रविवार 12 अप्रैल 2026 - 13:08
मोहब्बतो की कसौटी पर ईमान का फैसला

इतिहास गवाह है कि जुल्म कभी अपनी ताकत से नहीं जीता, बल्कि मज़लूम के समर्थकों की ख़ामोशी से जीता है। जब हक़ के पैरोकार अकेले रह जाएँ और बाकी सब दर्शक बन जाएँ, तो जुल्म को रास्ता मिल जाता है। यही वह मुकाम है जहाँ सूरह तौबा की यह आयत एक फैसला बनकर सामने आती है, एक ऐसा फैसला जो सिर्फ व्यक्तियों का नहीं बल्कि क़ौमों का मुक़द्दर तय करता है।

लेखक: मौलाना सैयद अली हाशिम आबिदी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी I – *(ऐ रसूल) कह दो कि अगर तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे भाई, तुम्हारी पत्नियाँ और तुम्हारा कुनबा-क़बीला, और तुम्हारा वह माल जो तुमने कमाया है, और तुम्हारा वह व्यापार जिसके मंदा पड़ जाने से डरते हो, और तुम्हारे वह रिहायशी मकान जिन्हें तुम पसंद करते हो, तुम्हें अल्लाह, उसके रसूल और राह-ए-ख़ुदा में जिहाद करने से ज़्यादा प्यारे हैं, तो फिर इंतज़ार करो, यहाँ तक कि अल्लाह अपना फैसला ले आए। और अल्लाह फासिक़ और नाफरमान क़ौम को मंज़िल-ए-मक़सूद तक नहीं पहुँचाता। (सूर ए तौबा, आयत 24)*

कभी-कभी इतिहास अपने पन्नों को इतनी शिद्दत से पलटता है कि शब्द लरज़ उठते हैं, क़लम काँपने लगता है और इंसान अपने ही दावों के मलबे तले खड़ा खुद से सवाल करता है कि आखिर उसके ईमान की हक़ीक़त क्या है? ऐसे ही लम्हों में क़ुरआन-ए-मजीद की वह आयतें सामने आती हैं जो महज़ तिलावत के लिए नहीं बल्कि बेदारी के लिए नाज़िल हुई हैं। सूरह तौबा की आयत 24 उन्हीं आयतों में से है, एक ऐसी आयत जो दिलों के अंदर छुपी हुई प्राथमिकताओं को बेनक़ाब करती है, जो इंसान के ज़ाहिर और बातिन के दरमियान हाइल पर्दों को चाक करती है, और जो यह फैसला सुनाती है कि ईमान सिर्फ दावा नहीं बल्कि एक कठिन चुनाव का नाम है।

यह आयत इंसान के सामने एक तराज़ू रखती है, एक पलड़े में दुनिया की तमाम महबूब चीज़ें: बाप, बेटे, भाई, जीवनसाथी, ख़ानदान, माल, तिजारत, मकान; और दूसरे पलड़े में अल्लाह, उसके रसूल और उसकी राह में जद्दोजहद। फिर एक ख़ामोश मगर गरजदार सवाल उठता है: तुम्हारे दिल का झुकाव किस तरफ है?

यह सवाल आसान नहीं, क्योंकि इसका जवाब ज़बान से नहीं बल्कि ज़िंदगी से देना पड़ता है।

आज का ज़माना इसी सवाल का अमली इम्तिहान है। एक तरफ वह लोग हैं जिन्होंने इस आयत को अपने वजूद में जज़्ब कर लिया है, जिन्होंने अपनी महबूबियात को अल्लाह की महबूबियात के अधीन कर दिया है; और दूसरी तरफ वह हैं जिन्होंने अल्लाह की मोहब्बत को अपनी दुनियावी वाबस्तगियों के ताबे कर दिया है। यही वह तक़सीम है जो आज के आलम-ए-इस्लाम को दो वाजेह हिस्सों में बाँटती है: इस्तिक़ामत और मसलहत, क़ुरबानी और मफाद, बेदारी और ग़फलत।

ईरान और लेबनान के मोमिनीन इस आयत के जीते-जागते प्रतीक बन चुके हैं। उनकी सरज़मीनों पर सिर्फ सियासत नहीं, ईमान की तारीख लिखी जा रही है। उनके घरों से उठने वाली सदाएँ महज़ नारे नहीं बल्कि एक प्रतिज्ञा की तज्दीद हैं, वह अहद जो इंसान ने अपने रब से किया था कि वह हर हाल में हक़ का साथ देगा। उन्होंने दुनिया को यह दिखाया कि जब ईमान दिल में उतर जाए तो फिर खौफ की तमाम दीवारें गिर जाती हैं, और इंसान एक ऐसी क़ुव्वत में बदल जाता है जिसे न धमकियाँ रोक सकती हैं और न लालच खरीद सकता है।

वह माएँ जो अपने जवान बेटों को राह-ए-हक़ में क़ुरबान करती हैं, वह बाप जो अपने बेटों के जनाज़ों को फ़ख्र से उठाते हैं, वह बहनें जो आँसुओं को ज़ब्त करके सब्र का पैकर बन जाती हैं—यह सब इस आयत की अमली तफ़सीर हैं। उनके नज़दीक ज़िंदगी का मफ़हूम बदल चुका है; उनके लिए इज़्ज़त, आसाइश और सलामती का मेयार वह नहीं जो दुनिया ने मुक़र्रर किया है, बल्कि वह है जो अल्लाह ने तय किया है।

