हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | जब सभी तथाकथित मुस्लिम शासकों, हरमैन शरीफैन के सेवकों, अरब राष्ट्रवाद के समर्थकों और मुस्लिम देशों के शक्तिशाली नेताओं की स्थिति पर नजर डालें, तो अमेरिका की बेवफाई, धोखे, ठगी और इन शासकों की लगातार बेइज्जती के बावजूद ये सभी राष्ट्रपति ट्रंप की एक नजर पाने और उनसे मिलने की बेचैनी में कतार में खड़े थे। उनके होंठों पर न तो इजरायल की क्रूरता और अत्याचार के खिलाफ एक शब्द था और न ही उत्पीड़ित फिलिस्तीनियों और गाजा के लोगों के दुख-दर्द पर अफसोस का कोई इजहार था।
जबकि पूरी दुनिया और अमेरिकी तथा पश्चिमी मीडिया ने देखा कि इसी वैश्विक मंच पर, दुश्मन के घर में, युद्ध की स्थिति में और तमाम खतरों के बावजूद एक व्यक्ति वहां पहुंचा और खड़े होकर अमेरिका और इजरायल को उसी तरह चुनौती दे रहा था, जैसे उसके मार्गदर्शक और आदर्श अली इब्ने अबी तालिब (अ) ने बद्र, उहुद और खैबर के मैदानों में यहूदियों और ईसाइयों तथा मरहब और अंतरा को चुनौती दी थी।
यह कौन था?
न तो कोई मुल्ला, मौलवी, तकफीरी, धर्म बेचने वाला मुफ्ती, राजा या धर्मनिरपेक्ष शासक, बल्कि एक स्वतंत्र, स्वाभिमानी और सम्मानित मुस्लिम देश ईरान का राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेज़ेश्कियान था, जो कुरआन का हाफिज भी है और नहजुल बलागा का भी हाफिज है। लेकिन वह मुल्ला नहीं, बल्कि मुजाहिद है।
लेकिन चंद निवालों के लिए बिके हुए तथाकथित मुल्लाओं, तकफीरी लोगों और अपना जमीर बेचने वालों की आंखें बंद ही रहीं।
इनकी आंखें, इनके दिल और इनके कान अंधे, बहरे और अंधकार में डूबे हुए हैं। अगर अल्लाह के प्यारे पैगंबर स्वयं भी आ जाएं, तो ये लोग “हमारे लिए अल्लाह की किताब ही काफी है” का नारा लगाकर उन्हें भी, अल्लाह न करे, ठुकरा देंगे।
शायद इन्हीं लोगों के बारे में कहा गया है:
“और निस्संदेह हमने बहुत से जिन्न और इंसानों को जहन्नम के लिए पैदा किया है। उनके दिल हैं, जिनसे वे समझते नहीं; उनकी आंखें हैं, जिनसे वे देखते नहीं; और उनके कान हैं, जिनसे वे सुनते नहीं। वे चौपायों जैसे हैं, बल्कि उनसे भी अधिक भटके हुए हैं। यही लोग बेखबर हैं।” (सूर ए आराफ, 7:179)
आपकी टिप्पणी