शुक्रवार 19 जून 2026 - 05:52
अंतर्राष्ट्रीय अली असगर दिवस क्यों मनाया जाता है? इतिहास, पृष्ठभूमि और कर्बला का संदेश

मुहर्रम के पहले दस दिनों (अशरे-अव्वल) के पहले शुक्रवार को यौमे अली असगर (अ.स.) के रूप में मनाना, कर्बला के सबसे मासूम शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित करने का एक माध्यम है। यह दिन दुनिया को यह संदेश देता है कि अत्याचार सहने वाले की पुकार कभी समाप्त नहीं होती और सत्य के लिए दी गई कुर्बानी इतिहास के पन्नों पर हमेशा जगमगाती रहती है।

लेखक: सय्यद अंजुम रज़ा

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | मुहर्रमुल-हराम का महीना केवल एक ऐतिहासिक घटना की याद नहीं है, बल्कि मानवता, वफ़ादारी, सब्र, त्याग और सत्य की विजय का एक जीवंत संदेश है। कर्बला की घटना के विभिन्न पहलुओं को उजागर करने के लिए मुहर्रम के पहले दस दिनों में अलग-अलग दिवस मनाए जाते हैं। उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण दिन यौमे अली असगर (अ) है, जो विशेष रूप से मुहर्रम के पहले शुक्रवार को मनाया जाता है। यह दिन कर्बला के उस नन्हे शहीद की याद में समर्पित है, जिसने अपनी अल्पायु के बावजूद मानव इतिहास में अत्याचार सहने की पराकाष्ठा और सत्य की सबसे बड़ी गवाही प्रस्तुत की।

हज़रत अली असगर (अ) कौन थे?

हज़रत अली असगर (अ) इमाम हुसैन (अ) के कम उम्र के पुत्र थे। ऐतिहासिक रिवायतों के अनुसार उनका नाम अब्दुल्लाह भी बताया गया है, जबकि अली असगर उनका प्रसिद्ध उपनाम है। उनकी माता का नाम हज़रत रबाब (स) था।

कर्बला के मैदान में जब इमाम हुसैन (अ) के सभी साथियों और अहले-बैत के अनेक सदस्य शहीद हो चुके थे, तब इमाम हुसैन (अ) अपने दूध पीते शिशु को मैदान में लेकर आए। आपने यज़ीदी सेना से कहा कि यदि तुम लोगों का मुझसे कोई विवाद है, तो इस बच्चे का क्या दोष है? इसे पानी दे दो। लेकिन अत्याचार की पराकाष्ठा यह हुई कि उस मासूम बच्चे को भी तीर का निशाना बनाया गया और वह शहीद हो गया।

वैश्विक यौमे अली असगर (अ) क्यों मनाया जाता है? इतिहास, पृष्ठभूमि और कर्बला का संदेश

हज़रत अली असगर (अ) की शहादत ने कर्बला के संदेश को पूरी मानवता के सामने और अधिक स्पष्ट कर दिया कि अत्याचार न उम्र देखता है, न लिंग और न ही शक्ति; जबकि सत्य के लिए दी गई कुर्बानी हर स्तर पर महान होती है।

यौमे अली असगर (अ) पहले शुक्रवार को ही क्यों मनाया जाता है?

मुहर्रम के पहले दस दिनों के पहले शुक्रवार को यौमे अली असगर (अ) मनाने का मुख्य कारण यह है कि शुक्रवार इस्लामी परंपराओं में महानता, सामूहिकता और दुआ का दिन माना जाता है। इस दिन दुनिया भर के इमाम हुसैन (अ) के अज़ादार हज़रत अली असगर (अ) की अत्यंत दर्दनाक शहादत को याद करते हुए कर्बला के इस पहलू को उजागर करते हैं कि इमाम हुसैन (अ) की कुर्बानी केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं थी, बल्कि आपने अपने नन्हे बच्चे सहित अपने सभी प्रियजनों को अल्लाह की राह में कुर्बान किया।

इस दिन का उद्देश्य कर्बला के इस दूधमुंहे शहीद के माध्यम से दुनिया को यह संदेश देना है कि—

• अत्याचार सहने वाले की आवाज़ हमेशा जीवित रहती है।

• अत्याचार के मुकाबले में सत्य का साथ देना आवश्यक है।

• बच्चों की गरिमा और मानवाधिकारों की रक्षा हर समाज की जिम्मेदारी है।

यौमे अली असगर (अ) की शुरुआत कब और कहाँ हुई?

