शुक्रवार 21 अगस्त 2026 - 17:19
सोशल मिडीया को इस्लाह, ख़ैर और लोगों को फायेदा के लिए इस्तेमाल करें।मौलाना सैयद रूहे ज़फ़र रिज़वी

हौज़ा / मुंबई: खोजा शिया इसना अशरी जामा मस्जिद, पाला गली में 21 अगस्त 2026 को नमाज़-ए-जुमा हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन मौलाना सैयद रूह ज़फ़र रिज़वी इमाम जुमा व जमाअत की इमामत में अदा की गई। ख़ुत्बा-ए-जुमा में मौलाना सैयद रूह ज़फ़र रिज़वी ने तक़वा-ए-इलाही, इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की सीरत व तालीमात, हुक़ूक़ुल-इबाद, दूसरों की मदद, ज़बान और सोशल मीडिया के सावधानीपूर्वक इस्तेमाल तथा इमाम-ए-ज़माना अज्ज़ल्लाहु तआला फ़रजहुश्शरीफ़ से मज़बूत संबंध की अहमियत पर विस्तार से प्रकाश डाला।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,मुंबई: खोजा शिया इसना अशरी जामा मस्जिद, पाला गली में 21 अगस्त 2026 को नमाज़-ए-जुमा हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन मौलाना सैयद रूह ज़फ़र रिज़वी इमाम जुमा व जमाअत की इमामत में अदा की गई। ख़ुत्बा-ए-जुमा में मौलाना सैयद रूह ज़फ़र रिज़वी ने तक़वा-ए-इलाही, इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की सीरत व तालीमात, हुक़ूक़ुल-इबाद, दूसरों की मदद, ज़बान और सोशल मीडिया के सावधानीपूर्वक इस्तेमाल तथा इमाम-ए-ज़माना अज्ज़ल्लाहु तआला फ़रजहुश्शरीफ़ से मज़बूत संबंध की अहमियत पर विस्तार से प्रकाश डाला।

मौलाना सैयद रूह ज़फ़र रिज़वी ने तक़वा-ए-इलाही को इंसान की बुनियादी ज़िम्मेदारी, ज़िंदगी का मक़सद और वास्तविक कामयाबी का ज़रिया बताते हुए कहा कि इंसान के लिए तक़वा से बढ़कर कोई ज़ेवर नहीं है। तक़वा केवल मस्जिद, मजलिस, इमामबाड़े या इबादतगाह तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि ज़िंदगी के हर चरण और हर मामले में उसका प्रदर्शन होना चाहिए।

इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की शहादत के अवसर पर उन्होंने कहा कि मासूमीन अलैहिमुस्सलाम हमारी ज़िंदगी के लिए आदर्श और नमूना-ए-अमल हैं। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने कम उम्र में ऐसी सीरत और तालीमात पेश कीं, जो आज भी करोड़ों इंसानों के लिए मशअल-ए-राह हैं।

अगर अइम्मा-ए-मासूमीन अलैहिमुस्सलाम की ज़िंदगी को अपनी ज़िंदगी में शामिल किया जाए तो दुनिया बेहतर, घरों में सुकून, अख़लाक़ में बेहतरी और इबादतों में रूह पैदा होती है तथा आख़िरत भी संवरती है।

उन्होंने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की तालीमात की रोशनी में तक़वा के विभिन्न पहलुओं को बयान करते हुए कहा कि मुश्तबह मामलों में इंसान का ख़ुद को रोक लेना तक़वा की निशानी है। हर मामले को बिना तहक़ीक़ हलाल और जायज़ समझकर आगे बढ़ने के बजाय जहाँ शक हो, वहाँ एहतियात से काम लेना चाहिए।

इसी तरह सबसे बड़ा आबिद वह है जो अपने वाजिबात और फ़राइज़ की पाबंदी करे। कई बार इंसान नवाफ़िल और मुस्तहबात की अदायगी में बहुत एहतिमाम करता है, लेकिन इस दौरान वाजिबात से ग़फ़लत बरतता है, जो सही रवैया नहीं है।

मौलाना सैयद रूह ज़फ़र रिज़वी ने कहा कि तक़वा का एक अहम तक़ाज़ा हराम से पूरी तरह बचना है। इंसान को यह सोचकर हराम के क़रीब नहीं जाना चाहिए कि बाद में अल्लाह तआला माफ़ कर देगा। मोमिन को हर हाल में यह एहसास रखना चाहिए कि अल्लाह तआला उसे देख रहा है और आख़िरत में उसे अपने आमाल का हिसाब देना है।

उन्होंने इबादत और ज़ियारत के अमली प्रभाव पर ज़ोर देते हुए कहा कि नमाज़, मजलिस, अज़ादारी और ज़ियारत का असर इंसान के अख़लाक़ और किरदार में दिखाई देना चाहिए। नमाज़ इंसान को बुराइयों से रोके और अज़ादारी इंसान के अंदर मज़लूम की हिमायत, हक़ की पासदारी और हुक़ूक़ुल-इबाद का एहसास पैदा करे।

अगर किसी व्यक्ति के ज़िम्मे किसी का क़र्ज़ या हक़ बाकी हो, किसी की ज़मीन, माल या जायदाद पर नाजायज़ क़ब्ज़ा हो और वह हक़ अदा किए बिना ज़ियारत के लिए जाए तो उसे अपने अमल का गंभीरता से जायज़ा लेना चाहिए।

