हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन रज़ा मोहम्मदी ने कई वर्षों बाद शहीदों की कब्र की ज़ियारत करने के लाभ के बारे में पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि आलम ए बरज़ख में भी इंसानी रूह की आवश्यकताएँ बनी रहती हैं।
प्रश्न: जो लोग युद्ध के समय शहीद हुए थे, उनकी शहादत को अब लगभग 30 वर्ष या उससे अधिक समय बीत चुका है। आज हम जो उनकी कब्र पर जाते हैं, तो क्या वास्तव में इससे उन्हें कोई लाभ पहुँचता है?
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन रज़ा मोहम्मदी का उत्तर:
निश्चित रूप से लाभ पहुँचता है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति को भोजन दिया जाता था (अर्थात उसके लिए सदक़ा किया जाता था या सवाब पहुँचाया जाता था)। क्या वह 40 वर्ष की आयु के बाद भी भोजन चाहता है? जी हाँ, तब भी चाहता है। क्या 80 वर्ष की आयु के बाद भी भोजन चाहता है? जी हाँ, तब भी चाहता है।
बरज़ख में भी इंसान की स्थिति कुछ ऐसी ही होती है। जब से वे इस दुनिया से गए, तब से उन्हें बरज़खी भोजन (अर्थात बरज़ख की दुनिया के अनुरूप आध्यात्मिक आहार) की आवश्यकता होती है। और 50 वर्ष बाद भी उन्हें उसी प्रकार की आवश्यकता बनी रहती है।
आप, जो उनके परिजन या शुभचिंतक हैं, जो भी नेक कार्य करते हैं, वे बरज़ख में उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप नेमतों में बदल जाते हैं। वह आवश्यकता भोजन की हो या किसी और चीज़ की, वहाँ ये सब बरज़खी नेमतों के रूप में उन्हें प्रदान किए जाते हैं। इससे उनकी आध्यात्मिक उन्नति में सहायता मिलती है, उनकी बरज़खी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है और जो कुछ उन्हें चाहिए, वह उन्हें पहुँचता है।
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