हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, नए ईरानी वर्ष (नौरोज़) के आगमन पर, हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन हादी मुश्कदार ने कठिनाइयों, ईश्वरीय परीक्षाओं और राष्ट्रीय एकता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वास्तविक वसंत और सबसे उत्तम घर की सफाई, क्षेत्र से वर्चस्व और कुफ्र (अविश्वास) की व्यवस्था को बाहर निकालना है।
उन्होने आपदाओं और इलाही इम्तेहानो के फ़लसफ़े को समझाते हुए कहा कि यह संसार कठिनाइयों से घिरा हुआ है, और अल्लाह के सबसे क़रीब लोगों को सबसे अधिक कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। उन्होंने कुरआन की आयतों और अहले बैत (अ) की शिक्षाओं का हवाला देते हुए कहा कि जिन घटनाओं को हम बुरा समझते हैं, उनमें अधिकतर हमारी भलाई छिपी होती है।
कठिनाइयाँ विकास का माध्यम
हुज्जतुल-इस्लाम मुश्कदार ने हाल की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि 12-दिवसीय युद्ध और दिसंबर के दंगो जैसी घटनाएँ, हालांकि बाहरी तौर पर अप्रिय थीं, लेकिन वे ईरान के लिए अभ्यास-क्षेत्र और शुद्धिकरण का माध्यम बनीं। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं ने देश की कमियों को दूर करने में मदद की और विदेशी एजेंटों की पहचान कर उनकी साजिशों को नाकाम किया।
उन्होंने कहा, "जैसे आठ साल के रक्षात्मक युद्ध (ईरान-इराक युद्ध) ने हमारे किशोरों और युवाओं को सेनापति और अग्रदूत बना दिया, वैसे ही वर्तमान चुनौतियाँ भी हमारी अगली पीढ़ी को इमाम ज़माना (अ) के सैनिक बनने का अनुभव प्रदान करेंगी"।

हृदय की सफ़ाई और राष्ट्रीय एकता का अवसर
हादी मुश्कदार ने वर्ष परिवर्तन के क्षण को 'हृदय की सफाई' और राष्ट्रीय एकता के एक अनमोल अवसर के रूप में चित्रित किया। उन्होंने कहा कि अहले-बैत (अ) की कला यह रही है कि उन्होंने राष्ट्रीय पर्वों को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उनका उपयोग अल्लाह की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए किया।
उन्होंने कहा, "लोग घर की सफाई की बात करते हैं, लेकिन हृदय की सफाई की ओर कम ध्यान देते हैं। यह क्षण हमारे दिलों को निराशा से निकालकर आध्यात्मिक जीवन की ओर ले जाने का है।"
एकता, विजय का रहस्य और ज़हूर की भूमिका
हुज्जतुल इस्लाम मुश्कदार ने जोर देकर कहा कि जनता की एकजुटता ही अत्याचार के विनाश और मानवता के उद्धारकर्ता (इमाम महदी) के ज़ोहूर होने के लिए आधार तैयार करने वाली कुंजी है। उन्होंने अरबईन पदयात्रा का उदाहरण देते हुए कहा कि एकता ही कठिनाइयों को सुहावना बना देती है।
उन्होंने कहा, "यह एकता और सद्भाव, जो आज अमेरिका और ज़ायोनिस्ट अत्याचारियों के खिलाफ़ हमारी ताकत है, हमें तब तक बनाए रखना होगी जब तक कि अत्याचार की जड़ें पूरी तरह समाप्त न हो जाएँ। यही वह भूमिका है जो इमाम ज़माना (अ) के ज़ोहूर होने का मार्ग प्रशस्त करेगी"।
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