बुधवार 7 जनवरी 2026 - 16:47
ईरान में मोसाद के लिए जासूसी करने वाले अपराधी को फांसी

हौज़ा / मोसाद के लिए जासूसी के अपराध में शामिल "अली अर्दस्तानी बिन अहमद" की मौत की सजा पर अमल कर दिया गया। यह सजा बुधवार सुबह 17 रजब 1447 हिजरी को सुप्रीम कोर्ट से पुष्टि के बाद सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने पर लागू की गई।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , मोसाद के लिए जासूसी के अपराध में शामिल "अली अर्दस्तानी बिन अहमद" की मौत की सजा पर अमल कर दिया गया। यह सजा बुधवार सुबह 17 रजब 1447 हिजरी को सुप्रीम कोर्ट से पुष्टि के बाद सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने पर लागू की गई।

न्यायिक दस्तावेजों के मुताबिक अली अर्दस्तानी को सोशल मीडिया के जरिए इजरायली गुप्त और आतंकवादी संगठन मोसाद ने भर्ती किया था। उसने तय रकम और झूठे वादों के बदले मोसाद के लिए कई मिशन अंजाम दिए। सबूतों और आरोपी के स्पष्ट स्वीकारोक्ति के मुताबिक वह मोसाद अधिकारियों के निर्देश पर संवेदनशील स्थानों की तस्वीरें, विशिष्ट लक्ष्यों से जुड़ी जानकारी और अन्य सामग्री मुहैया कराता रहा, जिसके बदले हर मिशन के खत्म होने पर डिजिटल मुद्रा के रूप में रकम प्राप्त करता था।

जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी की मोसाद अधिकारियों से सिर्फ ऑनलाइन ही नहीं बल्कि देश के अंदर जायोनी सरकार से जुड़े तत्वों से सीधी मुलाकातें भी होती रहीं। वह अलग-अलग जगहों पर एक निश्चित पहचान रखने वाले व्यक्ति से आमने-सामने मिलकर इकट्ठा की गई जानकारी, तस्वीरें और वीडियो उसके हवाले करता और बाद में नए निर्देश प्राप्त करता था।

अली अर्दस्तानी को उस समय गिरफ्तार किया गया जब वह इजरायली सरकार के लिए एक मिशन अंजाम दे रहा था। जांच और पूछताछ के दौरान उसने स्वीकार किया कि उसने देश से गद्दारी का उद्देश्य दस लाख डॉलर का इनाम और ब्रिटेन का वीजा हासिल करना बताया। उसने यह भी माना कि उसे मोसाद से अपने संपर्क और दुश्मन के लिए कीमती जानकारी मुहैया कराने का पूरा अहसास था।

ईरान में मोसाद के लिए जासूसी करने वाले अपराधी को फांसी

जांच पूरी होने और आरोप सिद्ध होने के बाद, सभी कानूनी जरूरतों के मुताबिक मुकदमा अदालत में चलाया गया। न्यायिक सुनवाई के दौरान भी आरोपी ने अपने अपराधों को कबूल करते हुए मोसाद के साथ सहयोग की जानकारी दी। अदालत ने सबूतों, जांच रिपोर्ट और स्पष्ट स्वीकारोक्ति के आधार पर अली अर्दस्तानी को जायोनी सरकार के फायदे के लिए जासूसी और विध्वंसक गतिविधियों का अपराधी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई।

फैसले में कहा गया कि आरोपी की सुरक्षा विरोधी गतिविधियां दुश्मन की योजनाओं की पूर्ति में प्रभावी और निर्विवाद थीं। बाद में मुकदमा सुप्रीम कोर्ट भेजा गया जहां न्यायाधीशों ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को कानूनी सिद्धांतों के मुताबिक बताते हुए अपील खारिज कर दी और आदेश की पुष्टि कर दी।

आखिरकार बुधवार सुबह 17 रजब 1447 हिजरी को सभी कानूनी जरूरतें पूरी होने के बाद मोसाद के जासूस अली अर्दस्तानी की मौत की सजा पर अमल कर दिया गया।

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