हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,ईरानियों; तुम सिर्फ़ एक सरज़मीन के रहने वाले नहीं, बल्कि एक सोच हो, एक क़ियाम हो, एक ऐसा नूर हो जो सदियों के अंधेरों को चीरता हुआ दिलों के उफ़ुक़ पर उभरा है।
तुम्हारी दास्तान मिट्टी की नहीं बल्कि रूह की दास्तान है। यह वही दास्तान है जो कभी कर्बला के तपते रेगिस्तानों में लिखी गई, और आज तेहरान की गलियों, क़ुम के मदरसों और ईरान के हर कोचे व बाज़ार में ज़िंदा व जावेद है।
जब दुश्मन ने तुम्हें डराने के लिए आग बरसाई, जब आसमानों से मौत के पैग़ाम उतरे, जब तुम्हारे नौजवानों के सीने गोलियों से छलनी किए गए, तब तुमने चीख कर नहीं, मुस्कुरा कर जवाब दिया।
यह मुस्कुराहट कोई आम मुस्कुराहट नहीं थी, यह यक़ीन की मुस्कुराहट थी, यह उस बंदे की मुस्कुराहट थी जिसे अपने रब पर मुकम्मल भरोसा हो।
तुमने दुनिया को बता दिया कि: “हमें मिटाने वाले ख़ुद मिट जाएंगे, मगर हम बाक़ी रहेंगे, क्योंकि हम हक़ के साथ हैं!”
ऐ क़ौम-ए-बेदार! तुम्हारे क़दमों की आहट में इंक़लाब की सदा है, तुम्हारे नारों में कर्बला की गूंज है, तुम्हारी आंखों के आंसुओं में दुआ है और तुम्हारे ख़ून में शहादत की ख़ुशबू है।
यह वही ख़ुशबू है जिसे आयतुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी ने महसूस किया था, जब उन्होंने एक मज़लूम क़ौम में ज़िंदगी की रूह फूंकी, और आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामनेई ने अपनी बसीरत, शुजाअत और क़ियादत से उसे परवान चढ़ाया और शहादत से उसे बक़ा बख्शी। आज वही ख़ुशबू आयतुल्लाह सैय्यद मुजतबा ख़ामनेई की बसीरत में झलक रही है, जो तूफ़ानों के दरमियान भी उम्मत की कश्ती को साहिल की तरफ़ ले जा रही है।
ईरान की क़ौम! तुम्हारी इस्तिक़ामत सिर्फ़ एक सियासी मुज़ाहेमत नहीं, यह एक सफ़र-ए-इलल्लाह है—जहां हर क़ुर्बानी इबादत बन जाती है, जहां हर शहीद एक ज़िंदा आयत बन जाता है, और जहां हर मां ज़ैनबी किरदार में ढल जाती है।
हाँ! यह वही ज़ैनबी किरदार है, जो ज़ैनब बिन्ते अली (अ.स.) ने कर्बला के बाद दुनिया को सिखाया कि ज़ुल्म के दरबार में भी हक़ की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता।
ऐ सरज़मीन-ए-ईरान! तुम्हारे शहीद सिर्फ़ तुम्हारे नहीं, वह पूरी इंसानियत के माथे का झूमर हैं। उनका लहू सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं गिरा, वह आसमानों तक पहुंचा है और अर्श को हिला गया है।
जब एक नौजवान “लब्बैक या हुसैन (अ.स.)” कहकर मैदान में उतरता है, तो दरअसल वह वक़्त के यज़ीद को ललकार रहा होता है। वह एलान कर रहा होता है कि: “हम वह क़ौम हैं जो सर कटा सकते हैं, मगर सर झुका नहीं सकते!”
दुश्मन ने तुम्हें तोड़ने की बहुत कोशिश की—पाबंदियां लगाईं, मईशियत को निशाना बनाया, प्रोपेगंडा के तूफ़ान खड़े किए—मगर वह यह भूल गए कि यह क़ौम टैंकों से नहीं, ईमान से चलती है!
तुम्हारी ताक़त तुम्हारे हथियार नहीं, तुम्हारी ताक़त तुम्हारी नमाज़ें हैं, तुम्हारी ताक़त तुम्हारी दुआएं हैं, तुम्हारी ताक़त तुम्हारी वहदत है।
और यही वह राज़ है जिसने तुम्हें नाक़ाबिले-शिकस्त बना दिया है।
आज दुनिया हैरान है कि एक क़ौम इतने दबाव के बावजूद कैसे क़ायम है? कैसे हर हमले के बाद और मज़बूत हो जाती है?
जवाब सिर्फ़ एक है:
“क्योंकि यह क़ौम ख़ुदा पर यक़ीन रखती है…”
ऐ क़ौम-ए-इस्तिक़ामत! तुम सिर्फ़ अपने लिए नहीं लड़ रहे, तुम हर मज़लूम की जंग लड़ रहे हो, तुम हर उस आंख के आंसू का बदला ले रहे हो जो ज़ुल्म की वजह से बहे हैं।
तुम्हारी आवाज़ फ़िलिस्तीन की गलियों में गूंजती है, तुम्हारी ललकार यमन के पहाड़ों में सुनाई देती है, तुम्हारी इस्तिक़ामत लेबनान के मोर्चों में हौसला बनकर उभरती है।
तुम एक क़ौम नहीं, एक तहरीक हो, एक उम्मीद हो, एक वादा-ए-इलाही हो।
और याद रखो! जब क़ौमें ख़ुदा के लिए खड़ी हो जाती हैं, तो फिर ख़ुदा उनके लिए खड़ा हो जाता है—और जिसके साथ ख़ुदा हो, उसका पूरी दुनिया भी कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
सलाम हो तुम पर ऐ क़ौम-ए-ईरान! तुम्हारे सब्र पर, तुम्हारे जिहाद पर, तुम्हारे इश्क़-ए-इलाही पर सलाम।
तुमने एक बार फिर साबित कर दिया: “यह रास्ता कर्बला का रास्ता है—और इस रास्ते का अंजाम हमेशा फ़तह है!”
ऐ ईरान की क़ौम! एक फ़ासिक़ व फ़ाजिर, शराबी व क़ातिल गुलाबी मसखरे ने तुम्हारे उस परचम को झुकाना चाहा, जिसके रंग तरक़्क़ी, अमन और इस्तिक़ामत के तरजुमान हैं और जिसमें अल्लाह का नाम “व कलिमतुल्लाहि हियल उल्या” का एलान है—मगर आज वही परचम न सिर्फ़ ईरान में बल्कि ख़ुद अमेरिका में भी बुलंद है, और उसे बुलंद करने वाले “नो किंग्स” का नारा लगाकर अपने चुनाव पर शर्मिंदा और तुम्हारी इस्तिक़ामत का एतराफ़ कर रहे हैं।
ऐ बहादुरों! शैतान-ए-बुज़ुर्ग, उसके नाजायज़ औलाद और उसके चापलूसों और गुलामों ने चाहा कि तुम्हें मिटा दें—मगर वह ख़ुद मिट रहे हैं और शिकस्त खा रहे हैं।
क़ौम-ए-ग़यूर के हौसले को सलाम!
क़ौम-ए-शुजा के जज़्बे को सलाम!
क़ौम-ए-शरीफ़ के सब्र को सलाम!
सैयद अली हाशिम आब्दी
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