गुरुवार 8 अक्टूबर 2026 - 15:07
अतीत का नाम नहीं, अपना चरित्र बनाएं पहचान

इंसान को अपने बुजुर्गों का सम्मान जरूर करना चाहिए, लेकिन अपनी पहचान उनके साये में नहीं, बल्कि अपने चरित्र और कर्मों से बनानी चाहिए।

लेखक: मौलाना सय्यद अली हाशिम आबिदी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! इंसान को अपने बुजुर्गों का सम्मान जरूर करना चाहिए, लेकिन अपनी पहचान उनके साये में नहीं, बल्कि अपने चरित्र और कर्मों से बनानी चाहिए।

ईरान के अंतिम शासक मोहम्मद रजा शाह पहलवी का 27 जुलाई 1980 को मिस्र की राजधानी काहिरा में निधन हुआ। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहलवी राजशाही का अंत हो गया और इससे पहले ही शाही परिवार देश छोड़ चुका था। मोहम्मद रजा पहलवी का बड़ा बेटा रजा पहलवी भी कई दशकों से अमेरिका में रह रहा है और ईरान की राजनीति को लेकर अपने राजनीतिक विचार और गतिविधियां जारी रखे हुए है। उसके पास ईरान की कोई आधिकारिक सत्ता या सरकारी पद नहीं है, लेकिन वह ईरान के राजनीतिक भविष्य में अपनी भूमिका का उल्लेख करता रहता है और स्वयं को ईरान का शासक मानता है।

ईरान का यह उदाहरण वास्तव में एक बड़े मानवीय प्रश्न की ओर संकेत करता है। जब अतीत की हैसियत वर्तमान व्यक्ति की पहचान पर हावी हो जाती है, तो इंसान अपने वर्तमान को अपने बीते हुए कल के आधार पर देखने लगता है।

यह स्थिति केवल राजघरानों तक सीमित नहीं है। हमारे समाज में भी ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं। कोई अपने दादा या परदादा की पुरानी प्रतिष्ठा को अपनी वर्तमान पहचान का मुख्य आधार मानता है। कोई अपने पूर्वजों की जागीर का उल्लेख करता है, कोई जमींदारी का, कोई ताल्लुकेदारी का, कोई राजनीतिक प्रभाव का और कोई अपने परिवार की शैक्षणिक या सामाजिक प्रतिष्ठा का।

लेकिन एक बुनियादी सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि बुजुर्गों की महानता इंसान के लिए सम्मान की बात हो सकती है, लेकिन वह उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती।

अतीत पहचान है, वर्तमान चरित्र नहीं

परिवार इंसान को नाम, वंश और इतिहास दे सकता है, लेकिन चरित्र उसे स्वयं बनाना पड़ता है।

किसी विद्वान का बेटा होना ज्ञान नहीं है; किसी राजनीतिज्ञ का बेटा होना नेतृत्व नहीं है; किसी जमींदार का उत्तराधिकारी होना योग्यता की गारंटी नहीं है और किसी राजा के परिवार से संबंध वर्तमान सत्ता की गारंटी नहीं हो सकता।

अतीत को याद रखना अच्छी बात है, लेकिन उसे अपनी वर्तमान स्थिति का एकमात्र आधार बना लेना इंसान की प्रगति में बाधा बन सकता है।

असल सवाल यह नहीं है कि “मेरे बुजुर्ग कौन थे?”

असल सवाल यह है कि “मैं स्वयं कौन हूं और मैंने क्या किया है?”

हर पीढ़ी को अपने हिस्से का इतिहास स्वयं लिखना पड़ता है।

यदि बुजुर्गों ने ज्ञान छोड़ा है तो नई पीढ़ी को ज्ञान में वृद्धि करनी चाहिए।

यदि उन्होंने समाज की सेवा की है तो नई पीढ़ी को उस सेवा को आगे बढ़ाना चाहिए।

यदि उन्होंने समाज में सम्मान प्राप्त किया है तो नई पीढ़ी को अपने अच्छे आचरण और चरित्र से उस सम्मान को बनाए रखना चाहिए।

और यदि अतीत में धन, सत्ता या प्रसिद्धि थी तो उसे केवल गर्व का विषय बनाने के बजाय वर्तमान पीढ़ी को अपनी योग्यता के बल पर नई सफलता हासिल करनी चाहिए।

बुजुर्गों का नाम विरासत हो सकता है, लेकिन अपनी पहचान बनाना हमारी जिम्मेदारी है।

अपने अतीत को पूंजी बनाएं, सहारा नहीं

इस समस्या का समाधान केवल यह कहना नहीं है कि “अतीत पर गर्व मत करो।” अतीत को पूरी तरह भुला देना भी उचित नहीं है। बेहतर रास्ता यह है कि अतीत को प्रेरणा, सीख और जिम्मेदारी बनाया जाए।

हर व्यक्ति अपने लिए कुछ सवाल तय कर सकता है:

  1. पारिवारिक पहचान के अलावा मेरी अपनी सबसे बड़ी खूबी क्या है?
  2. मैंने पिछले समय में ज्ञान, नैतिकता या सेवा के क्षेत्र में क्या योगदान दिया है?
  3. यदि मेरे परिवार का नाम मेरे साथ न हो तो मेरी अपनी पहचान क्या रह जाएगी?
  4. मैं अपनी संतान के लिए केवल संपत्ति छोड़ना चाहता हूं या कोई सकारात्मक परंपरा भी?
  5. क्या लोग मुझे मेरे बुजुर्गों के नाम से पहचानेंगे या मेरे अपने चरित्र से?

यदि इंसान नियमित रूप से इन सवालों पर विचार करता रहे तो पारिवारिक महानता उसके लिए अहंकार का कारण नहीं, बल्कि जिम्मेदारी बन सकती है।

असली सफलता

जीवन का उद्देश्य किसी बीते हुए दौर का उत्तराधिकारी बनना नहीं, बल्कि अपने समय में एक उपयोगी इंसान बनना है।

ताज खत्म हो जाते हैं, महल बदल जाते हैं, जमीनें बंट जाती हैं और सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन ज्ञान, चरित्र, सेवा और अच्छा प्रभाव इंसान के जाने के बाद भी कायम रह सकता है।

इसलिए अतीत पर गर्व कीजिए, लेकिन उसके कैदी मत बनिए।

अपने बुजुर्गों का सम्मान कीजिए, लेकिन उनके नाम को अपनी सफलता का विकल्प मत बनाइए।

क्योंकि इंसान की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं है कि उसके दादा क्या थे, बल्कि यह है कि वह स्वयं क्या बना, उसने दूसरों के लिए क्या किया और अपने पीछे क्या छोड़ गया।

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