दूसरों को फ़ायदा पहुँचाने को ईमान की निशानी बताते हुए उन्होंने कहा कि मोमिन को केवल यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे दूसरों से क्या फ़ायदा मिलेगा, बल्कि यह देखना चाहिए कि वह दूसरों के लिए कितना फ़ायदेमंद साबित हो सकता है। किसी परेशानहाल व्यक्ति को तसल्ली देना, बीमार की इयादत करना, ज़रूरतमंद और क़र्ज़दार की मदद करना, यतीमों की सरपरस्ती करना और दो मोमिनों के बीच इख़्तिलाफ़ ख़त्म कराकर सुलह कराना भी बड़ी नेकी है।

मौलाना सैयद रूह ज़फ़र रिज़वी ने ज़बान की हिफ़ाज़त की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि इंसान को अपनी ज़बान को क़ाबू में रखना चाहिए। मौजूदा दौर में ज़बान के साथ-साथ अपनी उँगलियों की भी हिफ़ाज़त करना ज़रूरी है, क्योंकि मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के ज़रिए एक व्यक्ति कुछ ही पलों में ऐसी बात सैकड़ों लोगों तक पहुँचा सकता है, जिसका उसे ख़ुद भी यक़ीन न हो।

उन्होंने सोशल मीडिया के इस्तेमाल में एहतियात की ताकीद करते हुए कहा कि हर ख़बर, वीडियो या पैग़ाम को बिना तहक़ीक़ आगे बढ़ाना ज़रूरी नहीं है। झूठ, ग़ीबत, चुग़ली, तोहमत और किसी की इज़्ज़त को ठेस पहुँचाने वाली सामग्री फैलाने से बचना चाहिए। सोशल मीडिया को सुधार, भलाई और लोगों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि नफ़रत, इख़्तिलाफ़ और बुराई फैलाने के लिए।

उन्होंने दूसरों के ऐब तलाश करने और उन्हें लोगों के सामने बयान करने से भी सख़्ती से मना किया। किसी व्यक्ति को सबके सामने नसीहत करना कभी-कभी उसकी इस्लाह के बजाय उसकी तज़लील का कारण बन जाता है, जबकि तन्हाई में ख़ैरख़्वाही और मोहब्बत के साथ समझाना उसकी इज़्ज़त को बरक़रार रखते हुए इस्लाह का ज़रिया बनता है।

मौलाना सैयद रूह ज़फ़र रिज़वी ने वालिदैन को भी ताकीद की कि बच्चों को दूसरों के सामने डाँटने या एक बच्चे का दूसरे बच्चे से मुक़ाबला करने से परहेज़ करें।

ख़ुत्बे के एक अहम हिस्से में मौलाना सैयद रूह ज़फ़र रिज़वी ने इमाम-ए-ज़माना अज्ज़ल्लाहु तआला फ़रजहुश्शरीफ़ से मज़बूत संबंध की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि दौर-ए-ग़ैबत में मोमिन की अहम ज़िम्मेदारी है कि वह अपने ज़माने के इमाम से वास्तविक और मज़बूत रिश्ता क़ायम करे। उन्होंने कहा कि इमाम-ए-ज़माना अलैहिस्सलाम से संबंध केवल दावे और नारे का नाम नहीं, बल्कि इसका तक़ाज़ा यह है कि इंसान अपने घर, अख़लाक़, मामलात, बातचीत और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को इस तरह सँवारे कि अगर इमाम अलैहिस्सलाम उसकी ज़िंदगी का मुशाहिदा करें तो वह उससे राज़ी हों।

उन्होंने विशेष रूप से युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि इंसान को अपने मोबाइल फोन के इस्तेमाल, सोशल मीडिया पर बातचीत और ऑनलाइन गतिविधियों का भी जायज़ा लेना चाहिए। अगर हमारी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा ऐसी गतिविधियों में गुज़र रहा है, जिनसे वालिदैन, घरवालों और समाज के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, तो हमें सोचना चाहिए कि क्या यह जीवन-शैली इमाम-ए-ज़माना अलैहिस्सलाम की ख़ुशनूदी का कारण बन सकती है।

ख़ुत्बा-ए-जुमा के दूसरे हिस्से में मौलाना सैयद रूह ज़फ़र रिज़वी ने 21 अगस्त 1969 को मस्जिद-ए-अक़्सा में पेश आने वाली आगज़नी की घटना का उल्लेख करते हुए फ़िलिस्तीन और बैतुल-मुक़द्दस के संबंध में मुसलमानों की ज़िम्मेदारियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को ज़ुल्म के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए और मज़लूम फ़िलिस्तीनी जनता की हिमायत के लिए क़ानूनी, पुरअमन और प्रभावी ज़राए अपनाने चाहिए।

उन्होंने कहा कि जहाँ कहीं भी ज़ुल्म हो रहा हो, मज़लूम की हिमायत और ज़ालिम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना हमारी दीनी और इंसानी ज़िम्मेदारी है। सोशल मीडिया और दूसरे ज़राए-ए-इब्लीग़ के ज़रिए मज़लूमों की आवाज़ ज़िम्मेदार संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक पहुँचाई जा सकती है।

मौलाना सैयद रूह ज़फ़र रिज़वी ने कहा कि दौर-ए-ग़ैबत में ज़रूरतमंदों, ग़रीबों और मज़लूमों की मदद करना तथा उनके अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना भी इमाम-ए-ज़माना अज्ज़ल्लाहु तआला फ़रजहुश्शरीफ़ की रिज़ायत हासिल करने के अहम ज़रियों में शामिल है।

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