस्ती का एहसास वाबस्ता था, जो हमारे दिलों को सुकून बख़्शता था। आज ऐसा महसूस होता है जैसे हम एक अज़ीम रहबर और शफ़ीक़ बाप से महरूम हो गए हों। लेकिन आप का पैग़ाम "बायद बरख़ास्त" (क़ियाम लाज़िम है) हमारे दिलों में हमेशा ज़िंदा रहेगा।
आज भी हक़ और बातिल का मुआरका बरपा है, यह हुसैनियत और यज़ीदियत की कशमकश है। वाक़ेया-ए-आशूरा का सबसे पहला सबक यही है कि दीन-ए-ख़ुदा की सरबुलंदी के लिए हर क़ुर्बानी पेश की जाए और हक़ के लिए डट कर खड़ा हुआ जाए।
इमाम हुसैन (अ.) ने अपने एक ख़ुत्बे में उम्मत-ए-मुस्लिमा को मुख़ातिब करते हुए फ़रमाया कि ऐ लोगो! अगर तुम मेरी तहरीक की हक़ीक़त और मक़सद को समझना चाहते हो, अगर तुम इस्लाम के अहकाम और ख़ुदा की शरीअत को जानना चाहते हो, तो मेरे क़ियाम के मक़सद को समझो।
उसी हुसैनी फ़िक्र ने हर दौर के हक़-परस्तों को बेदार किया और उसी से शहीद रहबर ने अपनी इंक़लाबी जद्दोजहद को क़ुव्वत बख़्शी। आज भी ज़ुल्म बर-सर-ए-इक़्तिदार है, और निगाहें एक ऐसे हुसैनी अज़्म के हामिल रहबर की तलाश में हैं जो हक़ का परचम बुलंद रखे।
शहीद रहबर ने अपनी पूरी ज़िंदगी तहरीक-ए-हुसैनी के लिए वक़्फ़ कर दी। उन्होंने कभी ज़ालिम के सामने सर-ए-तस्लीम ख़म नहीं किया, बल्कि अपने अमल से उस फ़रमान-ए-इमाम हुसैन (अ.) की तफ़सीर बन गए:
"मिस्ली ला युबायेउ मिस्लेह"
(मुझ जैसा, उस जैसे की बैअत नहीं कर सकता।)
यही क़ियाम-ए-हुसैनी था जिसने शहीद रहबर को सरबुलंदी अता की। उन्होंने अपने अज़ीज़ों की क़ुर्बानियाँ पेश कीं, ख़ुद भी मकतब-ए-हुसैनी के लिए हर इम्तिहान क़बूल किया, लेकिन हक़ के क़ियाम से कभी दस्त-बरदार न हुए।
आज दुनिया देख चुकी है कि ज़ुल्म के मुक़ाबिल खड़े होने वाले कमज़ोर नहीं होते, बल्कि हर आज़माइश के बाद पहले से ज़्यादा मज़बूत हो जाते हैं। दुश्मन ने लुबनान, ईरान, पाकिस्तान और दीगर मक़ामात पर हर मुमकिन कोशिश की कि हुसैनी फ़िक्र को शिकस्त दे, मगर वह अपने मक़सद में कामयाब न हो सका। बल्कि शहीद रहबर के ख़ून ने अहल-ए-हक़ को पहले से ज़्यादा मुत्तहिद कर दिया और दुश्मन के मुँह पर एक और कारी ज़र्ब साबित कर दी।
शहीद रहबर ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हों तक अपनी बंद मुठ्ठी के ज़रीए पूरी दुनिया को यही पैग़ाम दिया:
"बायद बरख़ास्त"
"क़ियाम लाज़िम है।"
वह शमा थी जो अंधेरों से लड़ती रही,
बुझाई गई तो हज़ारों दिलों में जलती रही।
ख़ून के हर क़तरे से एक सदा आती है,
"बरख़ास्त! बरख़ास्त!" की निदा आती है।
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