शुक्रवार 8 मई 2026 - 17:31
इमाम ज़माना (अ) की निगाह में पसंदीदा अमल

एक बुज़ुर्ग को शरफ़-ए-मुलाकात हासिल हुआ, मगर वह जान न सके कि सामने कौन है। इमाम ज़माना (अ) ने खुद उन्हें बताया कि मेरी निगाह में सबसे ज़्यादा पसंदीदा अमल यह है कि अज़ान की पहली आवाज़ पर "अल्लाहुम्मा कुन लिवलिय्यिक..." दुआ पढ़ी जाए। यह वाक़िया आयतुल्लाहिल उज़्मा मुहम्मद तक़ी बहजत (र) के हवाले से नक़ल किया गया है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, बुज़ुर्ग आलिम-ए-दीन आयतुल्लाहिल अब्दुल क़ाइम शूश्तरी (र) ने अपने उस्ताद आयतुल्लाहिल मुहम्मद तक़ी बहजत (र) से एक रूह-परवर वाक़िया नक़ल किया है जो इमाम ज़माना (अ) से मुलाकात के हवाले से बहुत महत्व रखता है।

यह घटना एक ऐसे शख्स के बारे में है जिसे अल्लाह तआला ने अपनी बेपनाह मेहरबानी से अपने महबूब इमाम हज़रत महदी (अ) की ज़ियारत का मौका अता फरमाया। हालाँकि, मुलाकात के दौरान वह शख्स यह नहीं जान सका कि वह किस अज़ीम हस्ती के सामने बैठा है। वह मामूली बातें करता रहा और उसे इल्म न हो सका कि सामने वाला कोई आम शख्स नहीं बल्कि ख़ुदा का हुज्जत और ज़माने का इमाम है।

बयान किया गया है कि इस शख्स ने इमाम (अ) से बातचीत के दौरान बार-बार यह ख्वाहिश ज़ाहिर की कि वह एक ऐसा अमल करना चाहता है जो खास तौर पर इमाम ज़माना (अ) की निगाह में पसंदीदा हो। उसका दिल चाहता था कि वह कोई ऐसी नेकी करे जिसके बारे में उसे यकीन हो कि यह इमाम (अ) के दिल को खुश करेगी।

इमाम ज़माना (अ) ने उसकी इस खुलूस पर मबनी ख्वाहिश को सुनकर खुद ही उसे एक बेहतरीन अमल बता दिया। इरशाद फरमाया: "एक काम जो बहुत ज़्यादा मेरी निगाह में पसंदीदा है वह यह है कि जैसे ही अज़ान की आवाज़ सुनो, फौरन दुआ पढ़ना शुरू कर दो 'अल्लाहुम्मा कुन लिवलिय्यिकल हुज्जति ब्निल हसन सलवातुका अलैहि व अला आबाइहि'..." इस दुआ का मतलब यह है कि ऐ अल्लाह! अपने वली हज़रत हुज्जत बिन अल-हसन (अ) के लिए हर मुश्किल में मददगार, निगहबान, राहनुमा और यार व मददगार बन।

यह दुआ दरअसल इमाम ज़माना (अ) की हिफाजत और उनकी नुसरत के लिए मांगी जाती है और इसका वक़्त भी बहुत खास है, यानी अज़ान के फौरन बाद। यह वह वक़्त होता है जब इंसान अल्लाह की तरफ मुतवज्जिह होता है और दरगाह-ए-इलाही से मांगने का बेहतरीन मौका होता है।

मुलाकात खत्म होने के बाद जब इस शख्स को हकीकत खुली कि वह किस की खिदमत में हाजिर था, तो वह बेहद पशेमान हुआ। उसे देर से एहसास हुआ कि उसने किस दौलत को न पहचानकर ज़ाया कर दिया। लेकिन इतना जरूर है कि इमाम (अ) की दी हुई इस हिदायत को उसने संभालकर रख लिया और बाद में दूसरों तक पहुँचाया।

आयतुल्लाह बहजत (र) जैसी अब्क़रीयत शख्सियत का इस वाक़िये को बयान करना इसकी अहमियत को मज़ीद बढ़ा देता है। उन्होंने अपने शागिर्दों को बार-बार ताकीद की कि अज़ान के वक़्त इस दुआ का एहतेमाम करें, क्योंकि यह इमाम ज़माना (अ) की तरफ से खुद बताई गई इबादत है।

मज़कूरा वाक़िया किताब "हज़रत हुज्जत" के सफ़्हा 336 पर दर्ज है। यह किताब मोतबर ज़राइ से इकट्ठी की गई ऐसी ही रूहानी करामात और हिदायात पर मुश्तमिल है।

आखिर में यह कहना गलत न होगा कि हम में से हर शख्स चाहे उसे इमाम (अ) की ज़ियारत नसीब न भी हो, लेकिन उनकी बताई हुई इस दुआ को पढ़कर उनका कुर्ब हासिल कर सकता है। बस जरूरत है अज़ान की आवाज़ सुनते ही नमाज़ से पहले यह दुआ पढ़ने की पाबंदी करने की। यह एक मामूली सा अमल है, लेकिन इमाम ज़माना (अ) के नजदीक बहुत पसंदीदा है।

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