हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,बैतूल मध्य प्रदेश में मस्जिदे हज़रत मेहंदी अ.स. के निर्माण के मौके पर विभिन्न उलेमा इकराम ने तकरीर की,और कहां,मस्जिद केवल नमाज़ अदा करने की जगह नहीं, बल्कि ईमान की मज़बूती, क़ुरआन और अहल-ए-बैत की शिक्षा, चरित्र निर्माण, नई पीढ़ी की तरबियत, सामाजिक एकता और हक़ की पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र है। मस्जिद के निर्माण से लेकर उसे आबाद रखने और उसके वास्तविक उद्देश्य को पूरा करने तक कई जिम्मेदारियाँ जुड़ी हुई हैं।

गुलबर्गा के मौलाना हाफ़िज़ मिर्ज़ा सादिक़ अली बेग़ और कानपुर में रह रहे मौलाना शाहिद इमाम बाक़री ने मस्जिद की अहमियत, उसके सामाजिक एवं आध्यात्मिक दायित्व और शहीदों की महानता पर रौशनी डाली।
मस्जिद का निर्माण ही नहीं, उसे आबाद रखना भी जरूरी:

मौलाना हाफ़िज़ मिर्ज़ा सादिक़ अली बेग़:
गुलबर्गा के मौलाना हाफ़िज़ मिर्ज़ा सादिक़ अली बेग़ ने सूरह अत-तौबा का हवाला देते हुए कहा कि क़ुरआन मस्जिद से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं की ओर ध्यान दिलाता है। इसमें यह बताया गया है कि मस्जिद बनाने के लिए कौन लोग योग्य हैं और मस्जिद बनाने वालों में कौन से गुण होने चाहिए। इसी तरह मस्जिद की देखरेख करने वाले मुतवल्ली में भी विशेष गुण और जिम्मेदारी का होना ज़रूरी है।
उन्होंने कहा कि कभी-कभी मस्जिदें फूट डालने या विवाद पैदा करने के उद्देश्य से भी बनाई जा सकती हैं। इसलिए केवल मस्जिद की इमारत खड़ी कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह देखना भी ज़रूरी है कि उसका उद्देश्य क्या है और उससे समाज को क्या लाभ पहुंच रहा है।
मौलाना हाफ़िज़ मिर्ज़ा सादिक़ अली बेग़ ने कहा कि मस्जिद का निर्माण निश्चित रूप से अल्लाह को पसंद है, लेकिन अल्लाह की राह में शहादत और बलिदान का स्थान इससे भी ऊंचा है। उन्होंने कहा कि अल्लाह की राह में शहादत हासिल करना हरमैन शरीफ़ैन की सेवा से भी अधिक पुण्य का कार्य है।
उन्होंने मस्जिद से जुड़े तीन महत्वपूर्ण चरणों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि पहला चरण मस्जिद का निर्माण करना, उसे जीवंत और साफ-सुथरा रखना तथा उसका उचित सम्मान करना है। दूसरा चरण यह है कि मस्जिद का उद्देश्य और उसके परिणाम क्या हैं तथा वहाँ आने वाले लोगों को उससे क्या लाभ प्राप्त होता है। तीसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शैतान लगातार इंसान को मस्जिद और सामूहिक नमाज़ से दूर रखने की कोशिश करता है और इसके लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाता है। इसलिए मुसलमानों को इन कोशिशों से सावधान रहते हुए मस्जिदों को आबाद करना चाहिए।
मस्जिद प्रतिरोध, समझ और नई पीढ़ी की तरबियत का

केंद्र है: मौलाना शाहिद इमाम बाक़री
कानपुर में रह रहे मौलाना शाहिद इमाम बाक़री ने मस्जिद को प्रतिरोध, समझ और सामाजिक प्रशिक्षण का केंद्र बताते हुए कहा कि सवाल यह है कि ईरानियों, यमनियों, हिज़्बुल्लाह के सदस्यों और हशद अल-शाबी जैसे लोगों में दृढ़ता और प्रतिरोध की भावना कैसे पैदा होती है? इसका जवाब आस्था में है।
उन्होंने कहा कि अगला सवाल यह है कि ऐसे आस्थावान और नेक लोग कहाँ तैयार होते हैं? इसका जवाब भी मस्जिद है। मस्जिद केवल इबादत करने वालों को तैयार नहीं करती, बल्कि प्रतिरोध की भावना, गहरी समझ और सामाजिक जिम्मेदारी रखने वाले लोगों की भी तरबियत करती है।
मौलाना शाहिद इमाम बाक़री ने कहा कि यदि हम सच्चाई के रास्ते पर चलने वाले लोगों और शहीद नेताओं के समर्पित अनुयायियों जैसा जीवन चाहते हैं, तो इसका रास्ता भी मस्जिद से होकर गुजरता है। मस्जिद ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ लोगों की धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक जरूरतों का ध्यान रखा जाए।
उन्होंने बैतुल की मस्जिद का उल्लेख करते हुए कहा कि वहाँ नमाज़ के साथ बच्चों की परवरिश और उनकी सकारात्मक गतिविधियों के लिए विभिन्न कार्यक्रम और खेल आयोजित किए जाते हैं। उन्होंने दुआ की कि हर मस्जिद में ऐसी पहल की जाए, ताकि मस्जिदें नई पीढ़ी की बेहतर तरबियत का केंद्र बन सकें।
दस वर्ष पहले रखी गई नींव बनी ईमान और तरबियत के केंद्र की शुरुआत:

