लेखिका: समन रबाब रिज़वी
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! इतिहास के कुछ जनाज़े केवल किसी व्यक्ति की अंतिम रस्में नहीं होते, बल्कि वे राष्ट्रों की आत्मा, उनकी सामूहिक समझ और उनके वैचारिक संकल्प का दर्पण बन जाते हैं। इस्लामी क्रांति के नेता की ऐतिहासिक अंतिम यात्रा भी उन्हीं दुर्लभ क्षणों में से एक है, जहाँ लाखों लोगों की उपस्थिति ने यह साबित किया कि कुछ नेता अपने जीवन में राष्ट्र की आवाज़ होते हैं और अपनी मृत्यु के बाद भी राष्ट्र की चेतना को और अधिक जागृत कर जाते हैं।
यह अंतिम यात्रा केवल आँसुओं का जमावड़ा नहीं थी, बल्कि वफ़ादारी, श्रद्धा और वैचारिक जुड़ाव का एक महान प्रदर्शन थी। जहाँ पुरुष, महिलाएँ, युवा और बुज़ुर्ग सभी एक ही संदेश दे रहे थे कि व्यक्तित्व भले ही इस दुनिया से चले जाते हैं, लेकिन वह विचारधारा जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया, वह जीवित रहती है। इसी कारण यह दृश्य एक व्यक्ति के जाने से आगे बढ़कर एक राष्ट्र के संकल्प और जागृति का प्रतीक बन गया।
कुरआन कहता है: كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ हर प्राणी को मृत्यु का स्वाद चखना है (आले-इमरान: 185)
लेकिन इतिहास यह भी गवाही देता है कि ईमान, निष्ठा और सत्य पर आधारित विचार मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होते। वे दिलों में जीवित रहते हैं और नई पीढ़ियों को अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराते रहते हैं।
कर्बला इस सच्चाई का सबसे उज्ज्वल उदाहरण है। इमाम हुसैन का शरीर मैदान-ए-कर्बला में रह गया, लेकिन उनका संदेश आज भी करोड़ों दिलों की धड़कन है। हज़रत ज़ैनब और इमाम ज़ैनुल आबेदीन ने इस संदेश को जीवित रखा और यह साबित किया कि शहादत किसी विचार का अंत नहीं बल्कि उसकी शाश्वत जीवन की शुरुआत है। इसी कारण इतिहास में कुछ जनाज़े शांत नहीं होते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों से लगातार संवाद करते रहते हैं।
इस्लामी क्रांति के नेता की अंतिम यात्रा ने भी यह संदेश दिया कि किसी राष्ट्र की असली ताकत उसकी एकता, समझदारी, स्वतंत्रता और अपने सिद्धांतों के प्रति वफ़ादारी में होती है। किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि उन लाखों लोगों पर आधारित होता है जो उसके उच्च सिद्धांतों को अपने आचरण में जीवित रखते हैं।
एक युग का अंत अवश्य हुआ, लेकिन एक राष्ट्र की यात्रा समाप्त नहीं हुई। राष्ट्र तभी जीवित रहते हैं जब वे अपने सिद्धांत, अपनी पहचान, अपने नैतिक मूल्यों और अपनी जिम्मेदारियों को नहीं भूलते। यही हर महान अंतिम यात्रा का सबसे बड़ा संदेश होता है कि शरीर मिट्टी में चला जाता है, लेकिन ईमान, विचार और जागृत चेतना इतिहास की यात्रा को जारी रखते हैं।
आज का यह दृश्य इतिहास के पन्नों में केवल विदाई के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे युग के नवीनीकरण के रूप में याद किया जाएगा जिसमें एक राष्ट्र ने अपने नेता को विदा करते हुए यह संकल्प लिया कि विचारों का झंडा कभी नीचे नहीं होगा, बल्कि वह आने वाली पीढ़ियों के हाथों में स्थानांतरित होता रहेगा। यही एक युग का अंत है और यही एक राष्ट्र की निरंतरता।
आज एक युग समाप्त हुआ, लेकिन एक राष्ट्र की यात्रा नहीं रुकी। नेता मिट्टी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हो सकते हैं, लेकिन वे राष्ट्र कभी नहीं मरते जो अपने नेताओं के सिद्धांतों, अपने ईमान और अपनी जिम्मेदारी को जीवित रखते हैं। यही एक युग का अंत है और यही एक राष्ट्र की निरंतरता।
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