रविवार 21 जून 2026 - 06:46
कर्बला के शुबहात: क्या इमाम हुसैन (अ) और यज़ीद के बीच सुलह संभव थी?

हुज्जतुल-इस्लाम रमज़ान नर्गेसी इस शुबहा (संदेह) के उत्तर में बताते हैं कि उस समय की राजनीतिक और धार्मिक परिस्थितियों को देखते हुए इमाम हुसैन (अ.) और यज़ीद के बीच किसी प्रकार की सुलह मूलतः संभव ही नहीं थी।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, “कर्बला के शुबहात” शीर्षक से एक विशेष श्रृंखला मुहर्रम के पहले दस दिनों के लिए हौज़ा की आधिकारिक मीडिया द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जिसमें इतिहासकार और शोधकर्ता हुज्जतुल-इस्लाम रमज़ान नर्गेसी ने उपस्थित होकर आशूरा से जुड़े कुछ प्रश्नों के उत्तर दिए। इस श्रृंखला में प्रश्न “क्या इमाम हुसैन (अ) और यज़ीद के बीच सुलह संभव थी?” का उत्तर प्रस्तुत किया गया।

शुबहा:

कुछ लोग यह दावा करते हैं कि सुलह और युद्ध को रोकने की संभावना मौजूद थी। क्या इमाम हुसैन (अ) ने संघर्ष को रोकने के लिए कोई समाधान प्रस्तुत किया था?

हुज्जतुल-इस्लाम रमज़ान नर्गेसी का उत्तर:

क्या इमाम हुसैन (अ) और यज़ीद के बीच सुलह संभव थी?

यदि हम उस वातावरण और परिस्थितियों को समझें जिसमें इमाम हुसैन (अ) मौजूद थे, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐसी किसी सुलह की संभावना नहीं थी। इमाम ने अल्लाह के लिए क़याम किया था, और उनका कर्तव्य उम्मत की इस्लाह, लोगों को जागरूक करना और उन्हें बसीरत प्रदान करना था। वहाँ किसी प्रकार की सुलह संभव नहीं थी।

दुनियावी और बाहरी दृष्टि से देखा जाए तो यह आसान लगता था कि इमाम यज़ीद की बैअत कर लेते और अपनी जान बचा लेते, या यमन की ओर चले जाते। लेकिन इमाम की बैअत का अर्थ होता यज़ीद के सभी कार्यों पर मुहर लगाना और इस्लाम तथा पैग़म्बर (स) की सारी मेहनत को समाप्त कर देना।

कर्बला के शुबहात: क्या इमाम हुसैन (अ) और यज़ीद के बीच सुलह संभव थी?

सुफ़्यानियों ने मक्का की विजय और सैन्य रूप से असमर्थ होने के बाद “सांस्कृतिक और सॉफ्ट युद्ध” की रणनीति अपनाई। अबू सुफ़यान ने उस समय उस्मान के घर में कहा: “क्या यहाँ बनू उमय्या के अलावा कोई और है?” उन्होंने कहा: “नहीं।” उसने कहा: “इस सत्ता को अपने बीच घुमाते रहो और इसे बनी हाशिम (अलवी परिवार) तक पहुँचने न दो।”

योजना यह थी कि जो काम अबू सुफ़यान तलवार से नहीं कर सका, उसे इस्लाम के नाम पर पूरा किया जाए। मग़ीरा से संबंधित एक घटना भी बयान की जाती है, जिसमें उसके बेटे ने कहा कि उसके पिता मुआविया से नाराज़ होकर घर आए। जब पूछा गया तो उन्होंने कहा: “आज मैंने मुआविया से ऐसी बात देखी जिसने मुझे परेशान कर दिया।” उन्होंने मुआविया से कहा कि जब तुम सत्ता में आ गए हो तो अबू तालिब के बच्चों पर इतनी सख्ती क्यों कर रहे हो? मुआविया ने कहा: “अबू बकर का नाम खत्म हो गया, उमर का नाम खत्म हो गया, उस्मान का नाम खत्म हो गया, लेकिन मुहम्मद का नाम रोज़ पाँच बार मीनारों से पुकारा जाता है। जब तक मैं इस नाम को मीनारों से नहीं हटा देता, मुझे चैन नहीं मिलेगा।” मग़ीरा ने कहा: “मुझे पता नहीं था कि मुआविया ईमान नहीं लाया था।”

यज़ीद को अंतिम प्रहार के लिए तैयार किया गया था। मुआविया ने उसे बयाबान (रेगिस्तान) में पाला ताकि वह इस्लामी नैतिकता से परिचित न हो। उसने यज़ीद की सत्ता के लिए पूरा माहौल तैयार किया, यहाँ तक कि अपने नज़दीकी साथियों को भी हटाया ताकि कोई बाधा न रहे।

यज़ीद की हुकूमत दरअसल मुआविया की योजना का हिस्सा थी, और यज़ीद इस्लाम पर अंतिम प्रहार करने आया था। यदि इमाम हुसैन (अ) सुलह कर लेते, तो इसका अर्थ होता यज़ीद की योजना पर मुहर लगाना, और यह इस्लाम के अंत के समान होता।

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