रविवार 25 अक्टूबर 2026 - 17:04
ईमान, एकता और सत्य का समर्थन ईरान की ताकत के प्रमुख आधार

ईरान की वास्तविक शक्ति का आकलन केवल आर्थिक संसाधनों और सैन्य उपकरणों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसमें ईमान, ईश्वर पर भरोसा, सत्य का समर्थन, शहीदों के मार्ग पर दृढ़ता और जनता की एकता को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। यह बात क़ुम में आयोजित “ईरान: ईश्वरीय सिद्धांतों की दृष्टि में दुनिया की पहली शक्ति” विषयक एक शैक्षणिक बैठक में कही गई।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की ओर से आयोजित इस चौथे सत्र में हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मोहम्मद हाज अबुल क़ासिम दौलाबी, क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्र के शिक्षक और ईरान के धार्मिक शिक्षा केंद्र के प्रमुख के विशेष सहायक, तथा हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मोहम्मद मेहदी गुर्जियान, क़ुम के धार्मिक शिक्षा केंद्र के शिक्षक और बाक़िरुल उलूम विश्वविद्यालय के प्राध्यापक ने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कुरआन और दर्शन के प्रकाश में वास्तविक शक्ति तथा ईमान और ईश्वर पर भरोसे की भूमिका पर चर्चा की।

क़ुम में आयोजित चौथे सत्र में वक्ताओं का जोर: ईमान, एकता और सत्य का समर्थन ईरान की ताकत के प्रमुख आधार

ईमान और ईश्वर पर भरोसा वास्तविक शक्ति की बुनियाद

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हाज अबुल क़ासिम दौलाबी ने कहा कि ईरान की शक्ति को समझने के लिए कुरआन और ईश्वरीय सिद्धांतों के प्रकाश में स्थिति का आकलन करना आवश्यक है। सूरह आले इमरान की आयत 139 में अल्लाह फरमाता है, “न तो कमज़ोर पड़ो और न ही दुखी हो, यदि तुम ईमान वाले हो तो तुम ही सर्वोच्च रहोगे।”

उन्होंने कहा कि कुरआन ने सर्वोच्चता को ईमान से जोड़ा है। ईमान केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि कठिनाइयों का सामना करने, दृढ़ रहने और भविष्य के प्रति आशावान बने रहने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उन्होंने एक ईमानदार समाज की शक्ति के पांच प्रमुख आधार बताए: ईश्वर की सहायता, विश्वासियों के मामलों में सुधार, सत्य के अनुयायियों का समर्थन, शहीदों के मार्ग को जारी रखना और ईश्वरीय नेतृत्व के इर्द-गिर्द एकजुट होने वाली कौमों की सफलता।

क़ुम में आयोजित चौथे सत्र में वक्ताओं का जोर: ईमान, एकता और सत्य का समर्थन ईरान की ताकत के प्रमुख आधार

दुश्मन के विशाल सैन्य संसाधन सफलता की गारंटी नहीं

हाज अबुल क़ासिम ने कहा कि भारी सैन्य संसाधनों और बड़े आर्थिक खर्च के बावजूद कोई देश अपने सभी उद्देश्यों को हासिल करने में सफल नहीं हो सकता। कुरआन के अनुसार, जो लोग लोगों को ईश्वर के मार्ग से रोकने के लिए अपना धन खर्च करते हैं, उनकी कोशिशें अंततः विफलता और पछतावे का कारण बन सकती हैं।

उन्होंने मध्य पूर्व में अमेरिका के भारी खर्च का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2017 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस क्षेत्र में लगभग सात ट्रिलियन डॉलर खर्च किए जाने की बात कही थी। उनके अनुसार, इतने बड़े खर्च के बावजूद अमेरिका अपने सभी उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सका और उसे क्षेत्र में विभिन्न कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

उन्होंने बगदाद में अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस दौरान कड़े सुरक्षा इंतजाम किए गए थे और राष्ट्रपति कुछ समय के लिए अमेरिकी सैन्य अड्डे पर रुकने के बाद वापस लौट गए। उन्होंने इस घटना को क्षेत्र में अमेरिकी उपस्थिति के सामने मौजूद सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का उदाहरण बताया।

हाज अबुल क़ासिम ने आगे कहा कि ईरान का रक्षा बजट उसके विरोधियों की तुलना में कम होने के बावजूद देश की शक्ति का आकलन केवल सैन्य खर्च के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, ईमान, आशा और दृढ़ता समाज को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करने की ताकत प्रदान करते हैं।

सत्य का समर्थन और मानवीय गरिमा का सम्मान

हाज अबुल क़ासिम ने कहा कि सत्य का समर्थन वास्तविक शक्ति का एक महत्वपूर्ण आधार है। सत्य मानवीय प्रकृति, नैतिकता, बुद्धि और ईश्वरीय पैगंबरों की शिक्षाओं के अनुरूप होता है, जबकि मानवीय गरिमा और दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन इसके विपरीत है।

