रविवार 28 जून 2026 - 18:58
बारह मुहर्रम: कूफ़ा में असीरान-ए-अहले बैत अलैहिमुस्सलाम का प्रवेश और हक़ की पहली फ़तह

हौज़ा / 12 मुहर्रम 61 हिजरी की सुबह अहले हरम का काफ़िला शहर-ए-कूफ़ा में दाख़िल हुआ। कूफ़ा वही शहर था जिसने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महान, वफ़ादार और जान निसार साथियों को जन्म दिया था, लेकिन अब उसी शहर के माथे पर अहदशिकनी और बेवफ़ाई का ऐसा दाग़ लग चुका था जो तारीख़ के सफ़हों पर हमेशा के लिए दर्ज हो गया। आज यही शहर उस काफ़िले का इस्तक़बाल कर रहा था जो कर्बला की अज़ीम क़ुर्बानी, सब्र व इस्तिक़ामत और बेमिसाल मज़लूमियत की दास्तान अपने साथ लेकर आया था।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,12 मुहर्रम 61 हिजरी की सुबह अहले हरम का काफ़िला शहर-ए-कूफ़ा में दाख़िल हुआ। कूफ़ा वही शहर था जिसने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महान, वफ़ादार और जान निसार साथियों को जन्म दिया था, लेकिन अब उसी शहर के माथे पर अहदशिकनी और बेवफ़ाई का ऐसा दाग़ लग चुका था जो तारीख़ के सफ़हों पर हमेशा के लिए दर्ज हो गया। आज यही शहर उस काफ़िले का इस्तक़बाल कर रहा था जो कर्बला की अज़ीम क़ुर्बानी, सब्र व इस्तिक़ामत और बेमिसाल मज़लूमियत की दास्तान अपने साथ लेकर आया था।

सिर्फ़ चालीस दिन पहले यही कूफ़ा हज़रत मुस्लिम बिन अक़ील अलैहिस्सलाम और हज़रत हानी बिन उरवा अलैहिस्सलाम की मज़लूमाना शहादत का गवाह बना था। 9 ज़िलहिज्जा को इन दोनों अज़ीम हस्तियों के सर तन से जुदा कर दिए गए और उनके जिस्मों को इबरत के तौर पर सूली पर लटका दिया गया।

यही वह शहर था जिसके हज़ारों बाशिंदों ने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को ख़ुतूत लिखकर मदद की दावत दी थी, लेकिन फिर उन्हीं में से बहुत से लोग हुकूमत-ए-वक़्त के दबाव, ख़ौफ़ या दुनियातलबी के कारण यज़ीद की फ़ौज में शामिल हो गए और फ़रज़ंद-ए-रसूल के मुक़ाबले में सफ़-आरा हो गए।

हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा के लिए कूफ़ा कोई अजनबी शहर नहीं था। आपने 37 से 40 हिजरी तक अपने वालिद-ए-माजिद अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम के दौर-ए-ख़िलाफ़त में इसी शहर में क़ियाम फ़रमाया था। इमाम अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद अहले बैत अलैहिमुस्सलाम मदीना वापस तशरीफ़ ले गए थे, मगर कूफ़ियों की बेवफ़ाई और अहदशिकनी के तल्ख़ वाक़िआत हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की यादों में महफ़ूज़ थे।

अगरचे तारीख़ में कूफ़ा का नाम अहदशिकनी के हवाले से मशहूर हुआ, लेकिन इल्मी, फ़िक्री और तहज़ीबी एतबार से यह शहर शाम से बिल्कुल मुख़्तलिफ़ था। यही वह शहर था जहाँ अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम के ख़ुत्बे गूँजते रहे, जहाँ इमाम हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम की तालीमात लोगों ने सुनीं, और जहाँ अहले बैत अलैहिमुस्सलाम की मुहब्बत बहुत से दिलों में ज़िंदा थी।

यही वजह थी कि बहुत से कूफ़ियों के दिल हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथ थे, अगरचे उनकी तलवारें आपके ख़िलाफ़ उठ चुकी थीं। इस हक़ीक़त को मशहूर शायर फ़रज़दक ने बहुत मुख़्तसर मगर जामे अल्फ़ाज़ में यूँ बयान किया:

लोगों के दिल इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथ हैं, मगर उनकी तलवारें आपके ख़िलाफ़ हैं।

इसी ख़ुसूसियत के कारण कूफ़ा में हालात और अवामी जज़्बात बहुत तेज़ी से बदलते थे। चुनाँचे कुछ ही अरसे बाद यही शहर गिरया-ओ-ज़ारी, नदामत, पशेमानी और तौबा की अलामत बन गया।