कार्यक्रम में कहा गया कि दस वर्ष पहले इस मस्जिद की नींव रखी गई थी। यह केवल एक इमारत की नींव रखने का अवसर नहीं था, बल्कि अल्लाह की याद, क़ुरआन की शिक्षा, पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.ल.) और उनके अहल-ए-बैत के मक़ाम को समझने, नमाज़ कायम करने, नई पीढ़ियों की तरबियत और समाज में ईमान एवं समझ की रोशनी फैलाने वाले केंद्र की शुरुआत थी।
क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला फरमाता है: अल्लाह की मस्जिदों को वही लोग आबाद करते हैं जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हैं।वक्ताओं ने कहा कि मस्जिद का वास्तविक आबाद होना केवल उसकी भौतिक इमारत के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि दिलों को संवारना, चरित्र निर्माण करना और आने वाली पीढ़ियों की सही तरबियत करना ही उसकी वास्तविक आबादी है।
शहीदों की महानता और उनकी विरासत को जीवित रखने पर जोर:
कार्यक्रम में शहीदों की महानता और उनके सम्मान पर भी विशेष रूप से प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने कहा कि जो व्यक्ति इस्लाम और हक़ की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान करता है, उसका दर्जा अल्लाह के निकट बहुत ऊंचा है।
क़ुरआन की आयतों का हवाला देते हुए कहा गया कि शहीदों को मुर्दा नहीं समझना चाहिए, बल्कि वे अपने पालनहार के पास जीवित हैं और उन्हें रिज़्क दिया जाता है। वक्ताओं ने कहा कि शहीदों की याद को ताजा रखना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उनकी विरासत, संदेश और जिम्मेदारियों को आगे बढ़ाने का माध्यम है।
इस अवसर पर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई की शहादत को भी याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने ज़ुल्म के खिलाफ और न्याय की राह में अपने जीवन को समर्पित किया और उनका बलिदान दुनिया भर में न्याय एवं सत्य के समर्थकों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
वक्ताओं ने कहा कि शहादत किसी व्यक्ति की भौतिक यात्रा का अंत नहीं, बल्कि एक विचार, संदेश और जिम्मेदारी को जीवित रखने का प्रतीक है। शहीद की याद का वास्तविक सम्मान यह है कि उनके संदेश को समझा जाए, अपनी जिम्मेदारियों को पहचाना जाए और उनके सकारात्मक मूल्यों को अपने जीवन में उतारा जाए।
मस्जिद से जुड़े भविष्य के लक्ष्य:
कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि मस्जिद बच्चों को ईमान से जोड़े, युवाओं को क़ुरआन और अहल-ए-बैत से जोड़ने का माध्यम बने, समाज में भाईचारा बढ़ाए और लोगों में सही और गलत के बीच अंतर करने की समझ पैदा करे।
वक्ताओं ने कहा कि आज का कार्यक्रम केवल अतीत को याद करने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य के लिए रास्ता तय करने का अवसर भी है। ऐसी मस्जिद की जरूरत है जहाँ लोग नमाज़ के लिए आएँ, ज्ञान प्राप्त करें, अपने चरित्र को बेहतर बनाएँ और समाज के लिए उपयोगी इंसान बनकर निकलें।
अंत में दुआ की गई कि अल्लाह तआला इस मस्जिद को हमेशा जीवंत और आबाद रखे, इसके संस्थापकों, देखभाल करने वालों और इसे सहयोग देने वाले सभी लोगों की सेवाओं को स्वीकार करे तथा सभी को मस्जिद को उसके वास्तविक अर्थों में आबाद और प्रभावी बनाने की तौफ़ीक़ प्रदान करे।
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