हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हुसैन अंसारियान ने माह-ए-रजब के मौके पर तेहरान में अपने ख़िताब के दौरान क़ुरआन-ए-करीम में “आले इब्राहीम” के मक़ाम को बयान करते हुए कहा कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की वे दुआएँ, जिनमें उन्होंने मोवह्हिद, इबादतगुज़ार और नमाज़ पढ़ने वाली नस्ल की दुआ की थी, अमीरुल-मोमिनीन अली बिन अबी तालिब अलैहिस्सलाम की विलादत के मौके पर सबसे मुकम्मल सूरत में क़बूल हुईं।
उस्ताद अंसारियान ने कहा कि क़ुरआन में “आल-ए-इब्राहीम” से मुराद हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की नस्ल है, जो दो शाख़ों इस्हाक़ और इस्माईल से आगे बढ़ी। नस्ल-ए-इस्हाक़ से बहुत से अंबिया अलैहिमुस्सलाम आए, जबकि नस्ल-ए-इस्माईल से रसूल-ए-अकरम स.ल, हज़रत फ़ातिमा ज़हेरा सलामुल्लाह अलैहा और बारह इमाम-ए-मासूम अलैहिमुस्सलाम दुनिया में तशरीफ़ लाए।यह सब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की गहरी और ख़ालिस दुआओं का नतीजा है।
उन्होंने सूरह-ए-बक़रा और सूरह-ए-इब्राहीम की आयतों का हवाला देते हुए कहा कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने लिए और अपनी औलाद के लिए इस्लाम, इबादत, नमाज़ और अहल-ए-ईमान के दिलों में मोहब्बत की दुआ की थी और यह नेमत सिर्फ़ पाक दिलों को मिलती है।
उस्ताद अंसारियान ने साफ़ कहा कि इन्हीं क़ुरआनी दुआओं की बुनियाद पर रसूल-ए-अकरम स.ल. और अमीरुल-मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम के आबा-ओ-अजदाद सब मोवह्हिद और इबादतगुज़ार थे, और उन पर शिर्क का इल्ज़ाम लगाना क़ुरआन के ख़िलाफ़ है।
विलादत-ए-अमीरुल-मोमिनीन अलैहिस्सलाम के वाक़िये की तरफ़ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि फ़ातिमा बिन्त-ए-असद सलामुल्लाह अलैहा की दुआ पर दीवार-ए-काबा शक़ हुई और अली अलैहिस्सलाम ख़ाना-ए-ख़ुदा में पैदा हुए। यह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुआ की सबसे रौशन तजल्लि है।
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