शनिवार 27 जून 2026 - 14:41
अगर इमाम हुसैन (अ) यज़ीद की बैअत कर लेते, तो क्या होता?

 कर्बला की घटना केवल एक ऐतिहासिक त्रासदी नहीं थी, बल्कि इस्लाम की रक्षा तथा सत्य और असत्य के बीच होने वाला एक निर्णायक संघर्ष था। यदि इमाम हुसैन (अ) यज़ीद की बैअत स्वीकार कर लेते, तो उसके परिणामस्वरूप एक ऐसे अत्याचारी, पापाचारी और धर्म के मूल सिद्धांतों को रौंदने वाले शासक को इस्लामी वैधता मिल जाती। ऐसी स्थिति में इस्लाम की वास्तविक शिक्षाएँ धीरे-धीरे विकृत हो जातीं और कुछ ही पीढ़ियों के बाद धर्म केवल नाम मात्र बनकर रह जाता।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, कर्बला की घटना केवल एक ऐतिहासिक त्रासदी नहीं थी, बल्कि इस्लाम की रक्षा तथा सत्य और असत्य के बीच होने वाला एक निर्णायक संघर्ष था। यदि इमाम हुसैन (अ) यज़ीद की बैअत स्वीकार कर लेते, तो उसके परिणामस्वरूप एक ऐसे अत्याचारी, पापाचारी और धर्म के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाले शासक को इस्लामी वैधता प्राप्त हो जाती। ऐसी स्थिति में इस्लाम की वास्तविक शिक्षाएँ धीरे-धीरे विकृत हो जातीं और कुछ पीढ़ियों के बाद धर्म केवल नाम मात्र बनकर रह जाता।

स्वर्गीय अल्लामा मुहम्मद तक़ी मिस्बाह यज़्दी (र) ने इसी सत्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि इमाम हुसैन (अ) के अनुयायी की सोच केवल अपनी व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे पूरे समाज के धर्म की रक्षा की भी चिंता करनी चाहिए। इमाम हुसैन (अ.) के व्यक्तिगत धर्म को कोई खतरा नहीं था; वास्तविक खतरा इस्लाम के सामूहिक अस्तित्व और उसकी निरंतरता को था।

उन्होंने कहा कि यदि इमाम हुसैन (अ) यज़ीद की बैअत कर लेते और शहादत का मार्ग न अपनाते, तो उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए इस्लाम धीरे-धीरे अपनी वास्तविक आत्मा खो देता और अधिक से अधिक एक या दो पीढ़ियों के बाद उसका केवल नाम ही शेष रह जाता।

इसी कारण इमाम हुसैन (अ) ने अपनी जान, अपने अहले-बैत (अ) और अपने वफ़ादार साथियों की कुर्बानी पेश की। यद्यपि इतिहास में बहुत कम ऐसा होता है कि कुछ लोगों का रक्त पूरी उम्मत की तक़दीर बदल दे, लेकिन कर्बला की घटना ऐसी ही दुर्लभ घटनाओं में से एक है। इमाम हुसैन (अ) और उनके निष्ठावान साथियों की कुर्बानी ने उम्मत को ग़फ़लत से जगाया, अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध की चेतना पैदा की और इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं को हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया।

इसीलिए कहा जाता है कि इमाम हुसैन (अ) ने अपनी शहादत के माध्यम से न केवल धर्म की रक्षा की, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सत्य, न्याय, स्वतंत्रता और स्वाभिमान का ऐसा अमर संदेश छोड़ा, जो क़यामत तक जीवित रहेगा।

स्रोत: पुस्तक "जान हा फ़िदाए दीन", पेज 50–51।

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