हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,इस्लाम के इतिहास को पढ़ने से हमें एक ऐसी सच्चाई का पता चलता है, जहाँ एक तरफ़ हिदायत (सही रास्ता) देने वाले, इल्म और अच्छे अख़लाक़ वाले लोग होते हैं, और दूसरी तरफ़ सत्ता के लालची, जलन और डर से भरे हुए ज़ालिम हुक्मरान खड़े होते हैं। ऐसी ही एक दर्दनाक कहानी इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी और अब्बासी हाकिम मंसूर दवानिक़ी के दौर में देखने को मिलती है।
इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम वो महान शख्सियत थे जिन्होंने इस्लामी उलूम को मज़बूत किया, हिकमत को फैलाया और हज़ारों छात्रों को तैयार किया। उनके पास एक बड़ी तालीम गाह (मदरसा) थी, जहाँ से इल्म और हिकमत की रोशनी पूरी दुनिया में फैली। लेकिन यही उनकी महानता अब्बासी हुकूमत के लिए खतरा बन गई।
मंसूर दवानिक़ी, जो बाहर से एक ताकतवर बादशाह लगता था, लेकिन अंदर से डर और असुरक्षा में जी रहा था। उसे इमाम की बढ़ती हुई इज्जत और लोगों के दिलों में उनकी मोहब्बत से डर लगता था। वह जानता था कि तलवार से शरीर को खत्म किया जा सकता है, लेकिन दिलों में बसने वाले लोगों को नहीं मिटाया जा सकता।इसलिए उसने हमेशा की तरह ज़ालिमों वाला रास्ता अपनाया—इल्ज़ाम लगाना, साज़िश करना, अपमान करना और मानसिक तकलीफ देना।
कभी वह इमाम पर बग़ावत का इल्ज़ाम लगाता, कभी कहता कि आप लोगों को मेरे खिलाफ भड़का रहे हैं, और कभी उनके अक़ीदे (धार्मिक विचारों) पर सवाल उठाता। यह सब उसकी कमज़ोरी और डर को दिखाता था। लेकिन इन सबके बावजूद इमाम का रुतबा और इज्जत और भी बढ़ती रही।
इमाम की ज़िन्दगी का आख़िरी समय बहुत मुश्किलों से भरा था। बढ़ती उम्र, शरीर की कमज़ोरी और लगातार दबाव—ये सब किसी भी इंसान को तोड़ सकते हैं, लेकिन इमाम ने सब कुछ सब्र और हिम्मत से सहा।
उन्हें बार-बार दरबार में बुलाया जाता, डराया जाता और उनकी हर हरकत पर नज़र रखी जाती थी। कभी-कभी रात के अंधेरे में उनके घर में घुसकर उन्हें जबरदस्ती ले जाया जाता था। उन्हें कपड़े बदलने का भी मौका नहीं दिया जाता था और न ही अपने घर वालों से ठीक से बात करने दिया जाता था।एक अधिक आयु और कमज़ोर इंसान के साथ ऐसा व्यवहार, इंसानियत के लिए एक बहुत बड़ा धब्बा है।
इन ज़ुल्मों में मंसूर के दरबारी, ख़ास तौर पर रबीअ जैसे लोग, सबसे आगे थे। वे चापलूसी और दुनिया की लालच में इतने अंधे हो चुके थे कि उन्हें सही और ग़लत का फर्क ही नहीं रहा। बाहर से वे इमाम के क़रीब होने का दावा करते थे, लेकिन असल में वे ज़ुल्म करने वालों के औज़ार बन चुके थे। वे इमाम को पैदल चलने पर मजबूर करते, खुद सवारी पर रहते, और मंसूर के हर हुक्म को बिना सोचे समझे मानते थे।
लेकिन इन सब ज़ुल्मों के बावजूद, इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की ज़बान से सच की बात कभी बंद नहीं हुई। जब मंसूर ने उनके अपमान करने की कोशिश की, तो इमाम ने बड़े सुकून और इज़्ज़त के साथ जवाब दिया कि वे नबूवत के दरख़्त की शाख़ हैं, विलायत के आसमान का सितारा हैं और हिदायत का रोशन चिराग हैं। ये सिर्फ़ जवाब नहीं था, बल्कि सच्चाई की हमेशा जीत होने का ऐलान था।