यौमे अली असगर (अ) का वर्तमान वैश्विक स्वरूप एक संगठित आंदोलन के रूप में बीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में सामने आया। इसकी शुरुआत ईरान में हुई, जहाँ मुहर्रम की मजलिसों में हज़रत अली असगर (अ) की याद को विशेष रूप से प्रस्तुत किया जाने लगा।

इसके बाद "आलमी शीरख़्वारगाने हुसैनी (अ)" के नाम से एक संगठित कार्यक्रम शुरू हुआ, जिसके अंतर्गत दुनिया के विभिन्न देशों में मुहर्रम के पहले शुक्रवार को माताओं और बच्चों की सहभागिता के साथ हज़रत अली असगर (अ) की याद में सभाएँ आयोजित की जाने लगीं।

वैश्विक यौमे अली असगर (अ) क्यों मनाया जाता है? इतिहास, पृष्ठभूमि और कर्बला का संदेश

इस आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय विशेष रूप से ईरान के धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों से जुड़े आयोजकों को जाता है, जिन्होंने हज़रत अली असगर (अ) की मज़लूमियत को वैश्विक स्तर पर उजागर करने के लिए इस दिन को संगठित रूप दिया। समय के साथ यह कार्यक्रम इराक, पाकिस्तान, भारत, लेबनान, यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों तक फैल गया।

यौमे अली असगर (अ) के आयोजनों में क्या होता है?

यौमे अली असगर (अ के अवसर पर दुनिया भर में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें—

  1. मजलिसे अज़ा

उलेमा और ज़ाकिरीन हज़रत अली असगर (अ) के जीवन, शहादत और कर्बला की इस घटना के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। इन मजलिसों में इमाम हुसैन (अ) के सत्य, न्याय और स्वतंत्रता के संदेश को प्रस्तुत किया जाता है।

  1. दूधमुंहे बच्चों की सहभागिता

माताएँ अपने शिशुओं को हुसैनी परिधान पहनाकर या विशेष रूप से सजाकर कार्यक्रमों में शामिल करती हैं, ताकि हज़रत अली असगर (अ) की याद ताज़ा हो और बच्चों के पालन-पोषण में अहले-बैत (अ) से प्रेम की भावना को बढ़ावा मिले।

  1. लोरियाँ और मर्सिये

हज़रत अली असगर (अ) की मज़लूमियत पर नौहे, मर्सिये और सलाम पढ़े जाते हैं, जिनके माध्यम से कर्बला की इस दर्दनाक घटना को याद किया जाता है।

  1. सबील और नज़्र-नियाज़ का आयोजन

कुछ स्थानों पर पानी की सबीलें लगाई जाती हैं, ताकि कर्बला में हज़रत अली असगर (अ) और अन्य अहले-बैत (अ) की प्यास की याद ताज़ा रहे।

  1. दुआ और संकल्प

प्रतिभागी अत्याचार सहने वालों का समर्थन करने, बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और हुसैनी मूल्यों पर दृढ़ रहने का संकल्प लेते हैं।

यौमे अली असगर (अ) का संदेश

हज़रत अली असगर (अ) की याद हमें यह शिक्षा देती है कि सत्य की पहचान उम्र, शक्ति या संख्या से नहीं होती। एक छह महीने के बच्चे की कुर्बानी ने दुनिया को दिखा दिया कि अत्याचार के सामने चुप रह जाना इतिहास नहीं बनाता, बल्कि सत्य के लिए दी गई कुर्बानी हमेशा अमर रहती है।

वैश्विक यौमे अली असगर (अ) क्यों मनाया जाता है? इतिहास, पृष्ठभूमि और कर्बला का संदेश

यौमे अली असगर (अ) केवल ग़म का दिन नहीं है, बल्कि मानवता को जागृत करने का संदेश भी है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि कर्बला में इमाम हुसैन (अ) ने अपने परिवार सहित जो महान कुर्बानी दी, उसका उद्देश्य धर्म, न्याय, स्वतंत्रता और मानवीय मूल्यों की रक्षा करना था।

समापन

मुहर्रम के पहले दस दिनों के पहले शुक्रवार को यौमे अली असगर (अ) के रूप में मनाना, कर्बला के सबसे मासूम शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित करने का एक माध्यम है। यह दिन दुनिया को यह संदेश देता है कि अत्याचार सहने वाले की पुकार कभी समाप्त नहीं होती और सत्य के लिए दी गई कुर्बानी इतिहास के पन्नों पर हमेशा प्रकाशमान रहती है।

हज़रत अली असगर (अ) की कुर्बानी कर्बला की वह पुकार है जो हर युग के इंसान को अत्याचार के मुकाबले में मानवता, न्याय और सत्य का मार्ग अपनाने का निमंत्रण देती है।

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha