सोमवार 31 अगस्त 2026 - 20:34
ईरान की आर्थिक घेराबंदी और उसके प्रभाव

28 फरवरी 2026 को ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद हालात लगातार बदल रहे हैं। अमेरिका ईरान के सर्वोच्च नेता को शहीद करके सत्ता परिवर्तन और ‘विलायत-ए-फ़क़ीह’ की व्यवस्था को समाप्त करने का सपना देख रहा था, लेकिन यह ‘पागल का सपना’ साबित हुआ।

लेखक: आदिल फ़राज़

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | 28 फरवरी 2026 को ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद हालात लगातार बदल रहे हैं। अमेरिका ईरान के सर्वोच्च नेता को शहीद करके सत्ता परिवर्तन और ‘विलायत-ए-फ़क़ीह’ की व्यवस्था को समाप्त करने का सपना देख रहा था, लेकिन यह ‘पागल का सपना’ साबित हुआ। ट्रंप के बड़े-बड़े दावे किसी सनकी व्यक्ति की बड़बड़ाहट से अधिक नहीं थे। जब अमेरिका ईरान में अपने लक्ष्य को हासिल करने में असफल रहा तो उसने आर्थिक घेराबंदी के जरिए ईरान को झुकाने की कोशिश की, लेकिन इस क्षेत्र में भी उसे असफलता का सामना करना पड़ा। समुद्र में जिस शान और ताकत के साथ अमेरिकी नौसैनिक बेड़े दिखाई दिए थे, उन्हें उसी तरह लगातार पीछे हटने और शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। ईरान समुद्र के रास्ते धीरे-धीरे तेल बेच रहा है और अमेरिकी घेराबंदी को तोड़कर अपनी नौसैनिक शक्ति का प्रदर्शन भी कर रहा है।

इस युद्ध ने जहां अमेरिकी शक्ति की वास्तविक स्थिति उजागर कर दी है, वहीं उसके सहयोगी देशों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। खास तौर पर अरब देशों की अर्थव्यवस्था अस्थिर हो रही है और क्षेत्र में मौजूद व्यापारिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है। अरब देशों की अर्थव्यवस्था तेल के निर्यात पर निर्भर है, जिसे संकट का सामना करना पड़ रहा है। बंदरगाहों पर युद्ध से पहले जैसी गतिविधियां नहीं हैं। संयुक्त अरब अमीरात को अरबों डॉलर के व्यापार का नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे हालात में ट्रंप की आर्थिक घेराबंदी केवल ईरान को प्रभावित नहीं कर सकती, बल्कि खाड़ी के सभी देश इसके शिकार होंगे। अरब देश किसी भी स्थिति में इस नुकसान को सहने की क्षमता नहीं रखते।

कतर के प्रधानमंत्री के तेहरान दौरे के कई कारण बताए जा सकते हैं, लेकिन क्षेत्र की व्यापारिक व्यवस्था को हुए नुकसान पर भी निश्चित रूप से चर्चा हुई होगी। कतर सहित खाड़ी के सभी देशों के लिए व्यापार रीढ़ की हड्डी की तरह है। अगर व्यापार प्रभावित हुआ तो अर्थव्यवस्था को संकट में आने में जरा भी समय नहीं लगेगा।

अमेरिका आर्थिक घेराबंदी के जरिए ईरान को झुकाना चाहता है। जो काम युद्ध नहीं कर सका, वह आर्थिक घेराबंदी से भी संभव नहीं है। क्योंकि ईरान पिछले 48 वर्षों से प्रतिबंधों की चपेट में है। उसके लिए नए और पुराने प्रतिबंधों में बहुत अधिक अंतर नहीं है। ईरानी जनता ने प्रतिबंधों के साथ जीना और आर्थिक कठिनाइयों से बाहर निकलने का तरीका सीख लिया है। ट्रंप को यह समझना होगा कि जिस राष्ट्र ने लगातार आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद विकास के नए रास्ते खोजे हैं, उसे झुकाना संभव नहीं है।

