हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, नागपुर में खुत्बा-ए-जुमा के दौरान मौलाना मोहम्मद हसन दानिश क़ुमी ने ईमान और अमल के आपसी संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ईमान केवल ज़बान से इक़रार का नाम नहीं, बल्कि दिल के यक़ीन और व्यवहारिक अमल का नाम है। इंसान जब ईमान के तक़ाज़ों को अपनी ज़िंदगी में लागू करता है, तभी उसका ईमान पूर्णता की ओर बढ़ता है।
उन्होंने कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने ईमान और अमल के संबंध को स्पष्ट करते हुए बताया है कि अमल के बिना ईमान और ईमान के बिना अमल स्वीकार्य नहीं है। क़ुरआन मजीद में भी अल्लाह तआला ने ईमान वालों को तक़वा अपनाने और अपने ईमान के तक़ाज़ों को पूरा करने की हिदायत दी है। उन्होंने कहा कि अगर इंसान ईमान के साथ अमल को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाए तो अल्लाह तआला उसे फ़ुरक़ान अर्थात सही और ग़लत में अंतर करने की क्षमता प्रदान करता है।
ईमान केवल ज़बानी इक़रार का नाम नहीं
मौलाना दानिश क़ुमी ने कहा कि कुछ लोग यह समझते हैं कि ईमान केवल ज़बान से इक़रार करने का नाम है, जबकि यह सही समझ नहीं है। ईमान में ज़बान से इक़रार के साथ दिल से यक़ीन और व्यवहार में उसके तक़ाज़ों पर अमल करना भी शामिल है।
उन्होंने कहा कि जब इंसान अल्लाह की वहदानियत, उसकी रुबूबियत, पैग़म्बरों की नुबूवत, औलिया की विलायत, क़यामत और अल्लाह की अदालत पर ईमान का इक़रार करता है, तो उसे इन सभी ईमानी अहदों को अपनी ज़िंदगी में पूरा करने का प्रयास भी करना चाहिए।
मौलाना ने कहा कि अगर ज़बान से किसी हक़ीक़त का इक़रार किया जाए लेकिन दिल में उसका यक़ीन न हो और इंसान के व्यवहार में उसका कोई प्रभाव दिखाई न दे तो केवल ज़बानी इक़रार पर्याप्त नहीं है।
क़ुरआन की शिक्षाएं: अक़ाइद, अहकाम और अख़लाक़
खुत्बे में उन्होंने क़ुरआन मजीद की शिक्षाओं की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि क़ुरआनी शिक्षाओं को व्यापक रूप से अक़ाइद, अहकाम और अख़लाक़ के तीन महत्वपूर्ण हिस्सों में समझा जा सकता है। क़ुरआन इंसान को विचार और चिंतन की दावत देता है तथा उसे कायनात की निशानियों में ग़ौर-ओ-फ़िक्र करने की हिदायत करता है।
उन्होंने कहा कि केवल अक़ीदे का दावा पर्याप्त नहीं, बल्कि इंसान को अल्लाह के अहकाम पर अमल करना और अपने अख़लाक़ को भी बेहतर बनाना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति अहकाम पर अमल करता है लेकिन उसके अख़लाक़ अच्छे नहीं हैं तो उसके व्यक्तित्व में अभी पूर्णता नहीं आई है।
मौलाना ने कहा कि इंसान को चाहिए कि वह अक़ाइद, अहकाम और अख़लाक़ के ज़ेवर से अपने अस्तित्व को सजाए। पैग़म्बरे इस्लाम (स) का जीवन हमारे लिए इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पैग़म्बरी से पहले भी मक्का के लोग आपको सादिक़ और अमीन के नाम से जानते थे। आपकी सच्चाई और अमानतदारी आपके उच्च नैतिक चरित्र की स्पष्ट मिसाल थी।
रसूले इस्लाम (स) ने ईमान के साथ अमल की तालीम दी
मौलाना मोहम्मद हसन दानिश क़ुमी ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) की बेअसत और तब्लीग़-ए-रिसालत का उल्लेख करते हुए कहा कि पहली वह्य के बाद रसूले इस्लाम (स) ने अल्लाह के संदेश को लोगों तक पहुंचाने का सिलसिला शुरू किया।
उन्होंने कहा कि रसूले इस्लाम (स) ने लोगों को अल्लाह की ओर बुलाया और उन्हें ऐसा ईमान अपनाने की दावत दी जो इंसान के अमल में दिखाई दे। ईमान का असली प्रभाव इंसान के व्यवहार, इबादत, अख़लाक़ और सामाजिक जीवन में प्रकट होना चाहिए।
मोमिन की पहचान क्या है?
