हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , यह बा अज़मत महफ़िल दारुस्सलाम के इलाके कीगो गो पोस्ट में क़ायम हौज़ा इमाम सादिक़ (अ.) के ज़ेरे एहतिमाम मुनअक़िद हुई। तक़रीब का उन्वान था, क़ुरआन हमें जोड़ता है”, जो इत्तेहाद, हमआहंगी और किताबे ख़ुदा की तरफ़ इज्तिमाई रुजू का पैग़ाम था।
महफ़िल का बुनियादी मक़सद यह था कि मोमिनीन के दिलों को माहे रमज़ान की आमद से पहले इबादत, तौबा और तक़र्रुबे इलाही के जज़्बे से ताज़ा किया जाए। मुमताज़ क़ुर्रा-ए-किराम ने मुख़्तलिफ़ मुक़ामात पर दिलनशीन अंदाज़ में तिलावत-ए-क़लामे पाक पेश की,
जिससे महफ़िल में रूहानी कैफ़ियत, सुकून और ख़ुशूअ की फ़िज़ा क़ायम हो गई। शिरकत करने वालों ने आयाते इलाही में ग़ौर व फ़िक्र करते हुए अपने ईमान की तज्दीद का अज़्म किया।
तक़रीब में मुख़्तलिफ़ दीनी व समाजी रहनुमा भी मौजूद थे। जमीयत-ए-शीयान-ए-तंज़ानिया (TIC) के शेख़ अरशद और शैख़ हमीदी जलाला ने मेज़बान की हैसियत से ख़िताब करते हुए कहा कि क़ुरआन करीम अख़लाक़ की तामीर और समाजी इत्तेहाद के फ़रोग़ का बुनियादी सरचश्मा है।
महफ़िल के ख़ुसूसी मेहमान शैख़ अली नगरको थे, जो तंज़ानिया मेनलैंड में नायब क़ाज़ी-उल-क़ुज़ात और बाकवाता के उलेमा काउंसिल के रुक्न हैं। उन्होंने अपने ख़िताब में ख़ास तौर पर माहे रमज़ान के दौरान क़ुरआन करीम से मज़बूत ताल्लुक़ क़ायम करने की अहमियत पर ज़ोर दिया।
शिरक़ा ने इस रूहानी इज्तिमा को बेहद बा बरकत क़रार दिया। मुक़र्रिरीन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि क़ुरआन करीम सिर्फ़ तिलावत की किताब नहीं, बल्कि एक मुकम्मल ज़ाबिता-ए-हयात है, जो अहले ईमान को अख़लाक़, तक़वा और उख़ुव्वत के परचम तले मुत्तहिद करता है।
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