उनके यहाँ शहादत एक दुखद घटना नहीं बल्कि एक सआदत है। यह वह मुकाम है जहाँ इंसान अपनी फ़ानी ज़िंदगी को एक अबदी हक़ीक़त में ढाल देता है। जब एक जवान अपने ख़ून से ज़मीन को रंगता है तो दरअसल वह एक नई तारीख लिखता है, ऐसी तारीख जिसके अल्फाज़ मिटाए नहीं जा सकते। यही वजह है कि उनके दुश्मन जितनी शिद्दत से हमला करते हैं, उतनी ही शिद्दत से उनका ईमान मज़बूत हो जाता है। क्योंकि वह जानते हैं कि जो राह अल्लाह की हो, उसमें हर नुक़सान दरअसल एक नई फतह का पेश-ख़ेमा होता है।

मगर इसी मंज़र के दूसरे किनारे पर एक और हक़ीक़त भी मौजूद है। एक तल्ख़, कड़वी और शर्मनाक हक़ीक़त। वह नाम-निहाद मुस्लिम मुल्क जो साधनों में बेपनाह हैं, जिनके ख़ज़ाने लबरेज़ हैं, जिनके ईवान-ए-क़ुदरत और इख़्तियार के मराकिज़ हैं, वही सबसे ज़्यादा ख़ामोश हैं। उनकी ज़बानें गूँगी हैं, उनके ज़मीर सोए हुए हैं, और उनके दिल दुनियावी मफ़ाद की ज़ंजीरों में जकड़े हुए हैं।

यह वही लोग हैं जिनके बारे में इस आयत ने पेशगी तौर पर ख़बरदार किया था। उनके लिए तिजारत का नुक़सान एक सानिहा है मगर उम्मत का ज़वाल नहीं; उनके लिए इक़्तिदार का ख़तरा एक बोहरान है मगर मज़लूमों का ख़ून नहीं; उनके लिए आलमी दबाव एक मसला है मगर हक़ का दिफ़ा नहीं।

यह वह दुखद स्थिति है जो उम्मत के ज़वाल की सबसे बड़ी वजह बन चुकी है।

यह ख़ामोशी महज़ एक रवैय्या नहीं बल्कि एक एलान है। एक ऐसा एलान जो यह बताता है कि उनके दिलों में अल्लाह की मोहब्बत किस दर्जे पर है। क्योंकि जब दिल में अल्लाह की मोहब्बत ग़ालिब हो तो इंसान ख़ामोश नहीं रह सकता, वह उठता है, बोलता है, और अगर ज़रूरत पड़े तो क़ुरबानी भी देता है। मगर जब दिल दुनिया की मोहब्बत से भर जाए तो ज़बानें बंद हो जाती हैं और ज़मीर सो जाते हैं।

इतिहास गवाह है कि जुल्म कभी अपनी ताकत से नहीं जीता, बल्कि मज़लूम के समर्थकों की ख़ामोशी से जीता है। जब हक़ के पैरोकार अकेले रह जाएँ और बाकी सब तमाशाई बन जाएँ, तो जुल्म को रास्ता मिल जाता है। यही वह मुकाम है जहाँ सूरह तौबा की यह आयत एक फैसला बनकर सामने आती है, एक ऐसा फैसला जो सिर्फ व्यक्तियों का नहीं बल्कि क़ौमों का मुक़द्दर तय करता है।

आज का दौर एक फ़ैसलाकुन मोड़ पर खड़ा है। यह वह लम्हा है जब हर शख़्स को अपना मुकाम मुतअय्यन करना है।

क्या वह उन लोगों के साथ खड़ा होगा जो हक़ के लिए लड़ रहे हैं, जो अपनी जानें क़ुरबान कर रहे हैं, जो तारीख रक़म कर रहे हैं?

या वह उन लोगों में शामिल होगा जो ख़ामोश हैं, जो डरे हुए हैं, जो अपने मफ़ाद के क़ैदी बन चुके हैं?

यह चुनाव आसान नहीं, मगर नागुज़ीर है। क्योंकि इस चुनाव से न सिर्फ इंसान की दुनिया बल्कि उसकी आख़िरत भी वाबस्ता है।

सूरह तौबा की आयत 24 आज भी उसी शिद्दत से पुकार रही है जिस शिद्दत से वह नुज़ूल के वक़्त पुकार रही थी।

वह हमें झिंझोड़ रही है, हमें आईना दिखा रही है, हमें मजबूर कर रही है कि हम अपनी महबूबियात का अज़-सर-ए-नौ ताअय्युन करें।

क्योंकि आखिरकार, इंसान वही होता है जिससे वह मोहब्बत करता है; और अगर उसकी सबसे बड़ी मोहब्बत अल्लाह नहीं, तो फिर उसके ईमान की बुनियादें खोखली हैं।

यही वह हक़ीक़त है जिसे समझना आज के दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत है। यही वह पैग़ाम है जो ईरान और लेबनान के मोमिनीन अपने ख़ून से लिख रहे हैं।

और यही वह सबक़ है जिसे नज़रअंदाज़ करने वाली क़ौमें तारीख के अंधेरों में गुम हो जाती हैं।

अब फैसला हमारे हाथ में है कि हम अपनी महबूबियात को किसके ताबे करते हैं, अपने ईमान को किस हद तक ले जाते हैं, और तारीख में अपना नाम किस सफ़ में लिखवाते हैं।

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