हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हौज़ा-ए-इल्मिया के प्रमुख ने हिजबुल्लाह लेबनान के महासचिव शेख नईम कासिम के नाम जारी संदेश में कहा कि दुश्मन हमेशा कोशिश करता रहा है कि प्रतिरोध के मोर्चों को एक-दूसरे से अलग कर दे, ताकि हर एक को अकेले घुटने टेकने पर मजबूर किया जा सके। लेकिन इन दो वर्षों की घटनाओं ने साबित कर दिया है कि तेहरान से बेरूत तक, गाजा से सना और बगदाद तक तथा हुर्मुज़ स्ट्रेट से बाबुल-मंदब तक प्रतिरोध के मोर्चे एक ही एकजुट मोर्चे के अलग-अलग रूप हैं। यह एकता किसी प्रतिनिधि संबंध पर आधारित नहीं है, बल्कि साझा ईमान, साझा दुश्मन तथा साझा आदर्शों और विचारों से पैदा हुआ संबंध है। इसमें प्रत्येक मोर्चा अपनी इच्छा और निर्णय के अनुसार, एक ही रास्ते पर, अपने राष्ट्रीय रणनीतिक हितों, वास्तविक क्षेत्रीय हितों और उम्मते-इस्लामिया के महान हितों की रक्षा के लिए आगे बढ़ता है।
हौज़ा-ए-इल्मिया के प्रमुख के संदेश का पूरा पाठ इस प्रकार है:
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
“ईमान वालों में कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने अल्लाह से किए हुए वादे को सच्चा कर दिखाया। उनमें से कुछ ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दी और कुछ अभी प्रतीक्षा कर रहे हैं और उन्होंने अपने रवैये में कोई बदलाव नहीं किया।” (अहज़ाब, 23)
मेरे प्रिय भाई और मुजाहिद आलिम, हज़रत हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन जनाब शेख नईम कासिम,
हिजबुल्लाह लेबनान के सम्मानित महासचिव (अल्लाह उनकी रक्षा और सहायता करे)
आपके धैर्य के बदले आप पर सलाम हो, और कितना अच्छा है अंतिम घर।
27 सितंबर 2024 की उस शाम को बीते दो वर्ष हो गए हैं, जब ज़ायोनी दुश्मन ने अमेरिकी समर्थन से बेरूत के दाहिया इलाके पर दर्जनों बंकर भेदी बम गिराए और यह समझा कि सैयद-ए-मुकावमत की आवाज़ को दबाकर शायद प्रतिरोध का चिराग भी बुझा देगा। “یُرِیدُونَ لِیُطْفِئُوا نُورَ اللَّهِ بِأَفْوَاهِهِمْ وَاللَّهُ مُتِمُّ نُورِهِ وَلَوْ کَرِهَ الْکَافِرُونَवे अपने मुंह से अल्लाह के प्रकाश को बुझाना चाहते हैं, लेकिन अल्लाह अपने प्रकाश को पूरा करके रहेगा, चाहे काफिरों को यह कितना ही अप्रिय क्यों न लगे।”
अब सय्यदुश्शोहदा-ए-उम्मत, हज़रत हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सैयद हसन नसरुल्लाह और उनके सच्चे एवं पुराने साथी हज़रत हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन शहीद सैयद हाशिम सफीउद्दीन (रिज़वानुल्लाह तआला अलैहिमा) की शहादत की दूसरी बरसी पर हौज़ा-ए-इल्मिया, शिक्षकों, विद्वानों और छात्रों की ओर से आपको, इन दोनों शहीदों के सम्मानित परिवारों, गौरवशाली हिजबुल्लाह और सम्मानित लेबनानी राष्ट्र को एक बार फिर संवेदना व्यक्त करते हुए कुछ बिंदु प्रस्तुत करता हूं।