कूफ़ा की फ़िज़ा

असीरान-ए-कर्बला के क़ाफ़िले को सुबह-सवेरे शहर-ए-कूफ़ा में दाख़िल किया गया। उमर बिन सअद मलऊन इससे पहले ही अपनी फ़ौज के साथ कूफ़ा पहुँच चुका था। पूरे शहर में कड़ी निगरानी थी और चारों ओर हुकूमती सिपाही तैनात थे, ताकि किसी भी तरह की प्रतिक्रिया सामने न आ सके।

लोग एक-दूसरे से पूछ रहे थे, "ये किस क़बीले और किस इलाक़े के क़ैदी हैं?"

जवाब मिलता, "ये आले मुहम्मद अलैहिमुस्सलाम के असीर हैं।"

उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद मलऊन के हुक्म पर असीरान-ए-अहले बैत और शोहदाए कर्बला के मुक़द्दस सरों को शहर के बाज़ारों और चौराहों में घुमाया जा रहा था। इन मुक़द्दस सरों को अलग-अलग नेज़ा-बरदारों के हवाले कर दिया गया था, ताकि हुकूमत अपनी तथाकथित फ़तह का प्रदर्शन कर सके और लोगों के दिलों में ख़ौफ़ व दहशत बैठा दे।

उस समय कूफ़ा का मंज़र बड़ा अजीब था। एक गिरोह ज़ुल्म व सितम के इस दर्दनाक अंजाम पर अश्कबार था, दूसरा गिरोह हुकूमती प्रोपेगंडे के असर में खुशियाँ मना रहा था, जबकि एक बड़ी तादाद हैरत, ख़ौफ़ और ख़ामोशी के आलम में इस हृदयविदारक दृश्य को देख रही थी।

सहल बिन हबीब शहरज़ूरी बयान करते हैं:

"मैं उस साल मक्का मुअज़्ज़मा से लौट रहा था। जब कूफ़ा पहुँचा तो देखा कि शहर की फ़िज़ा बिल्कुल बदली हुई है। बाज़ार और दुकानें बंद थीं। लोग गिरोह-दर-गिरोह जमा थे। कुछ लोग एक-दूसरे को मुबारकबाद दे रहे थे, जबकि कुछ अश्कबार आँखों के साथ ताज़ियत कर रहे थे। मैंने एक बुज़ुर्ग से पूछा, 'यह क्या मामला है?' उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, मुझे एक तरफ़ ले गए और धीमी आवाज़ में कहा, 'हमारे लिए कोई ईद नहीं है। दो लश्कर आमने-सामने आए थे। इब्ने ज़ियाद का लश्कर ग़ालिब आ गया और हुसैन बिन अली अलैहिस्सलाम के लश्कर को शहीद कर दिया गया। ख़ुदा करे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का मुक़द्दस सर हमारे शहर में न लाया जाए।'"

इतना कहते ही वह शिद्दत-ए-ग़म से रो पड़े। अभी उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक नक़्क़ारों की आवाज़ें गूँज उठीं, परचम लहराने लगे और उमर बिन सअद मलऊन का लश्कर फ़ातिहाना अंदाज़ में शहर में दाख़िल हो गया।

दारुल इमारा की ओर प्रस्थान

जब असीरान-ए-कर्बला के क़ाफ़िले को दारुल इमारा की ओर ले जाया गया, तो रास्ते के दोनों ओर हज़ारों लोग खड़े थे। शहर की मुख्य सड़कों, बाज़ारों और चौराहों को सजाया गया था। दारुल इमारा की इमारत की दीवारों की मरम्मत कराकर उन पर नया रंग-रोगन कराया गया था, ताकि हुकूमत अपनी तथाकथित फ़तह का प्रदर्शन कर सके।

अहले बैत अलैहिमुस्सलाम के लिए यह दृश्य एक नई आज़माइश था। चारों ओर तमाशबीनों की नज़रें थीं, नेज़ों पर शोहदाए कर्बला के मुक़द्दस सर बुलंद थे, मुसल्लह सिपाहियों का घेरा था और बेबसी का आलम था। लेकिन इसके बावजूद अहले बैत अलैहिमुस्सलाम ने सब्र, वक़ार और अज़मत का दामन नहीं छोड़ा।

इसी मौक़े पर हज़रत उम्मे कुलसूम सलामुल्लाह अलैहा ने बुलंद आवाज़ में अहले कूफ़ा को मुख़ातिब करते हुए फ़रमाया:

"ऐ अहले कूफ़ा! क्या तुम्हें अल्लाह और उसके रसूल से शर्म नहीं आती कि तुम रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के अहले हरम को इस हालत में देख रहे हो?"

