शुक्रवार 28 अगस्त 2026 - 15:42
इमाम ख़ुमैनी और शहीद रहबर के विचारों में इस्लामी एकता की आवश्यकताएँ

मौजूदा संवेदनशील दौर में पहले से कहीं अधिक गंभीरता से इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि इमाम ख़ुमैनी और शहीद रहबर के विचारों में इस्लामी उम्मत की एकता और एकजुटता को बनाए रखने तथा उसे मजबूत करने के महत्वपूर्ण सिद्धांत और आवश्यकताएँ क्या हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामी एकता और एकजुटता को मजबूत और स्थिर करना इस्लामी समाज की महान हस्तियों, विशेष रूप से इमाम खुमैनी और इमाम ख़ामेनई की सबसे महत्वपूर्ण इच्छाओं और प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। यह विषय इस्लामी गणराज्य ईरान की पवित्र इस्लामी व्यवस्था की स्थापना से कई वर्ष पहले से ही चर्चा में रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आपसी एकता और एकजुटता वर्तमान समय में उम्मत-ए-मुस्लिमा का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है, क्योंकि हमारा विश्वास है कि इस्लाम की छाया और इस्लामी शिक्षाओं की बरकत से मुसलमानों के बीच एकता के नैतिक और सामाजिक पहलू तथा उसके कारक अधिक गहरे और मजबूत होते हैं। इसी तरह दुश्मनों की बहुत-सी फितना-अंगेज़ियों और साजिशों को भी नाकाम बनाया जा सकता है।

इमाम ख़ुमैनी (र) की दृष्टि में इस्लामी एकता और भाईचारे का महत्व

ख़ुमैनी कबीर (र), इस्लामी क्रांति के संस्थापक और इस्लामी जगत बल्कि पूरी मानवता में महान परिवर्तन के संस्थापक थे। उन्होंने इस्लामी एकता और भाईचारे की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए अपनी बातचीत में इस महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाया कि यदि अतीत में उम्मत-ए-मुस्लिमा को ऐसी महानता प्राप्त थी कि बहुत कम समय में इस्लाम का प्रकाश यूरोपीय देशों और कुछ अन्य पश्चिमी देशों तक भी पहुँच गया, तो इसका मूल कारण इस्लामी एकता और मुसलमानों की एकजुटता थी।

यदि आज मुसलमान पश्चिम और पूर्व की साम्राज्यवादी शक्तियों के शिकार हैं और वैश्विक साम्राज्यवाद ने उन पर अपना दुर्भाग्यपूर्ण प्रभुत्व जमा रखा है तथा उनसे हर प्रकार की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एवं धार्मिक संप्रभुता छीन ली है, तो इसका कारण इस महान उम्मत के बीच मतभेद और बिखराव तथा उनके बीच आपसी तालमेल का अभाव है।

दुनिया के मुसलमानों में व्यक्तिगत और सामूहिक जागरूकता पैदा करना, वास्तविक इस्लाम के कार्यान्वयन के लिए वैश्विक स्तर पर एकता स्थापित करना और इसके परिणामस्वरूप मुसलमानों की प्रतिष्ठा और सम्मान वापस दिलाने के लिए संघर्ष करना, हज़रत इमाम ख़ुमैनी (र) के महत्वपूर्ण और प्रमुख कदमों तथा नीतियों में शामिल था।

यह उल्लेखनीय है कि हज़रत इमाम ख़ुमैनी (र) एकता को एक रणनीति के रूप में स्वीकार करते थे। वे देश की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय एकता पर ज़ोर देने के साथ-साथ इस्लामी एकता और एकजुटता की रक्षा तथा उसे मजबूत करने के इच्छुक थे, ताकि इसके उच्चतर चरण में दुनिया भर के वंचितों के बीच एकता को बनाए रखते हुए और उसका विस्तार करते हुए ताग़ूतों के पूर्ण उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। यही कारण है कि हम देखते हैं कि वे एकता को मुसलमानों के अस्तित्व की गारंटी मानते थे।

ख़ुमैनी कबीर (र) के निकट इस्लामी जगत की एकता और एकजुटता एक महान आकांक्षा थी। वे हमेशा एकता पर ज़ोर देते थे और कहते थे:

“इंशाअल्लाह एक दिन सभी मुसलमान आपस में भाई-भाई बन जाएँगे और सभी इस्लामी देशों से फसाद की जड़ें उखाड़ दी जाएँगी तथा इस्राईल की यह भ्रष्ट जड़ मस्जिद-ए-अक़्सा और हमारे इस्लामी देश से उखाड़ दी जाएगी। इंशाअल्लाह तआला, हम सब मिलकर जाएँगे और क़ुद्स में एकता की नमाज़ अदा करेंगे।”

शहीद रहबर (र) की दृष्टि में इस्लामी एकता

इस्लामी एकता और एकजुटता का इमाम और हमारे शहीद रहबर (रह.) की दृष्टि में असाधारण महत्व है। उन्होंने नेतृत्व और मार्गदर्शन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालने के शुरुआती दिनों से ही कई अवसरों पर इस मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया और हमेशा इस संबंध में मौजूद संभावित खतरों और नुकसानों से आगाह किया।

शहीद रहबर (र) ने अपने एक भाषण में कहा:

“एकता के मुद्दे में दो बुनियादी बातें या दो बुनियादी दिशाएँ हैं और इनमें से प्रत्येक अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है। जब हम एकता का नारा लगाते हैं तो इन दोनों बुनियादी बातों को हमारा केंद्र-बिंदु होना चाहिए और यही बातें मुसलमानों के व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी हैं।

इनमें से एक बात यह है कि मुसलमानों के विभिन्न समूहों और संप्रदायों के बीच सदियों से मौजूद मतभेदों, विवादों, संघर्षों, विरोधाभासों और बाधाओं को दूर किया जाए। ये मतभेद हमेशा मुसलमानों के लिए नुकसानदेह साबित हुए हैं। यदि हम इस्लाम के इतिहास की ओर देखें तो पाएँगे कि इनमें से सभी या अधिकांश मतभेदों और विवादों की शुरुआत भौतिक शक्ति के केंद्रों से हुई थी।”

उन्होंने आगे ज़ोर देते हुए कहा:

“यह एकता इस्लाम की हुकूमत की सेवा और उसी दिशा में होनी चाहिए, अन्यथा यह निरर्थक और उद्देश्यहीन होगी। यदि इस्लाम के विद्वान इस बात को स्वीकार करते हैं कि पवित्र क़ुरआन कहता है:

‘وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ رَسُولٍ إِلَّا لِیُطَاعَ بِإِذْنِ اللَّهِ’

(सूर ए निसा, आयत 64)

अर्थात, पैगंबर केवल इसलिए नहीं आए थे कि कोई नसीहत करें, कोई बात कहें और लोग अपना काम करते रहें तथा उनका सम्मान भी कर दें; बल्कि वे इसलिए आए थे कि उनकी आज्ञा का पालन किया जाए, वे समाज और जीवन का मार्गदर्शन करें, व्यवस्था स्थापित करें और इंसानों को सही जीवन के उद्देश्यों की ओर ले जाएँ।

यदि इस्लाम के विद्वान इस बात को स्वीकार करते हैं कि पवित्र क़ुरआन कहता है:

‘لَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلَنَا بِالْبَیِّنَاتِ وَأَنْزَلْنَا مَعَهُمُ الْکِتَابَ وَالْمِیزَانَ لِیَقُومَ النَّاسُ بِالْقِسْطِ’

(सूर ए हदीद, आयत 25)

अर्थात न्याय और इंसाफ स्थापित करना, अत्याचार का अंत करना और इंसानों के लिए सही जीवन उपलब्ध कराना धर्मों का उद्देश्य है, तो फिर हमारा आंदोलन भी इस्लाम की हुकूमत की दिशा में होना चाहिए और देशों तथा इस्लामी समाजों में इस्लामी शासन की स्थापना एक संभव कार्य है।”

शहीद रहबर (र) के अनुसार, वर्तमान दौर में इस्लामी समाजों को जिन गंभीर नुकसानों का सामना करना पड़ रहा है, उनमें से एक धार्मिक मतभेद हैं। दुश्मन की कोशिश यही है कि मुसलमानों को एकजुट और सहमत न होने दिया जाए तथा उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ काम करने के लिए मजबूर किया जाए। इसके लिए भी भरपूर प्रयास किए जा रहे हैं। ये प्रयास विशेष रूप से अब उस समय और तेज़ हो गए हैं, जब मुसलमानों को एकता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

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