पहला: वह खून जिसने दुश्मन की सारी गणनाओं को उलट दिया दुश्मनों का मानना था कि नेतृत्व को समाप्त कर देने से प्रतिरोध का ढांचा बिखर जाएगा। यही गलती उन्होंने इससे पहले सैयद अब्बास मुसावी और हाज इमाद मुगनियह की शहादत के समय की थी और आज इमाम शहीद की शहादत के मामले में भी वे इसी गलती में हैं। लेकिन दो वर्ष बीत गए और दुनिया ने जो देखा, वह विनाश नहीं, बल्कि नेतृत्व का पुनर्निर्माण, मैदान में दृढ़ता और शक्ति तथा दिलों और विचारों में प्रतिरोध के मोर्चे का विस्तार था।
यही वह अटल ईश्वरीय परंपरा है जो शहीद के खून को उम्मत के जीवन का बीज बना देती है। “وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذِینَ قُتِلُوا فِی سَبِیلِ اللَّهِ أَمْوَاتًا بَلْ أَحْیَاءٌ عِنْدَ رَبِّهِمْ یُرْزَقُونَऔर जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे गए, उन्हें मृत न समझो, बल्कि वे अपने रब के पास जीवित हैं और उन्हें रोज़ी दी जाती है।” और यही वह सच्चाई है जिसे सैयद शहीद ने बार-बार अपनी जुबान पर लाया: “हम हारते नहीं हैं; अगर हम जीतते हैं तो जीतते हैं और अगर शहीद हो जाते हैं, तब भी जीतते हैं।”
आज सैयद हसन नसरुल्लाह केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि इस्लामी दुनिया की एक अमर सच्चाई और जीवनदायी विचारधारा हैं। ऐसी विचारधारा, जो शिया समुदाय और लेबनान की सीमाओं से आगे बढ़कर दुनिया के स्वतंत्र लोगों की अंतरात्मा में जगह बना चुकी है।
दूसरा: सय्यद-ए-मुकावमत, एक मुजाहिद आलिम और बहुआयामी व्यक्तित्व वह महान शहीद नजफ और क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया की परवरिश में पले-बढ़े थे और उन्होंने साबित किया कि असली शिया धार्मिक विद्वत्ता ज्ञान और कर्म, बुद्धिमत्ता और साहस तथा आध्यात्मिकता और राजनीति को एक ही व्यक्तित्व में समाहित कर सकती है। वह नैतिक गुणों के प्रतीक और अरब एवं इस्लामी सम्मान के प्रतीक थे। उन्हें रणनीतिक और गहरी राजनीतिक समझ, प्रभावी प्रशासन और मैदानी साहस प्राप्त था। उनकी बात की सच्चाई ऐसी थी कि उनके दुश्मन भी उसे प्रमाण के रूप में स्वीकार करते थे।
उनका सबसे बड़ा सबक हम सभी के लिए यह है कि खाली हाथ, लेकिन मजबूत इरादे के साथ छोटे अवसरों से बड़ी क्षमताएं पैदा की जा सकती हैं। इस सबका रहस्य उनकी विलायत से जुड़ी निष्ठा तथा इमाम खुमैनी (कुद्दिस सिर्रह) और इमाम शहीद हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली खामेनेई (रिज़वानुल्लाह अलैह) के रास्ते पर चलना था। हौज़ा-ए-इल्मिया ऐसे बेटे पर गर्व करते हैं और उन्हें आज के छात्रों की पीढ़ी के लिए “मैदान में आलिम” का एक उज्ज्वल उदाहरण मानते हैं।
तीसरा: शहीदों का कारवां हम शहीद सैयद हाशिम सफीउद्दीन, सैयद-ए-मुकावमत के वफादार साथी और हमेशा के सहयोगी तथा उन सभी कमांडरों, मुजाहिदों और निर्दोष लोगों को श्रद्धांजलि पेश करते हैं, जिन्होंने इस रास्ते में अपनी जान कुर्बान की। यह कारवां शहीद शेख रागिब हर्ब और शहीद सैयद अब्बास मुसावी से लेकर शहीद हाज इमाद मुगनियह, शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह और हाज कासिम तक तथा प्रतिरोध के मोर्चे के सभी शहीदों के साथ जिहाद, निष्ठा, सच्चाई और वफादारी की एक निरंतर कड़ी है, जिसकी स्थिति का वर्णन इस ईश्वरीय कथन में है: “وَمَا بَدَّلُوا تَبْدِیلًا और उन्होंने अपने रवैये में कोई बदलाव नहीं किया।”