असीरान-ए-कर्बला का क़ाफ़िला अभी कूफ़ा की गलियों से गुज़र ही रहा था कि एक अत्यंत दर्दनाक दृश्य सामने आया। कुछ लोग, जो अहले बैत अलैहिमुस्सलाम की वास्तविक पहचान से पूरी तरह परिचित नहीं थे, असीर बच्चों पर तरस खाकर उनके लिए रोटियाँ, खजूर और अखरोट लेकर आए और उन्हें बाँटने लगे।

हज़रत उम्मे कुलसूम सलामुल्लाह अलैहा और हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा ने तुरंत बच्चों के हाथों से वे चीज़ें लेकर ज़मीन पर डाल दीं, ताकि कोई बच्चा सदक़ा न खा ले। फिर हज़रत उम्मे कुलसूम सलामुल्लाह अलैहा ने रिक़्क़त-भरी आवाज़ में फ़रमाया:

"ऐ अहले कूफ़ा! क्या तुम नहीं जानते कि सदक़ा हम अहले बैत पर हराम है?"

यह जुमला सुनते ही बहुत से लोगों पर हक़ीक़त वाज़ेह हो गई। वे बेइख़्तियार रो पड़े और अपने किए पर नदामत का इज़हार करने लगे।

हज़रत उम्मे कुलसूम सलामुल्लाह अलैहा ने आगे फ़रमाया:

"तुम्हारे मर्दों ने हमारे अज़ीज़ों को क़त्ल किया है, और आज तुम्हारी औरतें हम पर गिरया कर रही हैं!"

ये अल्फ़ाज़ अहले कूफ़ा के दिलों पर बिजली बनकर गिरे। बहुत से लोग सिसकियाँ भरने लगे और चारों ओर गिरया-ओ-ज़ारी की आवाज़ें बुलंद होने लगीं।

हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम शदीद बुख़ार में मुब्तला थे। आपके हाथों और गर्दन में ज़ंजीरें थीं, लेकिन इस जिस्मानी कमज़ोरी के बावजूद आपकी रूहानी अज़मत और वक़ार में कोई कमी नहीं आई थी।

जब आपने लोगों को रोते हुए देखा, तो निहायत दर्द भरे लहजे में फ़रमाया:

"अगर तुम हमारे हाल पर रो रहे हो, तो फिर हमें क़त्ल किसने किया?"

यह मुख़्तसर, मगर बेहद गहरा सवाल अहले कूफ़ा के ज़मीर को झकझोर देने के लिए काफ़ी था। बहुत से लोगों के पास इसका कोई जवाब नहीं था। वे शर्मिंदगी से सिर झुकाए खड़े रहे।

असीरान-ए-अहले बैत अलैहिमुस्सलाम के साथ कर्बला से लौटने वाले मुसल्लह सिपाही भी चल रहे थे, ताकि लोगों को यह यक़ीन दिलाया जा सके कि उन्होंने कोई बहुत बड़ी फ़तह हासिल की है। वास्तव में इस पूरे इंतिज़ाम का मक़सद अहले कूफ़ा को ख़ौफ़ज़दा रखना और किसी भी संभावित एहतिजाज को दबाना था।

यद्यपि यह मानना कठिन है कि कूफ़ा के सभी निवासी वाक़िआ-ए-कर्बला से पूरी तरह बेख़बर थे, क्योंकि कूफ़ा और कर्बला के बीच लगातार आवाजाही रहती थी और ख़बरें बहुत जल्दी पूरे शहर में फैल जाती थीं। फिर भी शहर में बाहरी इलाक़ों से आए ऐसे लोग भी मौजूद थे जो इस दर्दनाक हादसे से अनजान थे। जब उन्हें मालूम हुआ कि ये क़ैदी रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के अहले बैत हैं, तो उन पर रिक़्क़त तारी हो गई और वे बेइख़्तियार अश्क बहाने लगे।

हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा का ऐतिहासिक ख़ुत्बा

हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा का यह ख़ुत्बा तारीख़-ए-इस्लाम के महानतम ख़ुत्बों में शुमार किया जाता है। आपने यह ख़ुत्बा ऐसे नाज़ुक और कठिन हालात में इरशाद फ़रमाया, जब चारों ओर दुश्मन की तलवारें थीं और अहले बैत अलैहिमुस्सलाम मुसल्लह फ़ौजियों के घेरे में थे।

