रविवार 27 सितंबर 2026 - 09:34
मौजूदा हालात में दुश्मनों की हार के लिए दुआ करना हमारी मुख्य ज़िम्मेदारियों में से है

हौज़ा / हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.ल.) के हरम के वक्ता हुज्ज़तुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन सैयद सादिक मीरशफीई ने जंग-ए-अहज़ाब का ज़िक्र करते हुए कहा कि उस समय पूरी बातिल ताकतें पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) के सामने एकजुट हो गई थीं। उन्होंने आज के ईरान के हालात को भी उस युद्ध से मिलता-जुलता बताया और कहा कि रसूले अकरम (स.ल.) हमले की रात सुबह तक मस्जिद में दुआ और इबादत में व्यस्त रहे तथा अल्लाह से जीत की खुशखबरी प्राप्त की। इसलिए हमें भी दुआ की ताकत से गाफ़िल नहीं होना चाहिए और रसूल (स.ल.) की पैरवी करते हुए दुश्मनों की हार के लिए अल्लाह से मदद मांगनी चाहिए।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्ज़तुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन सैयद सादिक मीरशफीई ने पिछली रात हरम-ए-बानू-ए-करामत में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में कहा कि पैग़म्बरों, अल्लाह के वलियों और उनके अनुयायियों की लगातार परंपरा कभी भी युद्ध शुरू करने की नहीं रही है। यही कारण है कि युद्ध हमेशा दुश्मनों की ओर से थोपे गए और उन्होंने अपने जीवन तथा सम्मान की रक्षा की।

उन्होंने कहा कि इस्लामी क्रांति की शुरुआत से ईरान की जनता और देश पर जो युद्ध थोपे गए, वे भी इस्लाम के दुश्मनों की साजिशों का हिस्सा थे और आज भी वही चालें जारी हैं। मौजूदा स्थिति बेहद विशेष है, क्योंकि इस बार दुश्मनों ने खुले तौर पर अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए ईरान की सरकार और जनता के सामने मांगें रखी हैं और उन्हें पूरा न करने की स्थिति में बमबारी की धमकी दी जा रही है।

हरम-ए-बानू-ए-करामत के वक्ता ने कहा कि नियम यह है कि बातिल की कोई स्थायी जड़ और अस्तित्व नहीं होता। बातिल ताकतों को कुछ समय के लिए अवसर मिल सकता है और वे अपना प्रभाव दिखा सकती हैं, लेकिन अंततः उनका अंत निश्चित है, जबकि सत्य हमेशा कायम रहता है। यह अल्लाह का सच्चा वादा है।

हुज्ज़तुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन मीरशफीई ने कहा कि अल्लाह की निश्चित सुन्नत यह है कि हज़रत इमाम मेंहदी (अ.स.) के ज़हूर और पाक इमामों (अ.स.) की रजअत के बाद सभी बातिल सरकारें समाप्त हो जाएंगी और अहले-बैत (अ.) का मक्तब पूरी दुनिया में स्थापित और लागू होगा।

उन्होंने जंग-ए-खंदक (अहज़ाब) का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय बातिल का पूरा मोर्चा पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल ) के सामने खड़ा था। आज ईरान के हालात भी कुछ हद तक उसी युद्ध जैसे हैं। रसूले ख़ुदा (स.) हमले की रात से सुबह तक मस्जिद में दुआ और अल्लाह के सामने विनम्रता में व्यस्त रहे और उससे मदद तथा विजय की प्रार्थना की।

उन्होंने आगे कहा कि हालांकि अल्लाह ने हक़ के मोर्चे को जीत का वादा दिया है, लेकिन आम जनता की जिम्मेदारी है कि वह दुआ करे। कुरआन की आयतों और मासूम इमामों (अ.स..) की रिवायतों के अनुसार, दुआ के माध्यम से अल्लाह की विशेष कृपा और उसकी रहमत के दरवाज़े खुलते हैं।

हुज्ज़तुल इस्लाम मीरशफीई ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में हमारी जिम्मेदारी है कि हम दुश्मनों की हार और अपमान तथा पूरी दुनिया में प्रतिरोध के मोर्चों की सफलता के लिए दुआ करें। इसके साथ तवस्सुल भी करें, अल्लाह के दरबार में सम्मान और प्रतिष्ठा रखने वाली हस्तियों से दिली संबंध स्थापित करें, अहले-बैत (अ.स..) से प्रेम और मोहब्बत रखें, उन्हें अल्लाह की कृपा का माध्यम बनाएं और उनकी शफ़ाअत की मांग करें।

उन्होंने कहा कि अहले-बैत (अ.स.) से तवस्सुल अल्लाह का आदेश है, क्योंकि अल्लाह अपने रसूल (स.ल.) से फरमाता है कि यदि उम्मत आपको तकलीफ़ देती है तो उन्हें माफ कर दें और मेरे सामने भी उनकी माफी के लिए दुआ करें।

हरम-ए-बानू-ए-करामत के वक्ता ने अंत में कहा कि तवस्सुल का रास्ता शुद्ध तौहीदी रास्ता है। सबसे शक्तिशाली तवस्सुल में से एक हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.ल.) से तवस्सुल है, क्योंकि इस महान बीबी का अल्लाह के निकट विशेष मकाम और प्रतिष्ठा है और उन्हें शफ़ाअत का ऐसा विशेष दर्जा प्राप्त है कि वे शियों की शफ़ाअत कर उन्हें जन्नत में दाखिल कराने का माध्यम बन सकती हैं।

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