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति अब तक ईरान के विकास के कारणों और ईरानी जनता की मानसिकता को नहीं समझ सके हैं। उन्हें पहले ईरानी जनता के इतिहास और प्रतिबंधों के बावजूद उसकी लगातार प्रगति पर विचार करना चाहिए। अगर आर्थिक बहिष्कार और नए-नए प्रतिबंधों से ईरान को झुकाया जा सकता तो यह बहुत पहले हो चुका होता। प्रतिबंधों ने ईरान को विकास के नए रास्तों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया। आर्थिक बहिष्कार ने ‘आत्मनिर्भर ईरान’ की नींव रखी। अगर ट्रंप ईरानी जनता की मानसिकता और इतिहास से जरा भी परिचित होते तो यह युद्ध अमेरिकी बदनामी का कारण नहीं बनता।

ट्रंप ने दावा किया कि हमने ईरान की समुद्री घेराबंदी बढ़ा दी है, जिसके बाद ईरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना तेल नहीं बेच सकेगा। जबकि ईरान लगातार समुद्र के रास्ते तेल बेच रहा है। हाल ही में ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मेजर जनरल मोहसिन रज़ाई ने लेबनान के अल-मनार चैनल को दिए गए एक साक्षात्कार में अमेरिकी समुद्री घेराबंदी का मजाक उड़ाते हुए कहा, “हमने युद्धविराम के दौरान 80 मिलियन बैरल तेल का निर्यात किया। अगर आर्थिक घेराबंदी इसी तरह जारी रही तो हम अमेरिकी आर्थिक हितों पर और भी गंभीर प्रहार करेंगे।”

उन्होंने कहा, “ईरान ने युद्धविराम के दौरान समुद्री घेराबंदी को तोड़ते हुए 70 से 80 मिलियन बैरल तेल बेचा। समुद्र में तेल के भंडार बेचने के अलावा ईरान ने तेल बेचने के नए रास्ते भी खोज लिए हैं, जिससे तेल निर्यात की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ रही है। इस तरह तेल की बिक्री प्रतिबंधों से पहले के स्तर पर वापस आ गई है।”

इस बयान से स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका ईरान की समुद्री घेराबंदी में भी असफल हो चुका है। युद्ध अब नए चरण में प्रवेश कर रहा है। अमेरिका इस युद्ध की दिशा ईरान की इच्छा के अनुसार तय करने के लिए मजबूर है। शायद इसी आधार पर ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने कहा था, “ईरान से बड़ा शतरंज का खिलाड़ी कोई नहीं है”, जिसका प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई दे रहा है।

ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध पूरी तरह बेअसर भी नहीं हैं। प्रतिबंधों ने महंगाई को बढ़ावा दिया है और जनता को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद ईरानी जनता के धैर्य और दृढ़ता ने दुश्मन की आर्थिक घेराबंदी को विफल कर दिया है।

हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों का प्रभाव केवल ईरान तक सीमित नहीं है। इसका दायरा अरब देशों से लेकर पूरे मध्य पूर्व तक फैल रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने संयुक्त अरब अमीरात के 21 अरब डॉलर के व्यापार को प्रभावित किया है। वाशिंगटन ने ईरान के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों को ‘आर्थिक अलगाव’ का नाम दिया था, लेकिन इसका प्रभाव खाड़ी तक फैल गया है।

अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने नए प्रतिबंधों की घोषणा करते हुए ईरान के डिजिटल संपत्तियों, तकनीक, सोना, विमानन और समुद्री परिवहन जैसे पांच क्षेत्रों को निशाना बनाया। अमेरिका ने दुनिया को चेतावनी दी कि जो भी ईरान के साथ इन क्षेत्रों में सहयोग करेगा, उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस नीति का उद्देश्य ईरान की “हर प्रकार की आर्थिक और जीवनदायी नस को काटना” है। उन्होंने कहा कि इन प्रतिबंधों के माध्यम से ईरान के खिलाफ ‘डी-डे’ की शुरुआत हो रही है।

ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों को राज्य प्रायोजित और आर्थिक आतंकवाद बताते हुए स्पष्ट घोषणा की कि “जो भी देश ईरान के खिलाफ अमेरिका की आर्थिक लड़ाई में शामिल होगा, तेहरान उसे अपना दुश्मन समझेगा।” मोहसिन रज़ाई ने कहा कि ईरान पहले ऐसे देशों से बातचीत करेगा और उनसे इस विवाद से दूर रहने के लिए कहेगा। लेकिन अगर वे नहीं माने तो ईरान उनके हितों को भी निशाना बनाएगा।

