हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन अली सैफ़ी आमोली, मदरसा-ए-इल्मिया हज़रत हुज्जत अज्जलल्लाह फ़रजहुश्शरीफ़, तेहरान के मुतवल्ली, और इस इदारे के असातिज़ा ने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम की विलादत-ए-बासआदत के मौक़े पर आयतुल्लाह हुसैनी बूशहरी, आयतुल्लाह करीमी जहरूमी और हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन हसन साफ़ी गुलपायगानी से अलग अलग मुलाक़ातें कीं।
इस मौक़े पर आयतुल्लाह हुसैनी बूशहरी ने अदालती निज़ाम की अहमियत पर रोशनी डालते हुए कहा कि मुक़द्दमात की कसरत के बावजूद अदालती रसदगी में दक़्क़त और एहतियात कम नहीं होनी चाहिए, और हौज़ा-हाए-इल्मिया को अदलिया के साथ ज़्यादा मोअस्सिर तआवुन करना चाहिए, ताकि अवामी उमूर में सहूलत और तेज़ी पैदा हो।
उन्होंने बारह रोज़ा मुसल्लत जंग के दौरान निज़ाम-ए-जम्हूरी-ए-इस्लामी के दिफ़ा में हौज़ा-ए-इल्मिया और तलबा के मोअस्सिर किरदार की तारीफ़ करते हुए कहा कि उलेमा हमेशा इन्क़िलाब के तहफ़्फ़ुज़ में सफ़-ए-अव्वल में रहे हैं।
इस मौक़े पर आयतुल्लाह करीमी जहरूमी ने कहा कि मुबल्लीग़ीन-ए-दीन दुश्मन की सक़ाफ़ती यलग़ार के मुक़ाबले में सफ़-ए-अव्वल के मुजाहिद हैं, जबकि शहरी सतह पर दीनी और सक़ाफ़ती निज़ाम-ओ-नसक़ में हौज़ा-हाए-इल्मिया के हस्सास किरदार पर ज़ोर दिया।
आख़िर में हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन अली सैफ़ी आमोली ने तलबा को जिहाद-ए-तबईन और नौजवान नस्ल के एतिक़ादी और सियासी शुब्हात के जवाब के लिए तैयार करने की ज़रूरत पर तआक़ीद की हैं।
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