इस ख़ुत्बे के समय वाक़िआ-ए-कर्बला को केवल दो दिन गुज़रे थे। आप अपने भाई, भतीजों, बेटों और अज़ीज़ों के ग़म से निढाल थीं। शोहदाए कर्बला अलैहिमुस्सलाम के मुक़द्दस सर नेज़ों पर बुलंद थे और आपकी निगाहों के सामने थे। हज़ारों सिपाही चारों ओर पहरा दे रहे थे। इब्ने ज़ियाद मलऊन का दरबार असीरों की आमद का इंतज़ार कर रहा था और भविष्य प्रत्यक्ष रूप से अत्यंत संकटपूर्ण दिखाई दे रहा था। शहर में शोर, भीड़, घोड़ों की टापों और सिपाहियों की आवाज़ों के कारण बोलना भी आसान नहीं था।

ऐसे हंगामाखेज़ माहौल में ज़ीनत ए ख़तीबे मिंबर-ए-सलूनी हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा ने हाथ के इशारे से लोगों को ख़ामोश रहने का हुक्म दिया। तारीख़ बयान करती है कि देखते-ही-देखते सारा शोर थम गया और चारों ओर गहरी ख़ामोशी छा गई।

बशीर बिन ख़ुज़ैम असदी कहते हैं:

"ख़ुदा की क़सम! मैंने हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा से ज़्यादा वक़ार वाली, पाकदामन, फ़सीह और बलीग़ ख़ातून नहीं देखी। ऐसा महसूस होता था मानो अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम स्वयं ख़िताब फ़रमा रहे हों।"

हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने अल्लाह तआला की हम्द-ओ-सना और रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम पर दुरूद व सलाम भेजने के बाद अहले कूफ़ा को मुख़ातिब करते हुए फ़रमाया:

"ऐ अहले कूफ़ा! ऐ मक्र, फ़रेब और अहदशिकनी करने वालो! क्या तुम रोते हो? ख़ुदा करे तुम्हारी आँखों के आँसू कभी न सूखें और तुम्हारी आहें कभी समाप्त न हों।"

फिर आपने फ़रमाया:

"तुम्हारी मिसाल उस औरत जैसी है जिसने बड़ी मेहनत से सूत काता, उसे मज़बूती से बुना और फिर स्वयं ही उसे टुकड़े-टुकड़े कर दिया। तुमने भी अपने अहद-ओ-पैमान को धोखे और फ़रेब का ज़रिया बना लिया।"

इसके बाद आपने अहले कूफ़ा की अख़लाक़ी गिरावट और बेवफ़ाई का वर्णन करते हुए फ़रमाया:

"तुम्हारे भीतर बेहयाई, अहदशिकनी, चापलूसी, मुनाफ़िक़त और ज़िल्लत के सिवा कौन-सी ख़ूबी बाक़ी रह गई है? तुम उस हरियाली की तरह हो जो गंदगी पर उगती है, या उस क़ब्र की तरह जिसे ऊपर से सजा दिया जाए, जबकि उसके भीतर सड़ती हुई लाश हो।"

फिर अत्यंत दर्दभरे अंदाज़ में फ़रमाया:

"तुमने अपने लिए बहुत बुरा ज़खीरा तैयार किया है। तुमने अल्लाह के ग़ज़ब को मोल ले लिया है और हमेशा की ज़िल्लत अपने नाम कर ली है।"

इसके बाद हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की आवाज़ और बुलंद हुई। आपने फ़रमाया:

"खूब रोओ, क्योंकि तुम इसी के मुस्तहिक़ हो। ज़्यादा रोओ और कम हँसो, क्योंकि तुमने अपने दामन पर ऐसा नंग-ओ-आर ले लिया है जो कभी धुल नहीं सकता।"

अपने ख़ुत्बे को जारी रखते हुए आपने अहले कूफ़ा को उनके महान अपराध की गंभीरता का एहसास दिलाते हुए फ़रमाया:

"तुमने ख़ातिमुल अंबिया सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के नवासे, जन्नत के जवानों के सरदार, वही व रिसालत के घराने के चश्म-ओ-चराग़ और उम्मत के चिराग़-ए-हिदायत को शहीद कर दिया। तुमने उस हस्ती का ख़ून बहाया जो मुसीबतों में तुम्हारा सहारा, मुश्किलों में तुम्हारी पनाह और हिदायत का रौशन मीनार थी।"

फिर अत्यंत जलाल और हैबत के साथ फ़रमाया:

"तुम्हारी तमाम कोशिशें अकारथ हो गईं। तुम्हारा सौदा घाटे का साबित हुआ। तुम अल्लाह के ग़ज़ब के मुस्तहिक़ ठहरे और ज़िल्लत व रुसवाई तुम्हारा मुक़द्दर बन गई। तुमने ऐसा भयानक जुर्म किया है कि क़रीब है आसमान फट पड़े, ज़मीन शक़ हो जाए और पहाड़ चूर-चूर हो जाएँ।"

इसके बाद हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा ने अत्यंत दर्दभरे लहजे में फ़रमाया:

"क्या तुम जानते हो कि तुमने रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम के किस जिगर के टुकड़े को शहीद किया है? किस हुरमत को पामाल किया है? और किस पाकीज़ा ख़ून को ज़मीन पर बहाया है?"