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर पड़ोसी देश अमेरिका के साथ आर्थिक घेराबंदी में शामिल होते हैं तो ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य से तेल का निर्यात बंद कर देगा। मोहसिन रज़ाई ने मानो सभी पड़ोसी देशों को चेतावनी दी है कि वे अमेरिका के साथ सहयोग करने से बचें।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान का दावा केवल हवा में नहीं है। दुनिया इसे वास्तविकता में बदलते हुए देख चुकी है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची ने इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को पत्र भेजकर अमेरिकी प्रतिबंधों को राज्य प्रायोजित और आर्थिक आतंकवाद बताया है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र को पत्र भेजना एक नैतिक और कानूनी कदम जरूर है, लेकिन इसका फिलहाल कोई खास लाभ दिखाई नहीं देता। संयुक्त राष्ट्र एक जीवित लाश की तरह है, जिसने अपनी दुर्गंध से पूरी दुनिया को प्रभावित कर रखा है। ऐसे संस्थानों की मानवता को कोई आवश्यकता नहीं है, जो अपना कर्तव्य पूरा करने में सक्षम नहीं हैं।

अब ईरान और अरब देशों की राजनीति की ओर आते हैं। ईरान ने हमेशा इस्लामी भाईचारे और एकता को प्राथमिकता दी है। आज भी ईरान इस्लामी एकता का सबसे बड़ा समर्थक है। मुस्लिम देशों पर हुए हमलों में ईरान ने केवल अमेरिकी और इजरायली हितों को निशाना बनाया। खास तौर पर उन अमेरिकी सैन्य ठिकानों को लक्ष्य बनाया गया, जिनका इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किया जा रहा था। ईरान का युद्ध मुस्लिम देशों के खिलाफ नहीं था। अगर ऐसा होता तो अरब देशों पर भी उसी तरह हमले किए जाते, जिस तरह इजरायल पर किए गए थे, लेकिन ईरान ने ऐसा नहीं किया।

अरब देशों को भी चाहिए कि वे अमेरिकी अधीनता से बाहर निकलें और इस्लामी एकता कायम करके क्षेत्र में नई शक्ति की नींव रखें। हालांकि यह बहुत कठिन प्रक्रिया है।

मुस्लिम शासकों को यह समझना होगा कि अगर वे अमेरिका के साथ आर्थिक घेराबंदी में शामिल हुए तो इसका खामियाजा उनकी अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ेगा। उन्हें समझना होगा कि अमेरिका के लिए अपने हितों से ऊपर कुछ भी नहीं है। ईरान के साथ युद्ध में अब तक अरब देशों को जितना नुकसान हुआ है, क्या अमेरिका उसकी भरपाई करेगा? हरगिज नहीं।

अमेरिका ने ये सैन्य अड्डे उन्हीं देशों की सुरक्षा के दावे के साथ स्थापित किए थे, लेकिन वह उन्हें अपने बचाव के लिए भी इस्तेमाल नहीं कर सका। अगर अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष इसी तरह जारी रहा तो इसका खामियाजा अमेरिका के सहयोगी देशों को भी भुगतना पड़ेगा, जिसका संकेत ईरानी नेतृत्व पहले ही दे चुका है।

अरब देशों की अर्थव्यवस्था तेल के निर्यात पर काफी अधिक निर्भर है। अगर तेल का निर्यात प्रभावित हुआ तो अरब देशों में एक नया आर्थिक संकट पैदा हो जाएगा। इसलिए अभी भी समय है कि अरब शासक होश से काम लें। अमेरिकी समर्थन उन्हें किसी भी स्थिति में सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता।

हालांकि अरब जनता को भी जागरूकता का प्रदर्शन करना होगा। इसके संकेत बहरीन सहित अन्य देशों में भी दिखाई दे रहे हैं। अगर जनता जागरूक हुई तो व्यवस्था बदलने में देर नहीं लगेगी। शासकों को सत्ता परिवर्तन से अधिक किसी और बात का डर नहीं होता।

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