हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, सेंट्रल इमामिया जामे मस्जिद स्कर्दू, बल्तिस्तान में इमाम हसन अस्करी (अ) की शहादत के अवसर पर 8 रबीउल अव्वल को भाषण देते हुए मौलाना शेख़ मीसम जाफ़री ने इमाम हसन अस्करी (अ) के जीवन, चरित्र और संघर्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अहलेबैत (अ) के इमामों ने इतिहास के अत्यंत अशांत और कठिन दौर में जीवन बिताया। उन दौरों में न केवल इमामों (अ), बल्कि उनके अनुयायियों के लिए भी परिस्थितियां बेहद कठिन थीं।
उन्होंने कहा कि इमाम हसन अस्करी (अ) का दौर अब्बासी शासकों के अत्यधिक ज़ुल्म, अत्याचार, निगरानी और पाबंदियों का दौर था। अहलेबैत (अ) के अनुयायियों को केवल उनसे प्रेम और श्रद्धा रखने के कारण गिरफ्तार किया जाता, उन पर अत्याचार किया जाता और उन्हें मार दिया जाता था। यहां तक कि उनके परिवारों को भय और चिंता में रखने के लिए उनके प्रियजनों के बारे में भी उन्हें कोई जानकारी नहीं दी जाती थी। ऐसे कठिन हालात में इमाम हसन अस्करी (अ) ने सब्र, तक़वा, बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता के साथ इस्लाम के प्रचार और अहलेबैत (अ) के विचारों की रक्षा का कर्तव्य निभाया।

शेख़ मीसम जाफ़री ने कहा कि इमाम हसन अस्करी (अ) ने तमाम सरकारी दबाव और लगातार निगरानी के बावजूद ज़ालिम और अत्याचारी शासकों का समर्थन नहीं किया। आपका पवित्र चरित्र, विद्वत्ता, नैतिक महानता और सत्य के प्रति दृढ़ता ही वे कारण थे, जिनकी वजह से उस समय के शासक आपको अपने शासन के लिए खतरा समझते थे। इमाम (अ) ने अपनी छोटी लेकिन अत्यंत बरकत वाली इमामत के दौरान अपने साथियों की शिक्षा-प्रशिक्षण, धार्मिक ज्ञान और शिक्षाओं की रक्षा तथा आने वाले दौर के लिए उम्मत की वैचारिक और आध्यात्मिक तैयारी का महत्वपूर्ण कर्तव्य निभाया।
उन्होंने कहा कि इमाम हसन अस्करी (अ) का जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सत्य की रक्षा, दीन की पाबंदी और ज़ुल्म के सामने दृढ़ता से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए।
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