हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हया ईमान का अनमोल गुण और इंसानी गरिमा की रक्षा करने वाली ढाल है। हर मोमिन के दिल में इस गुण को हासिल करने और उसे बेहतर बनाने की इच्छा होती है। लेकिन इंसान अपने भीतर हया के गुण को कैसे मजबूत कर सकता है? इस संबंध में शंकाओं के समाधान के विशेषज्ञ हुज्जतुल-इस्लाम रज़ा पारचेबाफ ने हया को पुनर्जीवित करने और उसे जीवन में स्थायी बनाने के लिए व्यावहारिक उपाय बताए हैं।
सवाल: अगर किसी व्यक्ति को महसूस हो कि उसके अंदर पर्याप्त हया नहीं है, तो उसे क्या करना चाहिए?
हुज्जतुल-इस्लाम पारचेबाफ का जवाब:
हया का गुण होने या न होने को लेकर चिंता होना स्वयं आध्यात्मिक जीवन और नैतिक ज़मीर की सलामती की सबसे बड़ी निशानी है। इस विषय को समझने के लिए चार पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए: हया की कमी महसूस होने का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, रिवायतों में हया के प्रकार, गलतियों और फिसलनों के कारणों की पहचान और सुधार, तथा हया को पुनर्जीवित करने के व्यावहारिक उपाय।
सच्ची हया और झूठे आत्म-दोष में अंतर
कई बार जिसे व्यक्ति ‘बेहयाई’ समझता है, वास्तव में वह गलत सोच या धार्मिक और नैतिक मामलों में अत्यधिक आत्म-संदेह हो सकता है।
हया के अस्तित्व की निशानी
जिस व्यक्ति के अंदर वास्तव में हया समाप्त हो चुकी हो, वह आम तौर पर हया की कमी को लेकर दुख, चिंता या हीनता महसूस नहीं करता। अगर आपका मन अपनी नैतिक कमियों के प्रति संवेदनशील है और आप अपनी कमियों पर शर्म महसूस करते हैं, तो यह आपके भीतर हया और ईमान के मूल तत्व के मौजूद होने का प्रमाण है।
इमाम सादिक़ (अ.) फ़रमाते हैं:
«لَا إِیمَانَ لِمَنْ لَا حَیَاءَ لَهُ» “जिसमें हया नहीं, उसमें ईमान नहीं।”
हया और ईमान एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए हया की दिली इच्छा आपके भीतर ईमान के वृक्ष के फल के समान है।
खुद को दोषी ठहराने का जाल
कभी-कभी व्यक्ति धार्मिक मामलों में अत्यधिक पूर्णतावाद का शिकार हो जाता है। वह सामान्य व्यवहार, अतीत की अनजाने में हुई गलतियों या यहां तक कि अनैच्छिक विचारों और वसवसों को भी अपनी ‘जन्मजात बेहयाई’ समझने लगता है। खुद को लगातार बेहया कहना सुधार की प्रेरणा को कमजोर कर देता है और निराशा का कारण बन सकता है।
हया के प्रकार: समझदारी वाली हया और कमजोरी वाली शर्म में अंतर
अहलेबैत (अ.) की रिवायतों में हया के अलग-अलग पहलू बताए गए हैं। इसलिए हया और अनावश्यक शर्म को एक ही समझने से बचना चाहिए।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने फ़रमाया:
«الْحَیَاءُ حَیَاءَانِ؛ حَیَاءُ عَقْلٍ وَ حَیَاءُ حُمْقٍ؛ فَحَیَاءُ الْعَقْلِ هُوَ الْعِلْمُ، وَ حَیَاءُ الْحُمْقِ هُوَ الْجَهْلُ» “हया दो प्रकार की है: बुद्धि की हया और मूर्खता की हया। बुद्धि की हया ज्ञान है और मूर्खता की हया अज्ञान है।”
बुद्धि की हया, जो प्रशंसनीय गुण है, इंसान को बुराइयों, पापों, नैतिक अपराधों, गलत बातों और दूसरों की सीमाओं का उल्लंघन करने से रोकती है। यह अल्लाह की महानता के सम्मान और आत्मसम्मान से पैदा होती है।
इसके विपरीत, कमजोरी और अज्ञान की हया में अनुचित संकोच, बेवजह शर्माना, सत्य के लिए आवाज़ उठाने में असमर्थता, धार्मिक और वैज्ञानिक सवाल पूछने में झिझक या अनुचित मांगों को ‘न’ कहने में असमर्थता शामिल है।
दिशा के अनुसार हया के तीन प्रकार भी बताए जा सकते हैं:
अल्लाह से हया: हर समय अल्लाह की उपस्थिति का एहसास रखना। क़ुरआन में है:
«أَلَمْ يَعْلَمْ بِأَنَّ اللَّهَ يَرَىٰ» “क्या वह नहीं जानता कि अल्लाह देख रहा है?” (सूर ए अलक़, आयत 14)
