शुक्रवार 13 फ़रवरी 2026 - 16:54
राष्ट्रीय एकता और सशक्त ईरान ही निजात का अकेला रास्ता हैः आयतुल्लाह सईदी

हौज़ा / 22 बहमन को इस्लामी क्रांति की सफलता की वर्षगांठ पर आयोजित रैलियों और समारोहों में जनता की भारी भागीदारी को इस्लामी व्यवस्था के प्रति जनता के समर्थन की स्पष्ट निशानी बताते हुए आयतुल्लाह सईदी ने कहा कि मौजूदा नाजुक परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता की रक्षा करना सबसे बड़ी आवश्यकता है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,22 बहमन को इस्लामी क्रांति की सफलता की वर्षगांठ पर आयोजित रैलियों और समारोहों में जनता की भारी भागीदारी को इस्लामी व्यवस्था के प्रति जनता के समर्थन की स्पष्ट निशानी बताते हुए आयतुल्लाह सईदी ने कहा कि मौजूदा नाजुक परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता की रक्षा करना सबसे बड़ी आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि हाल की रैलियों में जनता की बड़ी और संगठित उपस्थिति ने एक बार फिर साबित कर दिया कि ईरानी राष्ट्र अपने राजनीतिक तंत्र का मजबूत सहारा है। उन्होंने इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता, आयतुल्लाह सैय्यद अली खामनेई के संदेश का हवाला देते हुए जोर दिया कि राष्ट्रीय एकता को हर हालत में सुरक्षित रखना वर्तमान समय की सबसे अहम जिम्मेदारी है।

आयतुल्लाह सईदी ने “सशक्त ईरान” को एक रणनीतिक विचार बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य देश को आर्थिक, सांस्कृतिक, रक्षा और सामाजिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भर और शक्तिशाली बनाना है। उनके अनुसार राष्ट्रीय शक्ति हर देश की मूल आवश्यकता है, लेकिन ईरान के लिए इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि वह वैश्विक शक्तियों, विशेष रूप से अमेरिका, के दबाव का सामना कर रहा है।

अपने संबोधन में आयतुल्लाह सईदी ने अमेरिकी नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए चेतावनी दी कि यदि वाशिंगटन ने क्षेत्र में ईरान के खिलाफ कोई बड़ी सैन्य भूल की तो उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि “अमेरिका मुर्दाबाद” का नारा अमेरिकी जनता के खिलाफ नहीं, बल्कि अमेरिकी सरकार की नीतियों के विरोध में है।

उन्होंने सांस्कृतिक पहचान और जीवन शैली को भी राष्ट्रीय शक्ति का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने मुस्तफा कमाल अतातुर्क और रज़ा शाह पहलवी के दौर का उदाहरण देते हुए कहा कि पश्चिमी शैली के सुधारों ने समाजों को उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से दूर कर दिया, जिसके नकारात्मक प्रभाव आज भी महसूस किए जा रहे हैं।

आयतुल्लाह सईदी ने मस्जिदों को इस्लामी समाज का केंद्र बताया और कहा कि ये केवल पूजा स्थल नहीं हैं, बल्कि सामाजिक संगठन और वैचारिक प्रतिरोध का मजबूत केंद्र हैं। उन्होंने कहा कि हाल की अशांति में कुछ मस्जिदों को नुकसान पहुंचा, लेकिन जनता ने उन्हें पुनः निर्मित कर अपनी धार्मिक और क्रांतिकारी निष्ठा का व्यावहारिक प्रमाण दिया। उनके शब्दों में, मस्जिदें और जनता हमारी रक्षा शक्ति की वास्तविक आधारशिला हैं।

अपने भाषण के पहले भाग में उन्होंने नैतिक और आध्यात्मिक विषयों पर प्रकाश डालते हुए पैगंबर मुहम्मद स.ल.व. की एक हदीस का उल्लेख किया, जिसमें सांसारिक लगाव से बचने की सीख दी गई है। उन्होंने कुरआन की सूरह फतह की एक आयत का हवाला देते हुए कहा कि वास्तविक सत्ता अल्लाह के हाथ में है और क्षमा प्राप्त करने के लिए तौबा, प्रार्थना और हृदय की पवित्रता आवश्यक है।

इसी प्रकार उन्होंने हज़रत अली और इमाम रज़ा के कथनों का हवाला देते हुए कहा कि माह-ए-शाबान के अंतिम दिनों में दुआ, इस्तिग़फ़ार और आपसी मतभेद समाप्त करना चाहिए।

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