सोमवार 2 फ़रवरी 2026 - 23:03
कर्बलाए अस्र में ख़ामेनेई रग़-ए-बातिल के लिए नश्तर!

कर्बलाए अस्र में अगर कोई हुसैन इब्न अली अलैहिस्सलाम की नुसरत और मदद करना चाहता है, तो उसे सैयद अली ख़ामेनेई का साथ देना चाहिए और ईरान की हिमायत करनी चाहिए, क्योंकि ईरान ही दौर-ए-हाज़िर में यज़ीद-ए-अस्र के मुक़ाबिल पूरी इस्तिक़ामत के साथ खड़ा है।

लेखकः मौलाना तकी अब्बास रिज़वी कलकत्तवी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी! कर्बलाए अस्र में अगर कोई हुसैन इब्न अली अलैहिस्सलाम की नुसरत और मदद करना चाहता है, तो उसे सैयद अली ख़ामेनेई का साथ देना चाहिए और ईरान की हिमायत करनी चाहिए, क्योंकि ईरान ही दौर-ए-हाज़िर में यज़ीद-ए-अस्र के मुक़ाबिल पूरी इस्तिक़ामत के साथ खड़ा है।

सर उठाते हैं यहाँ भी अस्र-ए-हाज़िर के यज़ीद
कल यह ख़ित्ता भी मैदान-ए-कर्बला हो जाएगा

कर्बला का वाक़िआ तारीख़-ए-इंसानियत का एक संग-ए-मील है, जिसने न सिर्फ़ मुसलमानों बल्कि पूरी दुनिया को हक़ और बातिल के दरमियान फ़र्क़ दिखाया। कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का मअरका सिर्फ़ एक सियासी लड़ाई नहीं था, बल्कि यह एक अबदी जंग थी, जिसमें एक तरफ़ ज़ुल्म और फ़साद का नुमाइंदा यज़ीद था और दूसरी तरफ़ हक़ और सदाक़त का अलमबरदार हुसैन इब्न अली (अ) थे। हुसैन (अ)  इब्न अली (अ)  ने दुनिया को यह दर्स दिया कि ज़ुल्म के सामने सर झुकाना और अपना ईमान बेचना किसी भी क़ीमत पर गवारा नहीं करना चाहिए।

यह वाक़िआ आज तक हमारी रूहों में ज़िंदा है और हम में से हर फ़र्द कर्बला की क़ुर्बानियों और इमाम हुसैन (अ)  की इस्तिक़ामत को दिल से तस्लीम करता है। लेकिन जब हम मौजूदा दौर पर नज़र डालते हैं तो हमें यह एहसास होता है कि कर्बला की जंग आज भी जारी है और इसका एक नया रूप हमारे सामने है।

आज की दुनिया में जहाँ आलमी ताक़तें अपनी सल्तनतों के लिए एक-दूसरे से लड़ रही हैं, वहाँ एक तरफ़ वह ईरान है जो इस्तिक़ामत की एक मिसाल बनकर खड़ा है। ईरान, जिसकी क़ियादत आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई कर रहे हैं, वही हुसैन (अ)  के मिशन को ज़िंदा रखने की कोशिश कर रहा है। ईरान की हुकूमत और क़ियादत ने यज़ीद-ए-अस्र के मुक़ाबिल जो मौक़िफ़ इख़्तियार किया है, वह आज के दौर में हुसैन (अ)  की जद्दोजहद की एक जदीद शक्ल है।

वह इंक़िलाब जिसकी जहाँ में नहीं नज़ीर
वह इंक़िलाब जिसने बशर को दिया ज़मीर

वह इंक़िलाब जिसने ज़ुल्म के तोड़े हैं तीर
रख़ा नहीं इम्तियाज़ शहनशाह और फ़क़ीर

बाब-ए-सियाह था जो वरक़, वह उलट दिया
जिसने यज़ीद-ए-वक़्त का तख़्ता पलट दिया

ईरान का किरदार और सैयद अली ख़ामेनेई की क़ियादत

ईरान, सैयद अली ख़ामेनेई की क़ियादत में, आज कर्बला के उस रूहानी और सियासी पैग़ाम को दुनिया भर में फैला रहा है। उनकी क़ियादत ने ईरान को उस रास्ते पर गामज़न किया है जहाँ वह सिर्फ़ अपने दाख़िली मामलात में ही नहीं, बल्कि आलमी सतह पर भी ज़ुल्म और जब्र के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहा है। ईरान का मौक़िफ़ यज़ीद-ए-अस्र यानी आलमी साम्राज्यवाद, इस्तिमारी ताक़तों और उनके हामीयों के ख़िलाफ़ खड़ा है।

फ़िक्र-ए-हक़सोज़ यहाँ काश्त नहीं कर सकती
कर्बला ताज को बरदाश्त नहीं कर सकती

सैयद अली ख़ामेनेई की क़ियादत में ईरान ने हर वह रास्ता इख़्तियार किया है जिसमें उसने अपनी ख़ुदमुख़्तारी, आज़ादी और उसूलों की हिफ़ाज़त की। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा इमाम हुसैन (अ)  ने कर्बला में किया था। हुसैन इब्न अली (अ)  का यह पैग़ाम था कि अगर ज़िंदगी की क़ीमत पर भी हक़ का दिफ़ा करना पड़े तो वह कर गुज़रना चाहिए।

