रविवार 22 फ़रवरी 2026 - 15:34
कुरआन की शिक्षाओं को नए अंदाज और कलात्मक शैली के साथ नौजवानों तक पहुंचाया जाए।आयतुल्लाहिल उज़मा सुब्हानी

हौज़ा / आयतुल्लाहिल अज़मा जाफर सुब्हानी ने 33वीं अंतर्राष्ट्रीय कुरान प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर अपने संदेश में इस बात पर जोर दिया है कि आज की युवा पीढ़ी तक कुरान के ज्ञान को रोजमर्रा की भाषा और कलात्मक अंदाज में प्रस्तुत किया जाए ताकि उनके बौद्धिक और सांस्कृतिक सवालों का प्रभावी जवाब दिया जा सके।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,मरजय तकलीद  आयतुल्लाहिल अज़मा जाफर सुब्हानी ने 33वीं अंतर्राष्ट्रीय कुरान प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर अपने संदेश में इस बात पर जोर दिया है कि आज की युवा पीढ़ी तक कुरान के ज्ञान को रोजमर्रा की भाषा और कलात्मक अंदाज में प्रस्तुत किया जाए ताकि उनके बौद्धिक और सांस्कृतिक सवालों का प्रभावी जवाब दिया जा सके।

आयतुल्लाहिल अज़मा जाफर सुब्हानी का यह संदेश 33वीं अंतर्राष्ट्रीय कुरान प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह में पढ़कर सुनाया गया। अपने संदेश में उन्होंने रमज़ान के महीने को कुरान के अवतरण और ईमान वालों के दिलों की बहार करार देते हुए कहा कि इस बंरकत वाले महीने में कुरानिक महफिलों का आयोजन समाज को ईश्वरीय कलाम की रौशनी से महका देने का बेहतरीन अवसर है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि कुरान करीम महज पाठ की किताब नहीं है बल्कि मार्गदर्शन, जीवन और मानवीय सफलता का संपूर्ण संविधान है। जिन समाजों ने कुरान को अपने व्यावहारिक जीवन का हिस्सा बनाया, उन्होंने इज्जत, सुकून और तरक्की हासिल की, जबकि इस रोशनी के स्रोत से दूरी विभिन्न सामाजिक और नैतिक समस्याओं का कारण बनी। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में पहले से ज्यादा कुरान की शिक्षाओं की ओर रुजू करने की ज़रूरत है।

आयतुल्लाहिल अज़मा जाफर सुब्हानी ने नौजवानों को देश और इस्लामी उम्मत की असली पूंजी करार देते हुए कहा कि अगर कुरान की शिक्षाओं को आधुनिक आवश्यकताओं के मुताबिक, प्रभावी अंदाज और बौद्धिक जरूरतों को सामने रखते हुए प्रस्तुत किया जाए तो यह नई पीढ़ी की उलझनों और शंकाओं का संतोषजनक हल प्रदान कर सकता है और उन्हें सही रास्ते पर गामज़न कर सकता है।

उन्होंने इस बात की भी ओर इशारा किया कि आज इस्लाम के दुश्मन मीडिया और सांस्कृतिक माध्यमों के जरिए धार्मिक विश्वासों को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और कभी-कभी कुरान की पाक जात (पवित्र सत्ता) की बेहुरमती भी की जाती है। ऐसे हालात में सबसे बेहतरीन जवाब यह है कि कुरानिक संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए और कुरान के रहमानी, बौद्धिक और इंसानसाज चेहरे को दुनिया के सामने पेश किया जाए।

मरजय तकलीद ने रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम और अहले बैत (अलैहिमुस्सलाम) की सीरत को कुरान की व्यावहारिक व्याख्या करार देते हुए कहा कि जब तक समाज अख्लाक अदालत (न्याय), खल्क (सृष्टि) की खिदमत और जिम्मेदारी के एहसास को अपनाएगा, उसी कदर कुरान की रूह से करीब होगा।

उन्होंने उम्मीद जताई कि कुरानिक प्रदर्शनियां ईमान, उम्मीद और इत्तेहाद (एकता) को ताकत देंगी और कुरान को घरों, तालीमी (शैक्षिक) संस्थानों और सामाजिक केंद्रों में और ज्यादा  सक्रिय किरदार अदा करने का मौका प्रदान करेंगी।

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