लोगों और समाज से हया: सामाजिक मर्यादा और सम्मान को बनाए रखना तथा सामाजिक मानदंडों का उल्लंघन करने से बचना।
अपने आप से हया: अकेले में भी अपने अस्तित्व और सम्मान को महत्व देना तथा अपनी गरिमा को ठेस न पहुँचाना। अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.) फ़रमाते हैं:
«أَحْسَنُ الْحَيَاءِ اسْتِحْيَاؤُكَ مِنْ نَفْسِكَ» “सबसे अच्छी हया यह है कि इंसान अपने आप से भी हया करे।”
पवित्रता और हया के विरुद्ध गलतियों का सामना
अगर इच्छाओं के प्रभाव या ग़फ़लत के कारण पवित्रता के क्षेत्र में कोई गलती हो जाए, तो इसे हया की पूर्ण समाप्ति नहीं समझना चाहिए। इसके बजाय सुधार के लिए इस तरीके को अपनाना चाहिए:
तौबा बंदगी की ओर लौटने का रास्ता है। अल्लाह तौबा स्वीकार करने वाला है। क़ुरआन में फ़रमाया गया है:
«إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ التَّوَّابِينَ وَيُحِبُّ الْمُتَطَهِّرِينَ» “निश्चित रूप से अल्लाह तौबा करने वालों और पाक रहने वालों से प्रेम करता है।” (सूर ए बक़रा, आयत 222)
पाप का एहसास तभी उपयोगी है, जब वह तौबा और सुधार के लिए प्रेरित करे। इसे खुद को अपमानित करने और ‘मैं एक बेहया इंसान हूं’ जैसी नकारात्मक पहचान बनाने का साधन नहीं बनाना चाहिए।
क़ुरआन मजीद में फ़रमाया गया है:
«إِنَّ الْحَسَنَاتِ يُذْهِبْنَ السَّيِّئَاتِ» “निस्संदेह नेकियां बुराइयों को मिटा देती हैं।” (सूर ए हूद, आयत 114)
दूसरों की सेवा, सदक़ा, ख़ुशू के साथ नमाज़ और नेक काम दिल से पापों की कालिख को दूर करते हैं और हया के गुण को विकसित करने की क्षमता को पुनर्जीवित करते हैं।
हया को मजबूत और स्थायी बनाने के व्यावहारिक उपाय
सच्ची हया अल्लाह की महानता की पहचान का प्रत्यक्ष परिणाम है। रोज़ाना इस बात पर विचार करना कि हम हर क्षण सुनने और देखने वाले अल्लाह की मौजूदगी में हैं और उसके मुक़र्रब फ़रिश्ते हमारे कर्मों से अवगत हैं, हया के गुण को मजबूत करता है।
हया ऐसा पात्र है, जो गंदी निगाहों, अश्लील मज़ाक और अनुचित संबंधों से धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है। क़ुरआन मजीद शरीर की पवित्रता की हिफ़ाज़त का आदेश देने से पहले निगाहों को नियंत्रित करने का निर्देश देता है:
«قُلْ لِلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ…» “मोमिनों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें…” (सूर ए नूर, आयत 30)
इंसान उस समय बेशर्मी की ओर बढ़ता है, जब वह अपनी आत्मा की कीमत और गरिमा को भूल जाता है। हज़रत अली (अ.) फ़रमाते हैं:
«مَنْ كَرُمَتْ عَلَيْهِ نَفْسُهُ هَانَتْ عَلَيْهِ شَهْوَتُهُ» “जिसके लिए उसका अपना सम्मान मूल्यवान हो जाता है, उसके लिए उसकी इच्छाएं तुच्छ हो जाती हैं।” (नहजुल बलाग़ा, हिकमत 449)
अपने आप को एक मूल्यवान अस्तित्व समझें, जो अल्लाह की ख़िलाफ़त के योग्य है। सम्मानित और पाक आत्मा स्वाभाविक रूप से बुराइयों से हया करती है।
हया का वातावरण से भी प्रभाव पड़ता है। ऐसे लोगों के साथ उठना-बैठना, जो अश्लील मज़ाक करते हैं या सीमाओं को आसानी से तोड़ते हैं, इंसान के भीतर हया की संवेदनशीलता को धीरे-धीरे कम कर सकता है। इसके विपरीत, नेक और गंभीर लोगों की संगत इंसान के अंदर गरिमा और संजीदगी को मजबूत करती है।
अपने बारे में नकारात्मक लेबल लगाने से बचें। ‘मैं बेहया हूं’ जैसे वाक्यों को अपने मन और ज़बान से निकाल दें। इसके बजाय अपने नैतिक गुणों और अच्छी आदतों पर ध्यान दें और हर दिन अपनी निगाह, बातचीत और व्यवहार की निगरानी के लिए एक छोटा कदम उठाएं।
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