शनिवार 12 सितंबर 2026 - 09:53
गुस्सा अक़्ल को तबाह कर देता है, इच्छाओं पर काबू पाना कामयाबी की निशानी है। हुज्जतुल इस्लाम सैयद मोहसिन तक़वी

हौज़ा / जामियातुश्शहीद दिल्ली के प्रिंसिपल हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन सैयद मोहसिन तक़वी ने कहा कि इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन वह नहीं है जो बाहर से उसके सामने मौजूद हो, बल्कि गुस्सा और बेकाबू इच्छाएं ऐसे अंदरूनी दुश्मन हैं, जो उसकी अक्ल चरित्र और आध्यात्मिक विकास को नुकसान पहुंचाते हैं। वास्तविक सफलता अपने नफ़्स और गुस्से पर काबू पाने में है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , 11 सितंबर 2026 को नई दिल्ली की शिया जामा मस्जिद, कश्मीरी गेट में हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन सैयद मोहसिन तक़वी की इमामत में जुमा की नमाज़ अदा की गई। उन्होंने ख़ुत्बा-ए-जुमा में अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम की हदीसों की रोशनी में गुस्से के नुकसान और उस पर काबू पाने के तरीकों पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने गुस्से और इच्छाओं को इंसान के प्रमुख दुश्मनों में शामिल किया है। जो व्यक्ति इन दोनों पर काबू पा लेता है, उसके दर्जे बुलंद होते हैं और वह अपनी मंज़िल तक पहुंच जाता है। बाहरी दुश्मन का मुकाबला अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि उसे पहचाना जा सकता है, लेकिन गुस्सा और बेकाबू इच्छाएं इंसान को अंदर से नुकसान पहुंचाती हैं।

हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन तक़वी ने कहा कि आज कुछ लोग गुस्से को अपनी ताकत और बहादुरी समझते हैं। किसी को धमकाना, सख्त भाषा का इस्तेमाल करना या गाली-गलौज करना उनके नज़दीक इज़्ज़त की निशानी बन गया है, जबकि यह ताकत नहीं बल्कि कमजोरी है। गुस्से की हालत में इंसान दूसरों से ज्यादा खुद को नुकसान पहुंचाता है, क्योंकि सबसे पहले उसकी अक्ल प्रभावित होती है और वह सही फैसला करने की क्षमता खो देता है।

उन्होंने अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम से मंसूब एक फ़रमान का हवाला देते हुए कहा कि गुस्सा अक्ल को खराब कर देता है और इंसान को सही रास्ते से दूर ले जाता है। तेज़ गुस्से में इंसान परिस्थितियों का सही आकलन नहीं कर पाता और अक्सर ऐसा कदम उठा बैठता है, जिस पर बाद में उसे पछताना पड़ता है और माफी मांगनी पड़ती है।

उन्होंने आगे कहा कि कुछ लोग समझते हैं कि गुस्सा न करने से लोग उन्हें कमजोर समझेंगे, जबकि वास्तविक सम्मान दूसरों को दबाने में नहीं बल्कि अपने गुस्से पर काबू रखने में है। गुस्से के बाद पछतावा, मानसिक दबाव, बेचैनी और शर्मिंदगी जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। इसलिए बेहतर है कि इंसान शुरुआत में ही अपने जज़्बात पर नियंत्रण रखे।

जामियातुश्शहीद के प्रिंसिपल ने कहा कि गुस्सा इंसान की छिपी हुई कमजोरियों को भी उजागर कर देता है। सामान्य परिस्थितियों में इंसान अपनी कई कमियों को छिपा लेता है लेकिन गुस्से के समय उसकी ज़बान और व्यवहार से उसकी वास्तविक शख्सियत सामने आ जाती है। इसलिए किसी व्यक्ति के चरित्र को समझने के लिए यह देखना भी ज़रूरी है कि वह गुस्से की हालत में किस तरह का व्यवहार करता है।

उन्होंने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से मंसूब शिक्षा का हवाला देते हुए कहा कि गुस्से की बुनियादी वजहों में तकब्बुर और खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझना शामिल है। जब इंसान दूसरों को अपने से कमतर समझने लगता है तो उसके अंदर गुस्से की स्थिति बढ़ने लगती है। इसलिए गुस्से का इलाज केवल बाहरी व्यवहार को बदलना नहीं, बल्कि अपने अंदर से तकब्बुर और खुदपसंदी को खत्म करना भी है।

उन्होंने कहा कि गुस्सा आना इंसानी फितरत का हिस्सा है और कोई भी इंसान ऐसा नहीं है जिसे कभी गुस्सा न आता हो। लेकिन असल बात यह है कि इंसान गुस्से को अपने ऊपर हावी होने देता है या उसे नियंत्रित करता है। इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का लक़ब “काज़िम” भी गुस्से को पी जाने वाले के अर्थ में है, यानी गुस्सा आने के बावजूद उसे काबू में रखना।

हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन सैयद मोहसिन तक़वी ने जोर देकर कहा कि गुस्से के समय तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय इंसान को अपनी ज़बान रोक लेनी चाहिए और परिस्थितियों को शांत होने का मौका देना चाहिए। वास्तविक ताकत दूसरों पर गुस्सा निकालने में नहीं बल्कि अपने नफ़्स को काबू में रखने में है। अगर इंसान अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम की इस शिक्षा पर अमल करे तो वह गुस्से और इच्छाओं पर नियंत्रण पाकर अपनी आध्यात्मिक जिंदगी में बुलंद मकाम हासिल कर सकता है।

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