फिर अहले कूफ़ा को तनबीह करते हुए फ़रमाया:

"अल्लाह तआला की दी हुई मोहलत तुम्हें धोखे में न डाले। अल्लाह मुजरिमों को तुरंत सज़ा नहीं देता, लेकिन वह मज़लूम के ख़ून का इंतिक़ाम ज़रूर लेता है। हमारा परवरदिगार हम पर भी निगहबान है और तुम पर भी।"

यह ऐतिहासिक ख़ुत्बा समाप्त हुआ तो पूरा मजमा अश्कबार हो गया। चारों ओर गिरया-ओ-ज़ारी की आवाज़ें बुलंद होने लगीं। औरतें नौहा व मातम करने लगीं, अपने सिर और चेहरे पीटने लगीं, जबकि मर्द एक-दूसरे को मलामत करते और अपने किए पर गहरे अफ़सोस का इज़हार करने लगे।

कुछ ही क्षण पहले तक जो लोग इस क़ाफ़िले को एक शिकस्त-ख़ुर्दा गिरोह समझ रहे थे, अब उनकी निगाहें बदल चुकी थीं। अहले कूफ़ा के दिलों में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मुहब्बत और एहतराम पहले से कहीं अधिक गहरा हो गया, जबकि उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद मलऊन नफ़रत और मलामत का प्रतीक बनता जा रहा था।

बशीर बिन ख़ुज़ैम असदी बयान करते हैं:

"ख़ुदा की क़सम! जब हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने अपना ख़ुत्बा समाप्त किया, तो बूढ़े, जवान, मर्द और औरतें—सभी ज़ार-ओ-क़तार रोने लगे। मैंने अपने क़रीब एक बुज़ुर्ग को देखा, जिसकी दाढ़ी आँसुओं से तर हो चुकी थी। उसने आसमान की ओर हाथ उठाकर अर्ज़ किया: 'मेरे माँ-बाप आप पर क़ुर्बान हों! आपके बुज़ुर्ग सबसे श्रेष्ठ बुज़ुर्ग हैं, आपके जवान सबसे श्रेष्ठ जवान हैं और आपकी नस्ल सबसे पाकीज़ा नस्ल है। आपका ख़ानदान शरफ़, करामत और फ़ज़ीलत में समस्त ख़ानदानों से अफ़ज़ल है।'"

ऐतिहासिक रिवायतों में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख नहीं मिलता कि हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने स्वयं अपना ख़ुत्बा समाप्त फ़रमाया था या हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम ने उचित समय देखकर आपसे ख़ुत्बा समाप्त करने का अनुरोध किया था। अलबत्ता, कुछ रिवायतों के अनुसार, इसी अवसर पर हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने अपनी फूफीजान से फ़रमाया:

"अल्हम्दुलिल्लाह! आप ऐसी आलिमा हैं जिन्हें किसी ने तालीम नहीं दी, और ऐसी दानिशमंद व फ़हीमा हैं जिन्होंने किसी उस्ताद से कस्बे-फ़ैज़ नहीं किया।"

यह कथन वास्तव में हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के इल्मे-लद्दुनी, फ़साहत, बलाग़त और असाधारण बसीरत का स्पष्ट एतराफ़ था।

हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा का दर्दनाक मर्सिया

रिवायत है कि इसके बाद हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा अपनी सवारी पर तशरीफ़ फ़रमा हुईं और अत्यंत दर्दभरे अशआर पढ़े:

"ऐ अहले कूफ़ा! जब रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम तुमसे पूछेंगे कि मेरी उम्मत होने के बावजूद तुमने मेरे अहले बैत, मेरी औलाद और मेरे अज़ीज़ों के साथ कैसा सुलूक किया, तो तुम क्या जवाब दोगे? तुमने उनमें से कुछ को क़ैद कर दिया और कुछ को बेदर्दी से शहीद कर डाला। क्या मेरी वसीयत और मेरी सिफ़ारिश का यही सिला था? मुझे अंदेशा है कि कहीं तुम पर भी अल्लाह का अज़ाब न नाज़िल हो जाए।"

