रविवार 6 सितंबर 2026 - 22:51
सहारनपुर में मस्जिद का विध्वंस संविधान और कानून के शासन का मज़ाक है: मौलाना कल्बे जवाद नक़वी

सहारनपुर की मस्जिद के विध्वंस पर मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद के महासचिव ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इस मामले की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की मांग की है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद के विध्वंस पर मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि जिस तरह मस्जिद पर बुलडोज़र चलाया गया, उससे कानून के शासन, संवैधानिक मूल्यों और प्रशासन की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं।

मौलाना कल्बे जवाद नक़वी ने कहा कि यदि किसी निर्माण को कानून के अनुसार हटाना आवश्यक था तो सरकार को कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार है, लेकिन कानून लागू करने वाला कोई भी अधिकारी स्वयं कानून से ऊपर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि अदालत द्वारा दिया गया समय भी ध्यान में नहीं रखा गया, जिसके कारण इस कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं और पूरे मामले की जांच आवश्यक है।

सहारनपुर में मस्जिद का विध्वंस संविधान और कानून के शासन का मज़ाक है: मौलाना कल्ब जवाद नकवी

उन्होंने सवाल उठाया कि मस्जिद को गिराने का लिखित आदेश किस अधिकारी ने जारी किया, उसे किसने मंजूरी दी, जेसीबी और अन्य मशीनरी के इस्तेमाल का कानूनी अधिकार किसके पास था और पूरी कार्रवाई की कमान किस अधिकारी के हाथ में थी? मौलाना ने कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि कार्रवाई न्यायालय के आदेश के पालन में की गई। मूल आदेश को जनता के सामने लाया जाना चाहिए और कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया की भी जांच होनी चाहिए।

मौलाना कल्बे जवाद नक़वी ने सहारनपुर के संबंधित प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि जांच से पहले किसी अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं है, लेकिन किसी अधिकारी को केवल उसके पद के आधार पर जांच से बाहर रखना भी कानून के शासन के विरुद्ध होगा।

उन्होंने कहा कि भारत किसी औपनिवेशिक मानसिकता से नहीं, बल्कि संविधान और कानून के अनुसार चलता है और किसी भी सरकारी पद पर बैठा अधिकारी कानून से ऊपर नहीं हो सकता।

सहारनपुर में मस्जिद का विध्वंस संविधान और कानून के शासन का मज़ाक है: मौलाना कल्ब जवाद नकवी

मौलाना ने स्पष्ट किया कि हम किसी अवैध निर्माण का समर्थन नहीं कर रहे हैं। यदि कोई निर्माण अवैध था तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन यदि कानून लागू करने की प्रक्रिया में ही कानून की अनदेखी की गई है तो जिम्मेदार अधिकारियों से भी जवाब मांगा जाना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि भारत में किसी भी निर्माण को गिराने या हटाने की कार्रवाई संविधान और कानून के अनुसार होनी चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि सरकारी कार्यालयों, राजमार्गों और अन्य सरकारी स्थानों पर मौजूद धार्मिक पूजा स्थलों के मामले में भी समान कानूनी मापदंड क्यों नहीं अपनाए जाते?

मौलाना सैयद कल्बे जवाद नक़वी ने कहा कि वह इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय, इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के समक्ष स्वतंत्र जांच और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही की मांग रखेंगे।

उन्होंने कहा कि यदि किसी अधिकारी द्वारा संवैधानिक और कानूनी सीमाओं का उल्लंघन, अधिकारों का दुरुपयोग या किसी अपराध का प्रमाण मिलता है तो उसके खिलाफ मामला दर्ज किया जाना चाहिए और अदालत में अपराध साबित होने पर कानून के अनुसार कड़ी सजा दी जानी चाहिए।

मौलाना कल्बे जवाद नक़वी ने कहा कि यह मामला केवल एक इमारत की चारदीवारी का नहीं है, बल्कि यह बुनियादी सवाल है कि भारत में कानून सर्वोच्च है या कानून लागू करने वालों की मनमानी। उन्होंने कहा कि हम संविधान के दायरे में न्याय की मांग करते हैं और यदि कोई अधिकारी दोषी साबित होता है तो उसकी कुर्सी नहीं, बल्कि उसके कृत्य को कानून के कटघरे में खड़ा होना चाहिए।

मौलाना कल्बे जवाद नक़वी की प्रमुख मांगें

  1. मस्जिद के विध्वंस का मूल लिखित आदेश जनता के सामने लाया जाए।
  2. आदेश संख्या, तारीख और उस पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी का नाम स्पष्ट किया जाए।
  3. पूरी प्रशासनिक फाइल और नोटशीट सुरक्षित रखी जाए।
  4. सीसीटीवी फुटेज और कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखी जाए।
  5. जेसीबी, डंपर और अन्य सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल के आदेशों की जांच की जाए।
  6. पुलिस और पीएसी की तैनाती के आदेश तथा संबंधित रिकॉर्ड सामने लाए जाएं।
  7. कार्रवाई में शामिल सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच की जाए।
  8. अधिकारों के दुरुपयोग या कानून के उल्लंघन की पुष्टि होने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके कानूनी कार्रवाई की जाए।
  9. अपराध साबित होने की स्थिति में अदालत के माध्यम से कानून के अनुसार सजा दिलाई जाए।
  10. प्रशासनिक भ्रष्टाचार या गंभीर अनियमितता साबित होने पर कड़ी विभागीय कार्रवाई की जाए।

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