शुक्रवार 19 जून 2026 - 21:33
जम्मू कशमीर मे कर्बला के छह माह के शहीद हज़रत अली असगर (अ) को ज़बरदस्त श्रद्धांजलि

जम्मू-कश्मीर अंजुमन शरीयत शिया, दारुल-मुस्तफ़ा के तत्वावधान में केंद्रीय इमामबाड़ा बडगाम, प्राचीन इमामबाड़ा हसनाबाद श्रीनगर, इमामबाड़ा यागीपोरा मागाम सहित अंजुमन के अंतर्गत विभिन्न जुमा केंद्रों पर विश्व यौम-ए-अली असगर (अ.) अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया गया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर अंजुमन शरीयत शिया, दारुल-मुस्तफ़ा के तत्वाधान मे विभिन्न स्थानों पर यौम-ए-अली असगर (अ) श्रद्धा के साथ आयोजित किया गया।

इस अवसर पर माताओं ने अपने शिशु और छोटे बच्चों को हज़रत अली असगर (अ) से संबंधित विशेष वस्त्र पहनाकर मजलिस-ए-अज़ा में भाग लिया और अपने बच्चों को इमाम-ए-ज़माना (अ) की मदद और समर्थन के लिए उनकी अमान में सौंपते हुए यह संकल्प व्यक्त किया कि इमाम के ज़हूर के समय उनकी संतान दीन-ए-हक़ की बुलंदी और इमाम-ए-वक़्त (अ) की सहायता में हर संभव भूमिका निभाएगी।

आयोजित मजलिसों में बड़ी संख्या में महिलाओं ने, विशेष रूप से शिशु बच्चों की माताओं ने अपने बच्चों के साथ भाग लिया। इस अवसर पर हौज़ा-ए-इल्मिया मकतब-ए-ज़हरा हसनाबाद श्रीनगर की शिक्षिकाओं और क़ुम से फ़ारिग़-उत-तहसील छात्राओं ने संबोधित करते हुए कर्बला की घटना में महिलाओं और बच्चों की अद्वितीय भूमिका को उजागर किया और हज़रत अली असगर (अ) की दर्दनाक शहादत के पृष्ठभूमि और उसके शाश्वत संदेश पर विस्तार से प्रकाश डाला।

वक्ताओं ने कहा कि हज़रत अली असगर (अ) की शहादत कर्बला की घटना का सबसे दर्दनाक और मानवता को झकझोर देने वाला पहलू है, जिसने ज़ुल्म और अत्याचार की वास्तविकता को दुनिया के सामने उजागर कर दिया। उन्होंने कहा कि इस मासूम शिशु की कुर्बानी आज तक यज़ीदी सोच और कार्यों के लिए एक अटल जवाब और इमाम हुसैन (अ) की मजलूमियत का स्पष्ट प्रमाण बनी हुई है।

शिक्षिकाओं ने अपने संबोधनों में इस बात पर ज़ोर दिया कि हज़रत अली असगर (अ) की शहादत ने यह स्पष्ट कर दिया कि कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन (अ) के सामने मौजूद ताकतें न केवल इस्लामी शिक्षाओं से वंचित थीं बल्कि मूल मानवीय मूल्यों से भी खाली थीं।

कार्यक्रम के अंत में कई महिला वक्ताओ ने हज़रत अली असगर (अ) की दर्दनाक शहादत और अहले-बैत (अ) की महान कुर्बानियों को काव्यात्मक श्रद्धांजलि देते हुए मर्सिया पढ़ा, जिससे मजलिसों में एक गहरी भावनात्मक और आध्यात्मिक वातावरण स्थापित हो गया।

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