चौथा: आप इसी सिलसिले के ध्वजवाहक हैं प्रतिरोध के इतिहास के सबसे कठिन दिनों में, जब दुश्मन यह समझ रहा था कि हिजबुल्लाह बिना नेतृत्व के रह गया है, आपने अन्य सक्षम और बुद्धिमान कमांडरों के साथ, जिहाद और प्रशासन के क्षेत्र में अपने पुराने अनुभव तथा शहीद महासचिवों के साथ तीन दशकों से अधिक की संगति के आधार पर एक भारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली और इस झंडे को ऊंचा रखा।
हिजबुल्लाह की आंतरिक एकता की रक्षा और उसे दोबारा संगठित एवं मजबूत करने में, लेबनान की राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने में, दुश्मन की साजिशों को विफल करने में, इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेतृत्व के साथ मजबूत वादे को दोहराने में और प्रतिरोध के मोर्चे को क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्तर तक विस्तार देने में आपकी बुद्धिमत्ता सराहनीय और सम्मान के योग्य है।
हौज़ा-ए-इल्मिया आपको एक विद्वान आलिम, विचारशील लेखक और बुद्धिमान नेता के रूप में पहचानता है और जैसा कि हमने पहले भी घोषणा की है, पूरी ताकत के साथ आपके साथ खड़ा है। बिना किसी संदेह के दुश्मनों पर सहायता, विजय और अंतिम सफलता, इजरायल का विनाश, अमेरिकी महाशक्ति और पतनशील पश्चिमी सभ्यता का अंत, अल्लाह की निश्चित परंपरा तथा प्रतिरोध के मोर्चे, महान लेबनानी राष्ट्र, प्रिय فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغَالِبُونَ हिजबुल्लाह और सभी मुजाहिदों का अंतिम भाग्य है।
पांचवां: हिजबुल्लाह के मुजाहिद भाइयों के नाम हम हिजबुल्लाह के कमांडरों, जिम्मेदार अधिकारियों, प्रतिनिधियों, मुजाहिदों तथा सहायता, मीडिया और सांस्कृतिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों को सलाम पेश करते हैं। आप सैयदुश्शुहदा के खून के अमानतदार हैं और आपने अपने ईमान, अनुशासन और दूरदर्शिता से साबित किया है कि हिजबुल्लाह व्यक्तियों पर नहीं, बल्कि ज्ञान, ईमान, संकल्प और विलायत पर कायम है। हम उन गौरवशाली जांबाजों को, विशेष रूप से पेजर धमाकों और हालिया युद्ध की घटनाओं से प्रभावित लोगों को श्रद्धांजलि पेश करते हैं, जिन्होंने आंखों और हाथों पर घावों के बावजूद आध्यात्मिक बसीरत और मजबूत इरादे का प्रदर्शन किया। “निस्संदेह अल्लाह का दल ही विजयी है।”
छठा: सम्मानित लेबनानी राष्ट्र और उसके वफादार शियाओं के नाम हम महान लेबनानी राष्ट्र, विशेष रूप से दक्षिण, दाहिया और बेका के धैर्यवान लोगों का दिल से आभार व्यक्त करते हैं। आपने विस्थापन को सम्मान और दूरदर्शिता के साथ सहन किया, अपने घरों की तबाही को धैर्य और ईमान के साथ पीछे छोड़ा और अपने क्षेत्रों में लौटकर जनता और प्रतिरोध के अटूट संबंध को दुनिया के सामने पेश किया।
लेबनानी शहीदों की माताएं, पिता, पत्नियां और बच्चे हज़रत ज़ैनब (सलामुल्लाह अलैहा) की तरह दृढ़ता के साथ खड़े रहे और उन्होंने इस प्रतिरोध की महानता को उसके हथियारों में नहीं, बल्कि एक जीवित राष्ट्र के संकल्प में अर्थ दिया। लेबनान के शिया जबल-ए-आमिल की विरासत के वारिस हैं। यह वह परंपरा है जिसने शहीद अव्वल और शहीद सानी जैसे विद्वानों को तैयार किया और लेबनानी मूल के विद्वान, जैसे मुहक्किक करकी और शेख बहाई, इसी परंपरा से निकले। इसी के माध्यम से लेबनान और ईरान के हौज़ा-ए-इल्मिया के बीच एक विद्वतापूर्ण और आध्यात्मिक संबंध स्थापित हुआ, जो आज प्रतिरोध के मोर्चे पर दिखाई देता है। इसी तरह लेबनान के किसी भी धर्म और वर्ग से जुड़े उन सभी लोगों का भी हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने प्रतिरोध के साथ खड़े होकर राष्ट्रीय एकता की रक्षा की। जान लें कि आप इतिहास में अहले-बैत (अलैहिमुस्सलाम) के बेहतरीन समर्थकों में शामिल हैं और आपके धैर्य एवं प्रतिरोध के कारण पैगंबरों और अल्लाह के नेक बंदों की आकांक्षाएं पूरी हो रही हैं। दुनिया अपने इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है, वैश्विक संबंध बदल रहे हैं, सत्य और असत्य के बीच ऐतिहासिक संघर्ष अपने अंत के करीब पहुंच रहा है और एक नई इस्लामी सभ्यता का निर्माण हो रहा है। आप इन सभी परिवर्तनों में भागीदार हैं। आज और आने वाला इतिहास आपका है और ईरान, इराक और यमन की सभी त्यागी जनता आपके बलिदानों की ऋणी है।
सातवां: इस्लामी गणराज्य ईरान की शक्ति ईरानी राष्ट्र ने अमेरिका और ज़ायोनियों द्वारा थोपी गई जंग में अपने इमाम और नेता की शहादत का घाव भी अपने दिल पर सहा। लेकिन दुश्मन, जो इस्लामी व्यवस्था के पतन की इच्छा रखता था, ने आश्चर्य के साथ देखा कि संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर नेतृत्व हज़रत आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी खामेनेई (मुद्दज़िल्लुहुलआली) को सौंप दिया गया और पूरी जनता एकता एवं दृढ़ता के साथ विलायत के चारों ओर एकजुट हो गई।
इस्लामी गणराज्य इस कठिन परीक्षा से और अधिक मजबूत एवं संगठित होकर निकला और उसने प्रतिरोध के समर्थन को कोई अस्थायी कदम नहीं, बल्कि रणनीतिक और सिद्धांत आधारित नीति घोषित किया। यह उस संबंध का स्पष्ट उदाहरण है जिसे कोई दबाव कमजोर नहीं कर सकता।
आज इस्लामी गणराज्य की व्यवस्था, वैश्विक युद्ध, घेराबंदी, प्रतिबंधों, अत्याचारों तथा सैन्य, राजनीतिक, आर्थिक, मीडिया और पहचान से जुड़े व्यापक और जटिल युद्ध के बावजूद, पूरी शक्ति के साथ, एकजुट, संगठित और साहसी जनता, दृढ़ इरादे वाले जिम्मेदार अधिकारियों, सतर्क और शक्तिशाली कमांडरों तथा सशस्त्र बलों और दुनिया के दूरदराज क्षेत्रों में अनेक सहयोगियों के साथ अंतिम विजय के करीब है और इंशाअल्लाह सभी मुजाहिदों के साथ सभी बाधाओं और कठिनाइयों को सम्मान, शक्ति और बुद्धिमत्ता के साथ पार करेगा।
आठवां: मोर्चों की एकता, एक रणनीतिक सच्चाई दुश्मन हमेशा कोशिश करता रहा है कि प्रतिरोध के मोर्चों को एक-दूसरे से अलग कर दे, ताकि हर एक को अकेले घुटने टेकने पर मजबूर किया जा सके। लेकिन इन दो वर्षों की घटनाओं ने साबित कर दिया है कि तेहरान से बेरूत तक, गाजा से सना और बगदाद तक तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से बाबुल-मंदब तक प्रतिरोध के मोर्चे एक ही एकजुट मोर्चे के अलग-अलग रूप हैं। यह एकता किसी प्रतिनिधि संबंध पर आधारित नहीं है। यह साझा ईमान, साझा दुश्मन और साझा आदर्शों एवं विचारों से पैदा हुआ संबंध है, जिसमें प्रत्येक मोर्चा अपनी इच्छा और निर्णय के अनुसार, एक ही रास्ते पर, राष्ट्रीय रणनीतिक हितों, वास्तविक क्षेत्रीय हितों और उम्मते-इस्लामिया के महान हितों की रक्षा के लिए आगे बढ़ता है। ईरानी कमांडरों और हिजबुल्लाह के शहीदों का खून, जो एक ही मिट्टी पर बहा, इसी संबंध का प्रतीक है। “إِنَّ اللَّهَ یُحِبُّ الَّذِینَ یُقَاتِلُونَ فِی سَبِیلِهِ صَفًّا کَأَنَّهُمْ بُنْیَانٌ مَرْصُوصٌनिस्संदेह अल्लाह उन लोगों से प्रेम करता है जो उसकी राह में इस प्रकार पंक्तिबद्ध होकर लड़ते हैं, मानो वे सीसे की मजबूत दीवार हों।”
नौवां: हौज़ा-ए-इल्मिया का संकल्प हौज़ा-ए-इल्मिया अपने वादे पर कायम हैं और इस महान शहीद की बौद्धिक विरासत की रक्षा के लिए फिक़्ह, राजनीतिक चिंतन, प्रशासन और जिहाद की नैतिकता के क्षेत्रों में, इस विरासत का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन करने में, लेबनानी हौज़ा-ए-इल्मिया और विद्वानों के साथ विद्वतापूर्ण संबंधों को बढ़ाने में तथा प्रतिरोध के मोर्चे को किसी भी प्रकार की शैक्षिक, आध्यात्मिक और प्रचार संबंधी सहायता देने में अपना योगदान और भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं।
अंत में, एक बार फिर सैयदुश्शुहदा-ए-उम्मत और प्रतिरोध के सभी शहीदों को श्रद्धांजलि पेश करते हैं और अल्लाह तआला से आपके तथा हिजबुल्लाह के सभी मुजाहिद भाइयों के लिए सफलता, स्वास्थ्य, दृढ़ता और ईश्वरीय सहायता की दुआ करते हैं। इस उम्मीद के साथ कि इन शहीदों के खून की बरकत से बैतुल मुकद्दस आजाद हो और अल्लाह का सच्चा वादा पूरा हो। हिजबुल्लाह, लेबनान के सम्मानित शियाओं और मुसलमानों तथा पूरी उम्मते-इस्लामिया पर अल्लाह की सलामती, रहमत और उसकी व्यापक कृपा हो।
“وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذِینَ قُتِلُوا فِی سَبِیلِ اللَّهِ أَمْوَاتًا بَلْ أَحْیَاءٌ عِنْدَ رَبِّهِمْ یُرْزَقُونَऔर जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे गए, उन्हें मृत न समझो, बल्कि वे अपने रब के पास जीवित हैं और उन्हें रोज़ी दी जाती है।” (आले इमरान, 169)
वस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह
अली रज़ा अराफी
प्रमुख, हौज़ा-ए-इल्मिया
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