हज़रत फ़ातिमा बिन्तुल हुसैन सलामुल्लाह अलैहा, हज़रत उम्मे कुलसूम सलामुल्लाह अलैहा और इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम के ख़ुत्बे

हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के ऐतिहासिक ख़ुत्बे के बाद क़ाफ़िला अभी कुछ ही क़दम आगे बढ़ा था कि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की साहिबज़ादी, हज़रत फ़ातिमा बिन्तुल हुसैन सलामुल्लाह अलैहा, ने अहले कूफ़ा को मुख़ातिब करते हुए अत्यंत प्रभावशाली और जोशीला ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया।

यह ख़ुत्बा हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के ख़ुत्बे से अधिक विस्तृत था, लेकिन उसका उस्लूब, अंदाज़ और पैग़ाम वही था। वास्तव में, हज़रत फ़ातिमा बिन्तुल हुसैन सलामुल्लाह अलैहा ने अपनी फुफी हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के पैग़ाम को और अधिक स्पष्टता तथा प्रभाव के साथ लोगों तक पहुँचाया।

इसके बाद हज़रत उम्मे कुलसूम सलामुल्लाह अलैहा ने भी अहले कूफ़ा के सामने अत्यंत फ़सीह, बलीग़ और प्रभावशाली ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया, जिसमें आपने अहले बैत अलैहिमुस्सलाम पर ढाए गए अत्याचारों का उल्लेख करते हुए अहले कूफ़ा को उनकी बेवफ़ाई की याद दिलाई।

इसके पश्चात हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम ने अपना ऐतिहासिक ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया। आपने अपना और अपने ख़ानदान का तआरुफ़ कराया, अहले बैत अलैहिमुस्सलाम के मक़ाम व मंज़िलत को स्पष्ट किया और लोगों को उनकी गंभीर भूल का एहसास दिलाया।

ये सभी ख़ुत्बे फ़साहत, बलाग़त, जुरअत, हिकमत और हक़गोई का बेमिसाल नमूना थे। इन्हीं ख़ुत्बों ने अहले कूफ़ा के सोए हुए ज़मीर को झकझोर कर जगा दिया और हुकूमत-ए-वक़्त के झूठे प्रोपेगंडे को पूरी तरह बेनक़ाब कर दिया।

इन ऐतिहासिक ख़ुत्बों के बाद असीरान-ए-कर्बला को कूफ़ा शहर की विभिन्न गलियों और बाज़ारों से गुज़ारा गया। शोहदाए कर्बला के मुक़द्दस सर नेज़ों पर बुलंद थे और लोग उन्हें हसरत, हैरत और गहरे ग़म के साथ देख रहे थे।

कुछ रिवायतों में उल्लेख मिलता है कि इसी दौरान कुछ लोगों ने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सर-ए-अक़्दस से सूरह अल-कहफ़ की यह आयत तिलावत होते सुनी:

"अम् हसिब्ता अन्ना अस्हाबल-कह्फ़ि वर-रक़ीमि कानू मिन आयातिना अजबा।"

"क्या तुमने यह गुमान कर लिया है कि अस्हाबे-कहफ़ और रक़ीम ही हमारी निशानियों में सबसे अधिक आश्चर्यजनक थे?"

इसके बाद असीरान-ए-कर्बला को उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद मलऊन के महल दारुल इमारा में ले जाया गया, जहाँ हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा और हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम ने इब्ने ज़ियाद के सामने अत्यंत जुरअत, इज़्ज़ते-नफ़्स और इस्तिक़ामत के साथ कलिमा-ए-हक़ बुलंद किया।

वह ऐतिहासिक मजलिस तारीख़-ए-इस्लाम में ज़ुल्म के मुक़ाबले हक़ की महानतम मिसालों में से एक मानी जाती है।

शोहदाए कर्बला अलैहिमुस्सलाम की तदफ़ीन

सरज़मीन-ए-कर्बला तीन दिनों तक तारीख़ के सबसे मुक़द्दस, बे-गोर-ओ-कफ़न जनाज़ों की अमानतदार बनी रही। ये वे पाकीज़ा जिस्म थे, जिनके सर बेदर्दी से तन से जुदा कर दिए गए थे, जिन्हें घोड़ों के सुमों से रौंदा गया था और फिर तपती हुई रेत पर बे-गोर-ओ-कफ़न छोड़ दिया गया था।

