शुक्रवार 19 जून 2026 - 18:16
कर्बला के शुब्हात | इमाम हुसैन (अ) ने कूफ़ियों की दावत क्यों स्वीकार की?

 इमाम हुसैन (अ) कूफ़ियों की स्थिति से अनजान नहीं थे, बल्कि पहले भी उनकी दावत को स्वीकार नहीं किया था। इस बार भी उनका भरोसा कूफ़ा की वफ़ादारी पर नहीं था, बल्कि उनका उद्देश्य “हक़ को स्पष्ट करना” और इस्लाम को जीवित करना था। कूफ़ा उस समय पूरे इस्लामी जगत का प्रभावशाली केंद्र था, इसलिए कर्बला की घटना के माध्यम से यज़ीद के कुफ्र और पैग़म्बर (स) के सच्चे रास्ते को इतिहास के सामने उजागर करना आवश्यक था।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, “शुब्हात-ए-कर्बला” नामक विशेष कार्यक्रम के अंतर्गत, मुहर्रम के पहले दस दिनों में हुज्जतुल-इस्लाम रमज़ान नरग़सी ने इन सवालों के जवाब दिए, जिनमें यह प्रश्न शामिल था: “इमाम हुसैन (अ) ने कूफ़ियों की दावत क्यों स्वीकार की?”

शुब्हा:

अगर कूफ़ा के लोग भरोसेमंद नहीं थे, तो इमाम हुसैन (अ) ने उनकी दावत क्यों स्वीकार की और इराक की ओर क्यों गए?

जवाब:

इमाम हुसैन (अ) केवल कूफ़ियों की बात मानकर नहीं गए थे, बल्कि वे अपने इलाही कार्यक्रम को पूरा करना चाहते थे। उन्हें यह दिखाना था कि इस्लाम की सच्चाई क्या है और अबू सुफ़यान के घराने—ख़ासकर मुआविया और यज़ीद—की धोखाधड़ी और कुफ्र को उजागर करना था।

मुहम्मद हनफ़िया ने इमाम से कहा कि यदि आपको अपनी जान का डर है तो आप यमन चले जाएँ, वहाँ ऊँचे पहाड़ और सुरक्षित ठिकाने हैं जहाँ आप छिपकर सुरक्षित रह सकते हैं और वहीं से संघर्ष कर सकते हैं। लेकिन इमाम ने यह सुझाव स्वीकार नहीं किया।

यद्यपि सभी जानते थे कि कूफ़ी भरोसेमंद नहीं हैं, फिर भी इमाम इराक की ओर बढ़े। दस साल पहले भी, इमाम हसन (अ) की शहादत के बाद, शबथ बिन रबी और हज्जार बिन अबजर जैसे लोगों ने इमाम हुसैन (अ) को पत्र लिखकर कूफ़ा आने और मुआविया से लड़ने की दावत दी थी, लेकिन उस समय इमाम ने उन पत्रों को महत्व नहीं दिया था। जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ये लोग हमें मारकर अपना लाभ चाहते हैं।

कुछ लेखकों के अनुसार, ये पत्र भी वास्तव में मुआविया की एक चाल थे, क्योंकि इन्हें लिखने वाले वही लोग बाद में इमाम के विरोधी बन गए।

इमाम हुसैन (अ) इमाम हसन (अ) की शहादत के बाद कूफ़ा नहीं गए, क्योंकि वे कूफ़ा की सच्चाई जानते थे। लेकिन इस बार स्थिति अलग थी। इमाम ने यह निर्णय लिया कि चाहे कूफ़ा के लोग मदद करें या न करें, वे वहाँ जाएँगे और हक़ को स्पष्ट करेंगे। उनका उद्देश्य केवल कूफ़ा की मदद लेना नहीं था, बल्कि “हज्जत पूरी करना” था। इसी उद्देश्य से उन्होंने मुस्लिम बिन अकील को भेजा।

इमाम का मुख्य उद्देश्य इस्लामी उम्मत को यह संदेश देना था कि पैग़म्बर (स) के बाद साक़ीफ़ा की वजह से इस्लाम का रास्ता बदल गया और धीरे-धीरे वह स्थिति आ गई जहाँ सत्ता ऐसे व्यक्ति के हाथ में चली गई जो इस्लाम की शिक्षाओं पर अमल नहीं करता था—जो खुलेआम शराब पीता, अन्य गुनाह करता और धार्मिक सीमाओं का पालन नहीं करता था।

यहाँ तक कि उसने इमाम हुसैन (अ) का सिर देखकर क़ुरैश के कुफ्र के अशआर पढ़े और उस पर गर्व किया।

इमाम हुसैन (अ) का उद्देश्य यह था कि केंद्र (कूफ़ा) में जाकर इस सच्चाई को उजागर किया जाए, क्योंकि उस समय इस्लामी दुनिया के दो प्रमुख केंद्र थे: कूफ़ा और दमिश्क। कूफ़ा पहले इमाम अली (अ) की राजधानी रह चुका था और राजनीतिक व सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

इमाम हुसैन (अ) इस्लाम के लिए अंतिम अवसर थे, क्योंकि वे पैग़म्बर (स) के अंतिम जीवित नवासे थे। यदि वे भी शहीद हो जाते तो सच्चे इस्लाम का संदेश आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचना कठिन हो जाता।

यज़ीद ने इमाम को अत्यंत क्रूरता से शहीद किया और पैग़म्बर की बेटियों को बंदी बनाया, जिससे दुनिया को यह संदेश गया कि यज़ीद एक अत्याचारी और इस्लाम-विरोधी शासक है।

इमाम हुसैन (अ) का कूफ़ा जाना इसलिए था ताकि यज़ीद के कुफ्र और सच्चे इस्लाम का संदेश पूरी दुनिया तक पहुँच सके। बाद में यज़ीद की सत्ता समाप्त हो गई और बनी उमय्या की सच्चाई उजागर हो गई।

हज़रत ज़ैनब (स) ने शहीदों के शरीर के पास कहा कि यह घटना वास्तव में साक़ीफ़ा की जड़ से जुड़ी है, यानी यह पूरा अन्याय उसी बुनियादी राजनीतिक मोड़ से शुरू हुआ था।

निष्कर्ष यह है कि भले ही कूफ़ी भरोसेमंद नहीं थे, लेकिन इमाम हुसैन (अ) का उद्देश्य केवल उनकी मदद पर निर्भर नहीं था, बल्कि सत्य को स्पष्ट करना और हज्जत पूरी करना था। यदि कूफ़ी उनकी बात मान लेते तो उन्हें दुनिया और आख़िरत की सफलता मिलती, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और स्वयं को वंचित कर लिया।

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha