युद्ध केवल हथियारों का मुकाबला नहीं होता, बल्कि यह इंसानी नैतिकता की सबसे बड़ी परीक्षा भी होता है। मिसाइलें चलती हैं, ड्रोन उड़ते हैं, विमान बम गिराते हैं और रक्षा प्रणालियां आसमान को रोशन करती हैं। ये सब युद्ध की मजबूरियों का हिस्सा हो सकते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि ताकत रखने वाला अपने दुश्मन के साथ क्या करता है और निर्दोष इंसानों के साथ कैसा व्यवहार करता है?
अमेरिका जब से सुपर पॉवर बना है, उसने दुनिया के कमजोर और छोटे देशों का जीना मुश्किल कर दिया है। इस वैश्विक आतंकवादी ने हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम का इस्तेमाल करके लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया। दुनिया के इतिहास में केवल अमेरिका ही ऐसा देश है जिसने इस तरह का अत्याचार किया।
पवित्र नाम लेना और पवित्र उद्देश्य के लिए खड़ा होना, दोनों एक बात नहीं हैं। सिफ़्फ़ीन में क़ुरआन को नेज़ों पर उठाया गया था; आज मक्का और मदीना का नाम सामने है। समय बदल गया, लेकिन भावनाओं को इस्तेमाल करने का तरीका नहीं बदला।
मध्य पूर्व एक बार फिर ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक छोटी-सी चिंगारी पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में धकेल सकती है। यमन में अंसारुल्लाह की बढ़ती ताकत, बाब अल-मंदब का महत्व, होर्मुज़ जलडमरूमध्य की संवेदनशील स्थिति और सऊदी अरब की यमन में फिर से दखलंदाजी ने हमारे सामने एक महत्वपूर्ण सवाल पूरी गंभीरता के साथ खड़ा कर दिया है: क्या मुस्लिम देश अपना युद्ध खुद लड़ रहे हैं या किसी और के हितों के लिए एक-दूसरे के खिलाफ खड़े किए जा रहे हैं?