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मैदान-ए-कर्बला में क़ियाम से पहले इस ज़मीन को क़बीला-ए-बनी असद से ख़रीद लिया था, ताकि आप ग़सबशुदा ज़मीन पर न शहीद हों और न ही वहीं दफ़्न किए जाएँ। यही सरज़मीन बाद में तारीख़-ए-इस्लाम की सबसे मुक़द्दस ज़ियारतगाहों में शुमार हुई।

ग़ाज़िरिया में आबाद क़बीला-ए-बनी असद के लोग, जो मैदान-ए-कर्बला के निकट रहते थे, जान चुके थे कि जंग समाप्त हो चुकी है और उमर बिन सअद का लश्कर वहाँ से रवाना हो गया है।

तदफ़ीन के समय के बारे में ऐतिहासिक मत

तदफ़ीन के समय के संबंध में ऐतिहासिक रिवायतों में मतभेद पाया जाता है। इसलिए विभिन्न मत उद्धृत किए जाते हैं।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार तदफ़ीन 11 मुहर्रम को हुई। कुछ के मत में यह उमर बिन सअद के कर्बला से रवाना होने के बाद सम्पन्न हुई, जबकि कुछ रिवायतों में 12 मुहर्रम की शाम, अर्थात शबे-13 मुहर्रम का उल्लेख मिलता है।

अधिकांश शिया ऐतिहासिक स्रोतों और मक़तल-निगारों के अनुसार अंतिम मत अधिक प्रसिद्ध और विश्वसनीय माना गया है कि हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम की आमद के बाद तदफ़ीन का अमल पूरा हुआ।

बनी असद की महिलाओं की रिवायत

कुछ ऐतिहासिक रिवायतों के अनुसार सबसे पहले क़बीला-ए-बनी असद की कुछ महिलाएँ दरियाए फ़ुरात से पानी लेने के लिए निकलीं। जब वे मैदान-ए-कर्बला के निकट पहुँचीं, तो उनकी नज़र शोहदाए कर्बला के बे-गोर-ओ-कफ़न जनाज़ों पर पड़ी।

यह हृदयविदारक दृश्य देखकर वे शिद्दत-ए-ग़म से रोने लगीं और तुरंत अपने क़बीले में लौटकर मर्दों से कहने लगीं—

"तुम अपने घरों में बैठे हो, जबकि फ़रज़ंदे-रसूल हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके जाँनिसार साथियों के पाकीज़ा जिस्म मैदान में बे-गोर-ओ-कफ़न पड़े हैं। यदि तुमने उनकी तदफ़ीन न की, तो हम औरतें स्वयं यह फ़र्ज़ अदा करेंगी।"

क़बीले के कुछ लोगों ने उत्तर दिया: "हमें इब्ने ज़ियाद और उसके सिपाहियों का ख़ौफ़ है। यदि उन्होंने हमें शोहदा की तदफ़ीन करते देख लिया, तो संभव है वे हमें क़त्ल कर दें या कठोर सज़ा दें।"

इस पर क़बीले के बुज़ुर्ग ने कहा: "हम निगहबानी का इंतिज़ाम करते हैं, फिर अल्लाह पर भरोसा करके यह महान दीनी फ़र्ज़ अंजाम देंगे।"

इसके बाद बनी असद के लोग मैदान-ए-कर्बला की ओर रवाना हो गए।

हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम की आमद

रिवायतों में आता है कि बनी असद के लोग सबसे पहले हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मुक़द्दस जनाज़े के पास पहुँचे। यद्यपि उन्होंने नूरे-इमामत की बरकत से आपको पहचान लिया, लेकिन जिस्मे-मुबारक पर ज़ख़्मों की अधिकता और अज़ा के बुरी तरह रौंदे जाने के कारण वे तदफ़ीन के बारे में असमंजस में पड़ गए।

इसी दौरान उन्होंने देखा कि एक वक़ारपूर्ण सवार तेज़ी से मैदान की ओर आ रहा है। वह घोड़े से उतरा, हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मुक़द्दस जनाज़े से लिपट गया, उसे बोसा दिया, देर तक गिरया करता रहा और अत्यंत दर्दभरे लहजे में अपने वालिदे-गरामी से मुनाजात करने लगा।

बनी असद के लोग अदब के साथ उसके क़रीब आए और अर्ज़ किया—

"हम शोहदाए कर्बला की तदफ़ीन के लिए उपस्थित हुए हैं, लेकिन इन बे-सर जनाज़ों को पहचान नहीं पा रहे हैं।"

इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "मैं तुम्हारी रहनुमाई करता हूँ।"

फिर आपने एक-एक शहीद की निशानदेही फ़रमाई और बनी असद के लोगों ने आपकी रहनुमाई में उनके मुक़द्दस जनाज़ों को सुपुर्दे-ख़ाक किया।

