हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हज़रत रसूल अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.व.) का 1500वां यौमे विलादत क़रीब है। मुल्क हिन्दुस्तान समेत पूरी दुनिया इस अज़ीम दिन की तैय्यारियों में मसरूफ़ है। इसी सिलसिले में हिन्दुस्तान में वली फ़क़ीह के नुमाइंदे ने एक अहम पैग़ाम जारी किया है।
संदेश कुछ इस प्रकार है:
لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِّنْ أَنفُسِكُمْ عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَا عَنِتُّمْ حَرِيصٌ عَلَيْكُم بِالْمُؤْمِنِينَ رَءُوفٌ رَّحِيمٌ۔
(سورۂ توبہ، آیت 128)
सूरए क़ुरआन, सूरह तौबा, आयत 128)
पहला हिस्सा: यौमे विलादत-ए-रसूल (स.अ.व.) की अहमियत ،रसूले इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.व.) की विलादत-ए-बासआदत के पंद्रह सौ साल मुकम्मल होना एक निहायत क़ीमती और बाबरकत मौक़ा है। यह मौक़ा हमें दावत देता है कि हम आन हज़रत (स.अ.व.) के अबदी पैग़ाम जो इंसान-साज़ी, आला अख़लाक़, अद्ल व इंसाफ़ और इंसानी करामत पर मब्नी हैं।पर दुबारा ग़ौर व फ़िक्र करें और उसे अपनी ज़िन्दगियों में नाफ़िज़ करें।
आप (स.अ.व.) न सिर्फ़ इस्लामी और इंसानी तहज़ीब के बानी हैं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए रहमत, अक़्लानियत और इज़्ज़त व शराफ़त के अलमबरदार भी हैं।
दूसरा हिस्सा: हिन्दुस्तान जैसे मुतनव्वे मआशरे में सीरत-ए-नबवी (स.अ.व.) का किरदार
हिन्दुस्तान एक क़दीम और मुतनव्वे मआशरा है, जहाँ मुख़्तलिफ़ अदयान और सक़ाफ़तें बाहम रहती हैं। ऐसे माहौल में सीरत-ए-नबवी (स.अ.व.) की सही वज़ाहत और तबीइन समाजी अम्न को मज़बूत बनाने, बाहमी एहतेराम को फ़रोग़ देने और इंसानी एकजहती को मुस्तहकम करने में अहम किरदार अदा कर सकती है।
इस्लाम-ए-मुहम्मदी (स.अ.व.) मुक़ालमे, अद्ल, अहद की पाबंदी और इंसान की हुरमत की तालीम देता है और हर क़िस्म की शिद्दतपसंदी और तशद्दुद से मुकम्मल तौर पर पाक है।
तीसरा हिस्सा: उलेमा, मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब के पैरोकारों और नौजवानों की ज़िम्मेदारी उलेमा, असातिज़ा और मुहक़्क़िक़ीन की ज़िम्मेदारी बेहद अहम है कि वह गहरे इल्मी मुतालए और माक़ूल अंदाज़-ए-बयान के ज़रिये इस्लाम-ए-रह्मानी और सीरत-ए-तैय्यिबा के इंसान-साज़ पहलुओं को ज़माने के तक़ाज़ों के मुताबिक़ पेश करें और हर क़िस्म की तहरीफ़ और ग़लतफ़हमी का इल्मी अंदाज़ में इज़ाला करें।
मुख़्तलिफ़ अदयान व मज़ाहिब के पैरोकार भी मुश्तरका अख़लाक़ी अक़दार को बुनियाद बना कर मुसबत मुक़ालमे और समाजी तआवुन की राहें हमवार कर सकते हैं।
नौजवान और स्टूडेंट्स, जो मुस्तक़बिल के मेमार हैं, उन्हें चाहिए कि सीरत-ए-नबवी (स.अ.व.) को अपना नमूना-ए-अमल बनाएं, इल्म हासिल करें, अपने अख़लाक़ को संवारें, समाजी ज़िम्मेदारी को महसूस करें और अपनी दीनी शनाख़्त को मज़बूत रखें।
चौथा हिस्सा: अमली तजावीज़ रसूल-ए-रहमत (स.अ.व.) की विलादत के पंद्रह सौ साल मुकम्मल होने के इस बाबरकत मौक़े पर मु'अक्कद तौर पर सिफ़ारिश की जाती है कि:
इल्मी और बैनुल-मज़ाहिब नशिस्तों और कॉन्फ़्रेंसों का इनइक़ाद किया जाए।
हिन्दुस्तान की राइज ज़बानों में तहक़ीक़ी और फ़न्नी व अदबी आसार तैयार किए जाएँ।नौजवानों के लिए तालीमी प्रोग्राम तरतीब दिए जाएँ और अद्ल व ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ के मैदान में अवामी सरगर्मियों की हिमायत की जाए।
आख़िर में तमाम सक़ाफ़ती, दीनी और तालीमी अंजुमनों और इदारों से दावत दी जाती है कि वह मुनज़्ज़म मंसूबाबंदी के साथ मुख़्तलिफ़ इल्मी व सक़ाफ़ती प्रोग्राम मुनअक़िद करें और तालीमात-ए-नबवी (स.अ.व.) के फ़रोग़, पुरअमन बक़ाए बाहमी के इस्तेहकाम और इंसानी अक़दार को आम करने में फ़आल किरदार अदा करें।
अब्दुल मजीद हकीम इलाही
नुमाइंदा-ए-वली फ़क़ीह दर हिन्दुस्तान
आपकी टिप्पणी