परमाणु ऊर्जा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सभी राष्ट्रों को शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के उपयोग का अधिकार मिलना चाहिए, जबकि किसी भी देश के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए। उनके अनुसार, विज्ञान और तकनीक से सभी को लाभ उठाने का अवसर देना एक तार्किक और नैतिक सिद्धांत है।

उन्होंने ग़ज़ा में नागरिकों की शहादत और बच्चों के साथ दुर्व्यवहार जैसी घटनाओं की आलोचना करते हुए कहा कि मानवाधिकारों की बात करने वालों को व्यवहार में भी मानवीय गरिमा का सम्मान करना चाहिए। उनके अनुसार, सत्य का समर्थन और मानवीय मूल्यों की रक्षा एक ईमानदार समाज की शक्ति के बुनियादी आधार हैं।

शहादत किसी आंदोलन का अंत नहीं

हाज अबुल क़ासिम ने कहा कि शहीदों की कुर्बानियां व्यर्थ नहीं जातीं, बल्कि उनके मार्ग और उद्देश्य आगे बढ़ते रहते हैं। उन्होंने कर्बला की घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि इमाम हुसैन (अ) की शहादत के बावजूद उनका संदेश समाप्त नहीं हुआ, बल्कि आशूरा का विचार और संदेश इतिहास में फैलता गया तथा विश्व स्तर पर प्रभाव डालता रहा।

उन्होंने कहा कि किसी आंदोलन की सफलता का निर्णय केवल युद्ध के तत्काल परिणामों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इस्लामी क्रांति ईरान के शहीदों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक दृष्टिकोण से शहादत किसी उद्देश्य के अंत का नाम नहीं है, बल्कि यह उस उद्देश्य को आगे बढ़ाने का माध्यम भी बन सकती है।

जनता की एकता और नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्धता

हाज अबुल क़ासिम ने जनता की धार्मिक नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्धता और उसके साथ खड़े रहने को राष्ट्रीय शक्ति का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि कुरआन उन लोगों को सफलता की शुभ सूचना देता है, जो ईश्वर, उसके पैगंबर और ईमान वालों की विलायत को स्वीकार करते हैं।

उनके अनुसार, ईरानी जनता ने पिछले 47 वर्षों से अधिक समय में इस्लामी गणराज्य की व्यवस्था और उसके नेतृत्व के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शक्ति का आकलन करते समय जनता की एकता, दृढ़ता और नेतृत्व के समर्थन को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

क़ुम में आयोजित चौथे सत्र में वक्ताओं का जोर: ईमान, एकता और सत्य का समर्थन ईरान की ताकत के प्रमुख आधार

वास्तविक शक्ति केवल भौतिक संसाधनों तक सीमित नहीं

बैठक के दूसरे वक्ता हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मोहम्मद मेहदी गुर्जियान ने कहा कि किसी देश की शक्ति का आकलन केवल उसकी अर्थव्यवस्था, सैन्य उपकरणों और संसाधनों के आधार पर करना सही नहीं है। सामान्य अंतरराष्ट्रीय आकलनों में आर्थिक संसाधनों और रक्षा क्षमता को महत्व दिया जाता है, जबकि ईश्वरीय सिद्धांतों के अनुसार ईमान, दृढ़ता और सत्य के मार्ग पर चलने को भी बुनियादी महत्व प्राप्त है।

उन्होंने ईरान के विरुद्ध सैन्य धमकियों का उल्लेख करते हुए कहा कि ईरान को नष्ट करने और उसकी रक्षा क्षमता समाप्त करने के दावे किए गए, लेकिन विरोधी अपने इच्छित परिणाम हासिल नहीं कर सके।

गुर्जियान ने कुरआन की आयत “फ़इन्नल इज़्ज़ता लिल्लाहि जमीअन” का उल्लेख करते हुए कहा कि वास्तविक सम्मान अल्लाह के लिए है और ईमान वाले उससे जुड़कर सम्मान प्राप्त करते हैं। उन्होंने कहा कि इतिहास में अनेक शक्तिशाली साम्राज्य समाप्त हो गए, लेकिन हजरत इब्राहीम (अ), हजरत मूसा (अ), हजरत ईसा (अ) और पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद (स) का संदेश आज भी जीवित है।

उन्होंने कुरआन की आयत “इन तंसुरुल्लाहा यंसुरकुम व युसब्बित अक़दामकुम” का हवाला देते हुए कहा कि जो लोग ईश्वर के धर्म की सहायता करते हैं, अल्लाह उनकी सहायता करता है और उनके कदम मजबूत बनाता है।

बैठक में वक्ताओं ने जोर दिया कि ईमान, सत्य का समर्थन, जनता की एकता, ईश्वर पर भरोसा और शहीदों के मार्ग पर दृढ़ता को राष्ट्रीय शक्ति के आकलन में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, इन कारकों को समझना भय फैलाने और जिम्मेदार लोगों के शक्ति संबंधी आकलन को प्रभावित करने के प्रयासों का सामना करने के लिए आवश्यक है।

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