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की तदफ़ीन

जब बनी असद के लोगों ने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के जिस्मे-अतहर को उठाने में सहायता करनी चाही, तो इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "मेरे वालिदे-गरामी की तदफ़ीन में मुझे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है। मैं स्वयं उन्हें सुपुर्दे-ख़ाक करूँगा।"

रिवायतों के अनुसार आपने अकेले ही अपने वालिदे-गरामी की तदफ़ीन फ़रमाई और इस महान फ़र्ज़ को अपने दस्ते-मुबारक से अंजाम दिया।

सभी शोहदा की तदफ़ीन पूरी होने के बाद बनी असद के लोगों ने अर्ज़ किया—

"हमें इन क़ब्रों की निशानदेही भी फ़रमा दीजिए, ताकि भविष्य में आने वालों को सही जानकारी दे सकें।"

आपने फ़रमाया: "यह हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ब्र है। इसके क़रीब बनी हाशिम के जवान मदफ़ून हैं, जिनमें हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम प्रमुख हैं। दूसरी सामूहिक क़ब्र में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अस्हाब आराम फ़रमा हैं, जबकि हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम दरियाए अलक़मा के किनारे मदफ़ून हैं।"

इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम का तआरुफ़

बनी असद के लोगों ने अत्यंत अदब के साथ अर्ज़ किया: "आपको उस मुक़द्दस जिस्म का वास्ता, जिसे आपने अपने मुबारक हाथों से सुपुर्दे-ख़ाक किया है, कृपया अपना तआरुफ़ भी फ़रमा दीजिए।"

तब आपने फ़रमाया: "मैं अली बिन अल-हुसैन हूँ। मैं ज़ैनुल आबिदीन हूँ।"

यह सुनते ही बनी असद के लोग अश्कबार हो गए। रिवायतों के अनुसार, इसके बाद हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम वहाँ से रवाना हो गए।

शोहदाए कर्बला की तदफ़ीन के संबंध में वर्णित कुछ रिवायतों के विवरणों को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद पाया जाता है और कुछ तथ्यों पर अभी भी शोध की गुंजाइश मौजूद है। तथापि, इस बात पर शिया ऐतिहासिक परंपरा का लगभग सर्वसम्मत मत है कि हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम अल्लाह तआला के विशेष आदेश से कर्बला पहुँचे और अपने वालिद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तथा अन्य शोहदा की तदफ़ीन का पवित्र फ़र्ज़ अदा किया।

यह भी एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य है कि हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम की क़ब्र दरियाए अलक़मा के किनारे स्थित है, जबकि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, बनी हाशिम के शहीदों तथा वफ़ादार अस्हाब की क़ब्रें वर्तमान रौज़ा-ए-अक़्दस के अहाते में स्थित हैं, जो सदियों से अहले ईमान की अकीदत और मुहब्बत का केंद्र बनी हुई हैं।

बारह मुहर्रम का पैग़ाम

बारह मुहर्रम और उसके बाद के दिन तारीख़-ए-इस्लाम के अत्यंत दर्दनाक, किंतु ईमान-अफ़रोज़ मराहिल हैं। एक ओर अहले बैते रसूल को असीरी की हालत में कूफ़ा और शाम के बाज़ारों से गुज़ारा गया, तो दूसरी ओर कर्बला की मुक़द्दस सरज़मीन ने अपने बे-गोर-ओ-कफ़न शोहदा को अपने दामन में समेट लिया।

हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा, हज़रत उम्मे कुलसूम सलामुल्लाह अलैहा, हज़रत फ़ातिमा बिन्तुल हुसैन सलामुल्लाह अलैहा और हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम के ख़ुत्बों ने बातिल के तमाम दावों को ख़ाक में मिला दिया और यह हक़ीक़त हमेशा के लिए वाज़ेह कर दी कि तलवारें जिस्मों को ज़ख़्मी कर सकती हैं, लेकिन हक़ की आवाज़ को कभी ख़ामोश नहीं कर सकतीं।

इसी प्रकार हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम के दस्ते-मुबारक से शोहदाए कर्बला की तदफ़ीन ने इस महान क़ुर्बानी को तारीख़े-इंसानियत में हमेशा के लिए अमर कर दिया।

आज भी कर्बला की मुक़द्दस सरज़मीन पूरी इंसानियत को यही पैग़ाम देती है कि ज़ुल्म अस्थायी रूप से ग़ालिब हो सकता है, लेकिन हक़, सब्र, इस्तिक़ामत और क़ुर्बानी की रौशनी कभी बुझ नहीं सकती।

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