हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ख़ुत्बा-ए-जुमा में मौलाना ने तक़वा-ए-इलाही और अल्लाह की इताअत व इबादत की नसीहत करते हुए कहा कि इंसान को अपने जीवन, जवानी, कमाई और उसके ख़र्च के संबंध में क़यामत के दिन जवाब देना होगा। उन्होंने कहा कि मैदान-ए-महशर में इंसान से उसकी उम्र, जवानी, कमाई और कमाई को कहाँ ख़र्च किया, इन विषयों के बारे में सवाल किया जाएगा। इसके अलावा अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की मोहब्बत के बारे में भी सवाल किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि हमें हमेशा तक़वा-ए-इलाही अपनाने और परवरदिगार-ए-आलम की इताअत व इबादत की ओर ध्यान देना चाहिए। इसी संदर्भ में क़ुरआन और तरबियत के विषय पर सूरह अल-हुजुरात की आयतों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि पिछली आयतों में लोगों को किसी ख़बर की पुष्टि किए बिना उस पर भरोसा करने से सावधान किया गया है, जबकि आयत 7 और 8 में रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम की मौजूदगी और ईमान की वास्तविकता को स्पष्ट किया गया है।
अल्लाह के रसूल की बात पर भरोसा ईमान की निशानी
मौलाना ने सूरह अल-हुजुरात की आयत 7 और 8 का उल्लेख करते हुए कहा कि अल्लाह तआला फरमाता है कि याद रखो, तुम्हारे बीच अल्लाह के रसूल मौजूद हैं। यदि वे बहुत-सी बातों में तुम्हारी राय मान लें तो तुम कठिनाइयों में पड़ जाओगे। लेकिन अल्लाह ने तुम्हारे लिए ईमान को प्रिय बना दिया और उसे तुम्हारे दिलों में सुशोभित कर दिया तथा कुफ़्र, फ़िस्क़ और अवज्ञा को तुम्हारे लिए अप्रिय बना दिया।
उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का ईमान अल्लाह और उसके रसूल पर है तो उसे विश्वास रखना चाहिए कि रसूले ख़ुदा जो फरमाएंगे, उसमें भलाई और सत्य होगा और वे जिस बात को पसंद करेंगे, उसमें भी भलाई होगी। मोमिन के लिए अपनी व्यक्तिगत पसंद और इच्छा को दीन के आदेश पर प्राथमिकता देना उचित नहीं है।
मोमिन के लिए दीन ही वास्तविक मापदंड
मौलाना ने कहा कि मोमिन का मापदंड यह नहीं हो सकता कि जो बात उसकी इच्छा और ख़्वाहिश के अनुसार हो, उसे स्वीकार कर ले और जो उसकी इच्छा के अनुरूप न हो, उसे अस्वीकार कर दे। उन्होंने कहा कि दीन के मामले में मापदंड क़ुरआन और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम हैं और ज़माना-ए-ग़ैबत में फ़ुक़हा इस मार्गदर्शन का माध्यम हैं।
उन्होंने कहा कि हमारा मापदंड हमारी व्यक्तिगत इच्छा या नफ़्स नहीं होना चाहिए। मोमिन को अपनी इच्छाओं को दीन के अधीन रखना चाहिए, न कि दीन को अपनी इच्छाओं के अनुसार ढालने का प्रयास करना चाहिए।
किसी ख़बर पर निर्णय से पहले तहक़ीक़ जरूरी
उन्होंने कहा कि इंसान कभी अपनी सीमित जानकारी के आधार पर ऐसी राय या सलाह दे देता है, जो देखने में अच्छी लगती है, लेकिन उसके परिणाम गंभीर और नुकसानदेह हो सकते हैं। क़ुरआन हमें सिखाता है कि किसी सूचना या ख़बर पर कार्रवाई करने से पहले उसकी जांच और पुष्टि कर लेनी चाहिए, ताकि अनजाने में किसी समुदाय को नुकसान न पहुंच जाए और बाद में अपने किए पर पछताना न पड़े।
ईमान केवल ज़बान से इक़रार का नाम नहीं
मौलाना ने कहा कि ईमान केवल ज़बान से स्वीकार करने का नाम नहीं है, बल्कि ईमान की ऐसी स्थिति है जो इंसान के दिल में प्रिय हो जाए और उसके प्रभाव उसके चरित्र तथा व्यवहार में दिखाई दें।
उन्होंने कहा कि ईमान की एक निशानी यह भी है कि इंसान कुफ़्र, फ़िस्क़ और अवज्ञा को मामूली न समझे, बल्कि उसके दिल में इन बुराइयों के प्रति नापसंदगी और नफ़रत पैदा हो।
दिल का सुधार भी आवश्यक
उन्होंने कहा कि सुधार केवल ज़ाहिरी आमाल तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि दिल का सुधार भी आवश्यक है। जब इंसान का दिल पवित्र और सुंदर होता है तो उसके व्यवहार और कर्मों में भी अच्छाई दिखाई देने लगती है। इसलिए धार्मिक और नैतिक सुधार की शुरुआत इंसान के भीतर से होनी चाहिए।
हिदायत मिलने पर घमंड नहीं, अल्लाह का शुक्र करें
मौलाना ने कहा कि इंसान को हिदायत मिलने पर घमंड नहीं करना चाहिए और न ही स्वयं को दूसरों से बेहतर समझना चाहिए। उसे दूसरों को अपना विरोधी या अपमान के योग्य नहीं समझना चाहिए, बल्कि हिदायत की नेमत मिलने पर अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि क़ुरआन ऐसे लोगों को ‘अल-राशिदून’ अर्थात हिदायत पाने वाले लोग कहता है।
नफ़्स को दीन के अधीन रखना ही मोमिन की पहचान
ख़ुत्बे के दौरान उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि मोमिन अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं और ख़्वाहिशों को दीन का मापदंड न बनाए, बल्कि अपने नफ़्स को दीन का تابع और उसके आदेशों के अधीन रखे। वास्तविक ईमान का तकाज़ा यही है कि इंसान अपनी पसंद के बजाय अल्लाह और उसके रसूल के आदेश को प्राथमिकता दे।
ख़ुत्बे के अंत में मौलाना ने उपस्थित मोमिनों के लिए दुआ की और पवित्र स्थलों की हिफ़ाज़त तथा उनकी सुरक्षा के लिए भी बारगाह-ए-इलाही में दुआ की।
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