इतिहास में कई ऐसे वाक़ये मिलते हैं जब मंसूर ने इमाम को शहीद करने की योजना बनाई, लेकिन हर बार कोई न कोई अजीब घटना उसके रास्ते में आ गई। कभी उसे डर लगने लगता, कभी वह अपने फैसले से पीछे हट जाता। इससे पता चलता है कि इमाम कोई आम इंसान नहीं थे, बल्कि अल्लाह की ख़ास हिफाज़त में थे।
लेकिन आखिर में, जब मंसूर अपने हर काम में नाकाम हुआ तो उसने वही तरीक़ा अपनाया जो कमज़ोर और डरपोक हुक्मरान अपनाते हैं—छुपी हुई साज़िश और ज़हर।
इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को ज़हर दिया गया, और इस तरह एक बहुत बड़े इल्मी और रूहानी चिराग़ को बुझाने की कोशिश की गई। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे चिराग बुझाए नहीं जा सकते, बल्कि और ज़्यादा रोशन हो जाते हैं।
इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम के आख़िरी पल भी पूरी उम्मत के लिए एक सीख थे। बहुत ज़्यादा कमज़ोरी और बीमारी के बावजूद उन्होंने नमाज़ की अहमियत पर ज़ोर दिया और कहा कि जो नमाज़ को हल्का समझेगा, उसे हमारी शफ़ाअत नहीं मिलेगी। इससे साफ़ पता चलता है कि दीन (धर्म) की बुनियाद अमल (कर्म) पर है, सिर्फ़ नाम या खानदान पर नहीं।
इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की शख्सियत का एक और बड़ा पहलू उनका अच्छा अख़लाक़ था। उन्होंने उस रिश्तेदार की भी मदद करने की वसीयत की, जिसने उन पर हमला किया था। यह माफ़ करना, रिश्ते निभाना और बड़ा दिल रखना इंसानियत के लिए एक बेहतरीन मिसाल है।
उनकी शहादत के बाद उनका जनाज़ा एक बड़े इज्तिमा (सभा) में बदल गया, जिसमें हर तरह के लोग शामिल हुए। इससे साबित होता है कि इमाम सिर्फ़ एक समूह के नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के रहनुमा थे।
मंसूर ने ऊपर से दुख जताया, लेकिन यह सिर्फ़ एक राजनीतिक चाल थी। असल में वह उस नूर (रोशनी) को खत्म करना चाहता था, जो उसके सत्ता के लिए खतरा बन गई थी। लेकिन वह यह नहीं समझ सका कि अल्लाह के नेक बंदों की रोशनी लोगों के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहती है और हमेशा राह दिखाती है।
यह घटना हमें हमेशा के लिए एक बड़ी सीख देती है कि सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन सच्चाई हमेशा क़ायम रहती है। ज़ुल्म कुछ समय के लिए जीत सकता है, लेकिन आख़िर में खत्म हो जाता है। जबकि सच्चाई, सब्र और ईमानदारी हमेशा ज़िंदा रहते हैं।
इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की ज़िंदगी और उनकी शहादत हमें यह सिखाती है कि मुश्किल हालात में भी सच्चाई का साथ नहीं छोड़ना चाहिए, अच्छे अख़लाक़ को नहीं भूलना चाहिए और अल्लाह पर भरोसा मजबूत रखना चाहिए।
आज भी अगर हम इस इतिहास को ध्यान से पढ़ें, तो हमें अपनी ज़िंदगी के लिए रास्ता, अपने चरित्र के लिए मापदंड और अपने ईमान के लिए ताक़त मिलती है।
यही वजह है कि यह कहानी सिर्फ़ एक पुरानी घटना नहीं है, बल्कि एक ज़िंदा पैग़ाम है—हर इंसान के लिए, हर दिल के लिए और हर ज़माने के लिए।
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