हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, मुहर्रम के दिनों में अक्सर एक प्रश्न उठता है कि हम 1400 साल बाद भी इमाम हुसैन (अ) और उनके साथियों के लिए क्यों रोते हैं? इस प्रश्न का उत्तर धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन रज़ा पुरइस्माईल ने दिया है।
प्रश्न:
मुहर्रम में शोक मनाने के दौरान एक आम सवाल यह होता है कि सालार-ए-शहीद इमाम हुसैन (अ) और उनके साथियों के लिए, जो 1400 साल पहले एक अत्यंत दुखद घटना में शहीद हुए थे, आज भी शोक और अश्रुपात करने की क्या आवश्यकता है?
क्या हम अपने किसी प्रियजन के निधन पर अधिकतम चालीस दिन या एक वर्ष तक ग़म नहीं मनाते और फिर केवल उन्हें अच्छे शब्दों में याद रखते हैं? तो फिर इमाम हुसैन (अ) के लिए ऐसा क्यों नहीं है?
हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन पुरइस्माईल का उत्तर:
इस प्रश्न की जड़ इस बात में है कि हम कभी-कभी इमाम हुसैन (अ) के ग़म को अपने प्रियजनों के ग़म के समान समझ लेते हैं, जबकि दोनों में कोई समानता नहीं है और वे पूरी तरह अलग प्रकृति के हैं।
इमाम हुसैन (अ) के अज़ादारो के व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों प्रकार के प्रभाव हैं, जो इसे अन्य शोकों से अलग करते हैं:
व्यक्तिगत प्रभाव:
पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव है एक पूर्ण और आदर्श मानव से प्रेम की भावना का प्रबल होना; यानी उस इमाम से प्रेम जो धरती पर अल्लाह के खलीफा का प्रतीक है। आंसू प्रेम का सबसे उच्च प्रतीक हैं। जब हम उनकी पीड़ा पर रोते हैं, तो हम अपने दिल को दिव्य प्रेम की दिशा में ले जाते हैं। यह प्रेम हमें जीवन के अंतिम उद्देश्य यानी ईश्वर की उपासना और बंदगी के और करीब ले जाता है।
दूसरा व्यक्तिगत प्रभाव आत्मिक शांति है। जीवन की कठिनाइयों और मानसिक तनावों का बोझ हमारे अंदर जमा होता रहता है। इमाम हुसैन (अ) की मजलिस एक सुरक्षित स्थान प्रदान करती है जहाँ यह बोझ कम हो जाता है। इसी कारण जो लोग इन सभाओं में भाग लेते हैं और रोते हैं, वे अक्सर बाद में एक विशेष आत्मिक सुकून और खुशी महसूस करते हैं, जो किसी अन्य साधन से तुलना योग्य नहीं होती।
अंत में दुआ की गई है कि अल्लाह हमें इमाम हुसैन (अ) के सच्चे अज़ादारो में शामिल करे।
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