मौलाना ने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि मोमिन लोगों का मददगार होता है, कमखर्च होता है और एक ही जगह से दो बार धोखा नहीं खाता। मोमिन के अंदर दीन के मामले में मज़बूती, नरमी में एहतियात और यक़ीन में ईमान पाया जाता है।
उन्होंने कहा कि हमें अपने अंदर झांककर देखना चाहिए कि हमारे यक़ीन में कितना ईमान और हमारे ईमान में कितना अमल मौजूद है। मोमिन को अल्लाह के अहकाम की अदायगी में उत्साह रखना चाहिए। वाजिबात के साथ मुस्तहब्बात की ओर भी ध्यान देना चाहिए और इबादत में निरंतरता पैदा करनी चाहिए।
मौलाना ने कहा कि मोमिन अल्लाह की हिदायत मिलने पर खुश होता है और नमाज़ व इबादत से जुड़ा रहता है। यह मोमिन की पहचान और उसके कमाल की निशानी है।
इंसान की फ़ज़ीलत माल में नहीं, पाकीज़ा अमल में है
मौलाना दानिश क़ुमी ने हज़रत अली (अ) के कथनों का उल्लेख करते हुए कहा कि इंसान की फ़ज़ीलत उसके अच्छे कमाल और पाकीज़ा आमाल में है, न कि माल की बहुतायत में। इंसान की फ़ज़ीलत के लिए इतना ही काफ़ी है कि वह अपने आपको नाक़िस समझे और अपने सुधार की कोशिश करता रहे।
उन्होंने कहा कि दुनिया में सख़ावत और लोगों के साथ भलाई करने वालों को फ़ज़ीलत हासिल है, जबकि आख़िरत में तक़वा अपनाने वाले लोग फ़ज़ीलत के हक़दार होंगे। अल्लाह के नज़दीक बेहतर इंसान वह है जो हक़ पर अमल करता है, चाहे उसके लिए कठिनाई ही क्यों न हो, और बातिल की ओर रुख नहीं करता।
हिकमत, इफ़्फ़त, क़ुव्वत और अदालत
खुत्बे में मौलाना ने इंसान की चार महत्वपूर्ण फ़ज़ीलतों का उल्लेख करते हुए कहा कि हिकमत, इफ़्फ़त, क़ुव्वत और अदालत इंसान के व्यक्तित्व को निखारती हैं। हिकमत का स्रोत फ़िक्र है। इफ़्फ़त इंसान की इच्छाओं को नियंत्रित करने से जुड़ी है, जबकि क़ुव्वत को सही दिशा देने के लिए इंसान को अपने ग़ज़ब पर नियंत्रण रखना चाहिए।
उन्होंने अदालत की व्याख्या करते हुए कहा कि अदालत का अर्थ यह है कि हर चीज़ को उसके उचित स्थान पर रखा जाए। जबकि इंसाफ़ का अर्थ बराबर-बराबर तक़सीम करना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि परिवार में बच्चों की उम्र और ज़रूरत के अनुसार भोजन दिया जाता है। छोटे बच्चे की ज़रूरत अलग होती है और बड़े की अलग। इसलिए हर व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार उसका हक़ देना अदालत है।
ग़ीबत नेकियों को बर्बाद कर देती है
मौलाना ने सूरए कहफ़ की आयत का उल्लेख करते हुए कहा कि बाक़ी रहने वाले नेक आमाल अल्लाह के नज़दीक बेहतर हैं। इंसान को चाहिए कि वह बड़ी मेहनत से किए गए अपने नेक आमाल की हिफ़ाज़त करे, क्योंकि कुछ गुनाह इंसान की नेकियों को बर्बाद कर देते हैं।
उन्होंने विशेष रूप से ग़ीबत से बचने की नसीहत करते हुए कहा कि इंसान को अपनी ज़बान की हिफ़ाज़त करनी चाहिए। ग़ीबत इंसान के आमाल पर गंभीर प्रभाव डालती है, इसलिए मोमिन को अपने शब्दों और व्यवहार पर नियंत्रण रखना चाहिए।
मोमिन का अख़लाक़ और उसकी ज़बान
मौलाना दानिश क़ुमी ने हज़रत अली (अ) के कथनों का उल्लेख करते हुए कहा कि मोमिन बुर्दबार होता है, लेकिन जाहिल नहीं होता। उसके साथ जहालत का व्यवहार किया जाए तो वह सब्र और बुर्दबारी से काम लेता है। वह अत्याचार नहीं करता और यदि उसके साथ अत्याचार किया जाए तो माफ़ करने का रास्ता अपनाता है।
उन्होंने कहा कि मोमिन कारोबार में पाकीज़ा, अख़लाक़ में बेहतर और बातिन में साफ़ होता है। वह अपने माल को अल्लाह की राह में खर्च करता है और अपनी ज़बान को अनावश्यक बातों से रोकता है।
मौलाना ने कहा कि केवल अधिक बोलना या अच्छी बातें करना कमाल नहीं है। असली कमाल यह है कि इंसान ऐसी बात करे जिससे अल्लाह तआला राज़ी हो और जिसे नेक कलाम कहा जा सके।
ईमान को अमल के ज़रिए मज़बूत करने की ज़रूरत
खुत्बे के अंत में मौलाना मोहम्मद हसन दानिश क़ुमी ने कहा कि हर मोमिन को अपने ईमान के तक़ाज़ों को समझना और उन्हें व्यवहारिक जीवन में लागू करना चाहिए। ईमान, इबादत, अहकाम और अच्छे अख़लाक़ को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। इंसान की असली कामयाबी इसी में है कि उसका ईमान उसके अमल और उसके अख़लाक़ में दिखाई दे।
उन्होंने मोमिनों के लिए दुआ की और इमाम-ए-ज़माना हज़रत इमाम महदी (अ) के जल्द ज़ुहूर के लिए भी दुआ करते हुए खुत्बे का समापन किया।
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