कर्बला सर से कफ़न बाँध के जब आती है
वुसअत-ए-अर्ज़-ओ-समावात पे छा जाती है

आज ईरान में उसी पैग़ाम का परचम बुलंद है और सैयद अली ख़ामेनेई उसी राह पर चलकर दुनिया को बता रहे हैं कि हक़ीक़ी आज़ादी और ख़ुदमुख़्तारी सिर्फ़ वही क़ौम हासिल कर सकती है जो ज़ुल्म के सामने सरेंडर करने के बजाय इस्तिक़ामत दिखाए।

यज़ीद-ए-अस्र के मुक़ाबिल ईरान की इस्तिक़ामत

आज की दुनिया में यज़ीद-ए-अस्र का मफ़हूम सिर्फ़ एक फ़र्द तक महदूद नहीं है, बल्कि यह उस निज़ाम की नुमाइंदगी करता है जो ताक़त के बल पर दुनिया को अपनी मर्ज़ी से चलाना चाहता है। ये साम्राज्यवादी क़ुव्वतें, जिनकी क़ियादत अमरीका, इस्राईल और दीगर आलमी ताक़तों के हाथों में है, अपने मुफ़ादात के लिए आलमी सियासत को इस तरह मुनज़्ज़म करती हैं कि कमज़ोर मुमालिक को दबाया जा सके। ईरान इन ताक़तों के ख़िलाफ़ खड़ा है और वही किरदार अदा कर रहा है जो इमाम हुसैन (अ)  ने कर्बला में अदा किया था।

ईरान की इस्तिक़ामत ने यह साबित किया है कि जब एक क़ौम अपने उसूलों और हुक़ूक़ के दिफ़ा का पुख़्ता इरादा रखती है तो दुनिया की कोई ताक़त उसे अपनी मर्ज़ी से नहीं जकड़ सकती। ईरान ने न सिर्फ़ अपने दाख़िली मसाइल में इस्तिक़ामत दिखाई है, बल्कि आलमी सतह पर भी उसने बातिल क़ुव्वतों के सामने सर न झुकाने का अहद किया है।

हुसैन इब्न अली (अ)  की नुसरत का मफ़हूम आज के दौर में

अगर हम वाक़ई हुसैन (अ)  के मिशन को ज़िंदा रखना चाहते हैं तो हमें सिर्फ़ उनकी क़ुर्बानियों की याद नहीं मनानी चाहिए, बल्कि उनकी इस्तिक़ामत और उनके उसूलों की पैरवी करनी चाहिए। हुसैन (अ)  का पैग़ाम सिर्फ़ उस वक़्त के यज़ीद तक महदूद नहीं था, बल्कि तमाम ज़ालिम क़ुव्वतों के ख़िलाफ़ था। आज जब हम दुनिया में ज़ुल्म के निज़ाम को देखते हैं तो हमें हुसैन (अ)  के पैग़ाम को अपनाना होगा।
ईरान की क़ियादत में सैयद अली ख़ामेनेई ने हुसैन (अ)  की तरह ज़ुल्म के सामने डट जाने का अहद किया है। ईरान ने आलमी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ एक मज़बूत मौक़िफ़ अपनाया है और उस पर इस्तिक़ामत के साथ क़ायम रहा है। इसी तरह अगर हम इमाम हुसैन (अ)  के मिशन को हक़ीक़त में ज़िंदा रखना चाहते हैं तो हमें ईरान की हिमायत करनी होगी, क्योंकि वही आज कर्बला की तरह बातिल के सामने खड़ा है।

मीडिया — इस्लाम और ईरान के ख़िलाफ़ मग़रिब का मोअस्सिर हथियार

अस्र-ए-हाज़िर में इस्लाम, मुसलमानों और ईरान पर मग़रिबी ज़राए-ए-इबलाग़ की जो यलग़ार है, वह हमह-जहती और हमह-गीर है। मौजूदा दौर मीडिया का दौर है। अगर ग़ौर किया जाए तो महसूस होगा कि मग़रिब महज़ मोअस्सिर और ताक़तवर मीडिया के ज़रिए ही दुनिया और लोगों के ज़ेहनों पर हुकूमत कर रहा है। मशरिक़ में हिंदुस्तान और पाकिस्तान जैसे अज़ीम मुमालिक भी इसमें शामिल हैं जहाँ सियासी शऊर का फ़ुक़दान है। जहालत उरूज पर है और मग़रिबी तालीम-याफ़्ता तबक़ा हर क़िस्म की रहनुमाई के लिए मग़रिब की तरफ़ ललचाई निगाहों से देखता है। इन मुल्कों की मीडिया की लगाम भी उन्हीं के हाथों में है और वह उनके इशारों पर रोज़ाना इस्लाम, मुसलमान और ईरान के ख़िलाफ़ नए-नए शोषे छोड़ती रहती है जिनका मक़सद लोगों की सोच को मुतअस्सिर करना और उनकी फ़िक्र को एक ख़ास रुख़ पर डालना है। यह सब इसलिए है कि मग़रिब इस्लाम और ईरान की उभरती हुई मज़हबी लहर से ख़ौफ़ज़दा है और इसके मुक़ाबले के लिए मीडिया को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। मौजूदा दौर में दुश्मन का सबसे मोअस्सिर हथियार गोली नहीं बल्कि ख़बर है।

आज जंगें सिर्फ़ मैदान-ए-कारज़ार में नहीं, बल्कि ज़ेहनों, शऊर और बयानियों के मोर्चे पर लड़ी जाती हैं। मीडिया अब सिर्फ़ इत्तिला-रसानी का ज़रिया नहीं रहा, बल्कि नज़रियाती जंग का सबसे बड़ा और ख़तरनाक मैदान बन चुका है। सच को मरोड़ना, बातिल को हक़ बनाकर पेश करना और मज़लूम को मुजरिम साबित करना—ये सब जदीद यज़ीदी निज़ाम के हथियार हैं जो ख़ामोशी से वार करते हैं, मगर असर नस्लों तक जाता है।

इसी लिए कर्बलाए अस्र में मअरका सिर्फ़ बंदूक़ और मिसाइल का नहीं बल्कि बयानिए का है। एक तरफ़ वह मीडिया है जो ज़ुल्म को जायज़ ठहराता है, क़ातिल को हीरो बनाता है और हक़ की आवाज़ को दबाने की हर मुमकिन कोशिश करता है; और दूसरी तरफ़ वह मौक़िफ़ है जो सच पर खड़ा है चाहे दुनिया उसे तन्हा ही क्यों न छोड़ दे। जैसा कि प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया से वाबस्ता हर साहिब-ए-फ़हम जानता है कि 12 रोज़ा जंग के बाद ईरान और ईरान के सुप्रीम लीडर के ख़िलाफ़ किस क़िस्म की नाज़ेबा ज़बान इस्तेमाल की गई और उनकी इमेज को मस्ख़ करने की कोशिश की गई।

यही वह मक़ाम है जहाँ सैयद अली ख़ामेनेई का किरदार सिर्फ़ एक सियासी रहनुमा का नहीं रहता, बल्कि वह रग़-ए-बातिल के लिए नश्तर बनकर सामने आते हैं। वह उस झूठे आलमी बयानिए को चीर देते हैं जो यज़ीद-ए-अस्र ने मीडिया, प्रोपेगंडा और नफ़्सियाती जंग के ज़रिए क़ायम किया है। उनकी क़ियादत में ईरान न सिर्फ़ अस्करी मोर्चे पर बल्कि फ़िक्री और इबलाग़ी मोर्चे पर भी इस्तिक़ामत की अलामत बन चुका है।

हमारी ज़िम्मेदारी

यह वक़्त है कि हम अपनी ज़िम्मेदारी समझें और इमाम हुसैन (अ)  के मिशन को अमली तौर पर अपनाएँ। हमें अपने ज़मीर की आवाज़ सुननी होगी और दुनिया में ज़ुल्म और फ़साद के ख़िलाफ़ जुरअतमंद मौक़िफ़ इख़्तियार करना होगा। इसका मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि हम सैयद अली ख़ामेनेई की हिमायत करें, बल्कि उनकी क़ियादत में ईरान की हिमायत करनी होगी। हमें सोशल नेटवर्क्स पर इल्म और इस्तिदलाल के ज़रिए बेहतर कारकर्दगी दिखानी होगी। सिर्फ़ तीर-ओ-तुफ़ंग और बंदूक़ के मैदान में दुश्मन का मुक़ाबला काफ़ी नहीं, बल्कि क़िर्तास-ओ-क़लम और नश्रो-इशाअत की दुनिया में भी उसका मुक़ाबला ज़रूरी है, ताकि इस्लाम और ईरान को दरपेश हर चैलेंज का जवाब दिया जा सके, क्योंकि वही आज कर्बला की जद्दोजहद का परचम बुलंद किए हुए है।

अगर हमें हुसैन (अ)  के मिशन को ज़िंदा रखना है तो हमें अपने अमल से साबित करना होगा कि हम सिर्फ़ हुसैन (अ)  की याद में नहीं बल्कि उनके रास्ते पर चलकर बातिल के मुक़ाबिल खड़े हैं। और यह हमारी तारीख़ी ज़िम्मेदारी है कि हम सैयद अली ख़ामेनेई की क़ियादत में ईरान की हिमायत करें, क्योंकि वही आज के दौर में हुसैन (अ)  की इस्तिक़ामत की ज़िंदा मिसाल हैं।

ऐ इंक़िलाब! तुझसे जहाँ में बहार है
तेरा ही नाम गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार है

तू इक नई हयात का आईना-दार है
तेरे ही साथ मर्ज़ी-ए-परवरदिगार है

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