शुक्रवार 28 अगस्त 2026 - 07:58
हफ्त ए वहदत;इंसानियत की निजात का हफ्ता

हौज़ा / हज़रत पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम दुनिया के वो अकेले नबी हैं जिन्हें कुरआन पाक में "रहमतुल-लिल-आलमीन"सारी दुनिया के लिए रहमत कहा गया है। यह नाम सिर्फ एक इज़्ज़त या ख़िताब नहीं है, बल्कि इसका मतलब यह है कि आपको पूरी दुनिया के लिए अल्लाह ने भेजा है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हज़रत इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की शहादत के मौके पर हिंदुस्तान के मशहूर खतीब मौलाना सैयद अबुल हसन नक़वी से एक इंटरव्यू हुआ इस मौके पर उन्होंने सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियां की ओर विस्तार से प्रकाश डाला

विस्तृत इंटरव्यू इस तरह है:

हौज़ा न्यूज़ : सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह आगा। हमारा पहला सवाल,पैगंबर-ए-इस्लाम  स.ल.व. को “रहमतुल्लिल-आलमीन” क्यों कहा गया है?

मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी : अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफा स.ल.व. को “रहमतुल्लिल-आलमीन”, यानी तमाम जहानों के लिए रहमत बनाकर भेजे जाने का ऐलान किया है। इसका मतलब यह है कि आपकी रहमत किसी एक क़ौम, नस्ल या सिर्फ मुसलमानों तक सीमित नहीं है, बल्कि आपकी सीरत, अख्लाक और पैग़ाम पूरी इंसानियत के लिए हैं।आप स.ल.व. ने इंसान को जहालत, गुमराही और अंधेरे से निकालकर इल्म, हिदायत, इंसाफ, भाईचारे और सच्चाई की राह दिखाई। गार ए हिरा से आने के बाद आपने ऐसा पैग़ाम दिया जिसने इंसान की व्यक्तिगत और सामाजिक जिंदगी को बदलने की ताकत रखी।

हौज़ा न्यूज़ : पैगंबर-ए-इस्लाम स.ल.व. की रहमत को हम आज की दुनिया में कैसे समझ सकते हैं?

मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी : हज़रत रसूल-ए-अकरम स.ल.व. की रहमत केवल इबादत तक सीमित नहीं थी। आपने इंसान को इंसान की इज़्ज़त करना, कमज़ोरों के साथ अच्छा व्यवहार करना, पड़ोसी के अधिकारों का सम्मान करना, यतीमों और जरूरतमंदों की मदद करना तथा समाज में इंसाफ कायम करना सिखाया।इसलिए अगर हम वास्तव में आपको “रहमतुल्लिल-आलमीन” मानते हैं, तो हमारी जिंदगी में भी रहमत, मोहब्बत, भाईचारा और इंसाफ दिखाई देना चाहिए।

हौज़ा न्यूज़ : हफ्ता-ए-वहदत की ज़रूरत आखिर क्यों महसूस हुई?

मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी : मुसलमानों में पैगंबर-ए-इस्लाम स.ल.व. की विलादत को लेकर 12 रबीउल-अव्वल और 17 रबीउल-अव्वल की तारीखें मशहूर हैं। अहले-सुन्नत 12 रबीउल-अव्वल को और अहले-तशय्यो 17 रबीउल-अव्वल को विलादत मनाते हैं।इन दोनों तारीखों को मतभेद का कारण बनाने के बजाय इमाम खुमैनी र.ह. ने इन्हीं तारीखों के बीच के समय को “हफ्ता-ए-वहदत” का नाम देकर एकता का अवसर बना दिया। इसका मकसद यह था कि मुसलमान अपने मतभेदों से ऊपर उठकर साझा मूल्यों पर एकजुट हों।

हौज़ा न्यूज़ : इमाम खुमैनी र.ह. के नज़रिए में मुस्लिम एकता की क्या अहमियत थी?

मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी : इमाम खुमैनी रह.के लिए वहदत कोई अस्थायी राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि एक महत्वपूर्ण और स्थायी उसूल था। उनका मानना था कि अगर मुसलमान आपस में बंटे रहेंगे तो दुश्मन उनकी कमज़ोरी का फायदा उठाएगा।उन्होंने लगातार इस बात पर ज़ोर दिया कि शिया और सुन्नी आपस में भाई हैं और मुसलमानों को अपने साझा हितों और साझा समस्याओं के सामने एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए।

हौज़ा न्यूज़ : क्या मुस्लिम उम्मत ने इमाम खुमैनी (रह.) के एकता के पैग़ाम को पूरी तरह समझ लिया है?

मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी : यह एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। अगर हम दुनिया के मौजूदा हालात देखें तो महसूस होता है कि मुस्लिम उम्मत को अभी भी एकता के इस पैग़ाम को गंभीरता से समझने की ज़रूरत है।फिरकापरस्ती, आपसी नफरत और छोटे-छोटे मतभेदों को बड़ा बना देना उम्मत को कमज़ोर करता है। इमाम खुमैनी (रह.) ने बार-बार मुसलमानों को होशियार किया कि आपसी झगड़े का नुकसान केवल एक समूह को नहीं, बल्कि पूरी उम्मत को होता है।इसलिए हफ्ता-ए-वहदत हमें आत्ममंथन का भी मौका देता है कि हम एकता के बारे में सिर्फ बातें कर रहे हैं या वास्तव में उसे अपनी जिंदगी में लागू भी कर रहे हैं।

हौज़ा न्यूज़ : आज फिलिस्तीन, गाज़ा और लेबनान जैसे हालात में मुस्लिम एकता क्यों ज़्यादा जरूरी हो गई है?

मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी : आज फिलिस्तीन और गाज़ा के हालात पूरी इंसानियत के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं ऐसे हालात हमें यह सोचने पर मज़बूर करते हैं कि अगर मुसलमान अपने मतभेदों में उलझे रहेंगे तो वे सामूहिक रूप से अपने अधिकारों और मजलूमों के समर्थन में प्रभावी आवाज कैसे उठा पाएंगे?इसलिए आज मुस्लिम एकता केवल एक धार्मिक चर्चा नहीं, बल्कि इंसाफ, मानवता और अमन के लिए भी महत्वपूर्ण है। हफ्ता-ए-वहदत हमें याद दिलाता है कि मज़लूमों की मदद और इंसाफ की आवाज को मज़बूत करने के लिए आपसी एकता जरूरी है।

हौज़ा न्यूज़ : हफ्ता-ए-वहदत को “इंसानियत की निजात का हफ्ता” क्यों कहा जा सकता है?

मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी : क्योंकि इस्लाम का पैग़ाम इंसान को अंधकार से निकालकर हिदायत, इंसाफ, अमन और इंसानियत की ओर ले जाने का पैग़ाम है।अगर मुसलमान आपस में एकजुट होकर पैगंबर-ए-इस्लाम स.ल.व. के अख्लाक और रहमत के पैग़ाम को अपनी जिंदगी में लागू करें, तो वे समाज में नफरत के बजाय मोहब्बत, अन्याय के बजाय इंसाफ और हिंसा के बजाय अमन को बढ़ावा दे सकते हैं।इस अर्थ में हफ्ता-ए-वहदत केवल मुसलमानों की एकता का संदेश नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए बेहतर समाज बनाने की कोशिश भी है।

हौज़ा न्यूज़ : आज के दौर में मुसलमानों की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी क्या है?

मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी : सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी यह है कि मुसलमान अपने अंदर से नफरत, तंगनज़री और फिरकापरस्ती को कम करें और आपसी सम्मान तथा भाईचारे को मज़बूत करें।हमें यह समझना होगा कि सोशल मीडिया और आधुनिक संचार के दौर में छोटी-सी बात भी बड़े विवाद का कारण बन सकती है। इसलिए हमें अपने शब्दों और व्यवहार दोनों में सावधानी बरतनी चाहिए।रसूल-ए-अकरम स.ल.व. की सीरत हमें रहमत, सब्र, अखलाक और इंसाफ का रास्ता दिखाती है। यही हमारी असली जिम्मेदारी है।

हौज़ा न्यूज़ : युवाओं को हफ्ता-ए-वहदत से क्या संदेश लेना चाहिए?

मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी : युवाओं को यह समझना चाहिए कि मुसलमानों की ताकत केवल संख्या में नहीं, बल्कि इल्म, अख्लाक, एकता और ज़िम्मेदारी में है।उन्हें सोशल मीडिया पर भाईचारे को बढ़ावा देना चाहिए। दूसरे मसलक के मुसलमानों को दुश्मन समझने के बजाय उन्हें अपना भाई समझना चाहिए।अगर युवा पीढ़ी एकता के इस विचार को अपनाती है तो मुस्लिम समाज का भविष्य ज्यादा मज़बूत और सकारात्मक हो सकता है।

हौज़ा न्यूज़ : अंत में हफ्ता-ए-वहदत के मौके पर उम्मत ए मुस्लिम और पूरी इंसानियत के नाम आपका क्या पैग़ाम है?

मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी : हमारा पैग़ाम यही है कि हम पैगंबर-ए-इस्लाम स.ल.व. के “रहमतुल्लिल-आलमीन” होने के संदेश को सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि अपने किरदार में उतारें।

हम अपने मतभेदों को दुश्मनी न बनने दें। शिया-सुन्नी भाईचारे को मजबूत करें, एक-दूसरे का सम्मान करें और मज़लूमों के साथ खड़े हों।
इमाम खुमैनी (रह.) ने मुसलमानों को एकता का रास्ता दिखाया। अब इस रास्ते पर चलना हमारी जिम्मेदारी है।हफ्ता-ए-वहदत हमें यह संदेश देता है कि अलग-अलग विचारों के बावजूद हम एक-दूसरे के भाई हो सकते हैं और मिलकर अमन, इंसाफ और इंसानियत की सेवा कर सकते हैं।

हौज़ा न्यूज़ : बहुत-बहुत शुक्रिया मौलाना साहब, आपके विचारों से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला। अल्लाह आपको सलामत रखे

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