लेखकः मौलाना सय्यद अली हाशिम आब्दी
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी! डिजिटल सहूलत ने इल्म व मारिफ़त के फ़रोग़, दीनी तालीमात की इशाअत, मज़लूमों की हिमायत और समाजी ख़िदमात के बेशुमार मौक़े फ़राहम किए हैं, लेकिन ग़ैर मुसद्दक़ा ख़बरों, जल्दबाज़ी में फ़ैसलों, ग़ीबत, तोहमत और किरदारकुशी ने नई अख़्लाक़ी पेचीदगियाँ भी पैदा की हैं। ऐसे में ईमानी ज़िंदगी का तक़ाज़ा टेक्नोलॉजी से दूरी नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल क़ुरआनी तालीमात, शरई हुदूद और अख़्लाक़ी ज़िम्मेदारी के मुताबिक़ करना है।
क़ुरआन करीम इरशाद फ़रमाता है: "या अय्युहल्लज़ीना आमनू इन जाअकुम फासिक़ुन बि नबइन फतबय्यनू" यानी "ऐ ईमान वालो! अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो तहक़ीक़ कर लिया करो।" (अल-हुजुरात, 49:6)
यह आयत डिजिटल सहाफ़त और सोशल मीडिया के लिए बुनियादी उसूल फ़राहम करती है। किसी इल्ज़ाम, वीडियो या पैग़ाम को तस्दीक़ के बग़ैर फैलाना और यकतरफ़ा मालूमात की बुनियाद पर किसी को मुजरिम क़रार देना इंसाफ़ के तक़ाज़ों के मनाफ़ी है। सूरए नूर की आयत 15 भी सुनी-सुनाई बातों को बिला तहक़ीक़ आगे बढ़ाने के संगीन नताइज से मुतनब्बेह करती है। ख़बर की मक़बूलियत या बार-बार तकरार उसकी सदाक़त की दलील नहीं; तहक़ीक़ और दयानत ही ज़िम्मेदाराना इज़हार की बुनियाद हैं।
इंसानी आबरू के तहफ़्फ़ुज़ के बारे में क़ुरआन करीम का हुक्म वाज़ेह है: व ला यग़्तब बअज़ुकुम बअज़ा" यानी "और तुम में से कोई किसी दूसरे की ग़ीबत न करे।" (अल-हुजुरात, 12)
मकतब-ए-अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम में ग़ीबत, तोहमत और दूसरों की बेहुरमती से इजतिनाब अहम शरई व अख़्लाक़ी ज़िम्मेदारी है। मरजा ए आला दीनी आयतुल्लाह अल-उज़मा सैयद अली हुसैनी सीस्तानी द०ज़ि० की फ़िक़्ही रहनुमाई भी ग़ीबत की हुरमत और दूसरों के पोशीदा उयूब बयान करने से इजतिनाब पर ज़ोर देती है। किसी की निजी गुफ़्तुगू, ज़ाती कमज़ोरी या तहक़ीर आमेज़ मवाद को उसकी रुसवाई के लिए फैलाना महज़ डिजिटल सरगर्मी नहीं, बल्कि शरई व अख़्लाक़ी जवाबदेही का मामला भी है।
अलबत्ता हर तनक़ीद ग़ीबत नहीं और न हर शिकायत नाजायज़ है। ज़ुल्म की दादरसी, हक़ के तहफ़्फ़ुज़ और अवामी मफ़ाद के लिए ज़रूरी इज़हार की कुछ सूरतें शरई इस्तिस्ना रखती हैं। असल मेयार यह है कि बात सच्ची, ज़रूरी और मुंसिफ़ाना हो, उसका मक़सद इस्लाह हो, न कि ज़ाती इंतिक़ाम या किरदारकुशी।
सोशल मीडिया पर बाज़ औक़ात किसी वाक़ेए का नामुकम्मल मंज़र या गुफ़्तुगू का मुन्तख़ब हिस्सा किसी शख़्स के ख़िलाफ़ मुहिम का सबब बन जाता है। लोग तहक़ीक़ और मुकम्मल हक़ाइक़ के बग़ैर मुद्दई, मुंसिफ़ और सज़ा देने वाले बन बैठते हैं। इस अमल से किसी की इज़्ज़त, रोज़गार और ख़ानदानी ज़िंदगी मुतअस्सिर हो सकती है। अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम से मनक़ूल हिकमत का मफ़हूम है कि अक़्लमंद पहले ग़ौर करता है, फिर बोलता है, जबकि नादान पहले बोलता है और बाद में सोचता है। (नहजुल बलाग़ा, हिकमत 40) यह तालीम डिजिटल दौर में भी तहम्मुल, तहक़ीक़ और ज़िम्मेदाराना इज़हार की अहमियत वाज़ेह करती है।
इसी तरह ईमानी और समाजी ज़िम्मेदारी का तक़ाज़ा है कि इंसान ऐसे क़ौल व फ़ेल और ऑनलाइन सरगर्मियों से परहेज़ करे जो दीन व मज़हब की साख, मुल्क के अमन व इस्तेहकाम, क़ौमी यकजहती और मुआशरती हम-आहंगी को नुक़सान पहुँचाएँ। क़ुरआन मजीद फ़रमाता है: "व ला तआवनू अलल इस्मि वल उदवान" यानी "और गुनाह और ज़्यादती के कामों में एक-दूसरे की मदद न करो।" (अल-मायदा, 2)
ग़ैर मुसद्दक़ा ख़बरें फैलाना, मज़हबी व क़ौमी तअस्सुबात को हवा देना और नफ़रत अंगेज़ मुहिमात की तशहीर करना मुआशरती इंतिशार का सबब बन सकता है। दीन की ख़िदमत, मुल्क से वफ़ादारी और क़ौम की भलाई का तक़ाज़ा है कि इख़्तिलाफ़ के बावजूद अदल, अमन, बाहमी एहतराम और इंसानी वक़ार को मुक़द्दम रखा जाए। किसी ख़्वाहिश व आरज़ू को झूट, तोहमत या नाइंसाफ़ी का जवाज़ नहीं बनाया जा सकता।
दूसरी जानिब, सोशल मीडिया दीनी मआरिफ़, मुस्तनद अहकाम, इल्मी मुबाहिस और फ़लाही सरगर्मियों के फ़रोग़ का मोअस्सिर ज़रिया भी है। इससे हक़ीक़ी फ़ायदा उसी वक़्त हासिल हो सकता है जब मालूमात मुस्तनद हों, हवालों की सेहत का ख़्याल रखा जाए और इख़्तिलाफ़ी मसाइल में इल्मी दयानत बरक़रार रहे। दीनी मवाद की इशाअत में ग़लत रिवायत या ग़ैर मुसद्दक़ा फ़तवा फैलाने से इजतिनाब भी उतना ही ज़रूरी है जितना आम ख़बरों की तस्दीक़।
डिजिटल दौर में हक़ीक़ी दीनदारी का मेयार सिर्फ़ मज़हबी पैग़ामात की इशाअत नहीं, बल्कि सच्चाई, अदल, इंसानी आबरू के तहफ़्फ़ुज़ और समाजी ख़ैर में अमली किरदार है। हर सारिफ़ अगर किसी पैग़ाम को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सदाक़त, ज़रूरत और मुमकिन नताइज पर ग़ौर करे, तो सोशल मीडिया अफ़वाह व नफ़रत के बजाय इल्म, इस्लाह, हमदर्दी और ज़िम्मेदाराना मुआशरत का वसीला बन सकता है।
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