बुधवार 24 जून 2026 - 12:35
कर्बला की घटना क़ुरआन की तालीमात की अमली तफ़्सीर हैः मौलाना सय्यद रज़ी हैदर फंदेड़वी

हौज़ा / मौलाना सय्यद रज़ी हैदर फंदेड़वी ने मजलिस खिताब करते हुए फरमाया,हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपनी अज़ीम कुर्बानी के ज़रिये इंसान को यह संदेश दिया कि समाज में ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी, अख़लाक़ी गिरावट और दीनी बे-हिस्सी के सामने ख़ामोशी इख़्तियार नहीं की जा सकती।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,लडवा, ज़िला मुज़फ्फरनगर में मोहर्रमुल हराम 1448 हिजरी की मजलिस-ए-अज़ा के सिलसिले में आयोजित एक रूहानी मजलिस को ख़िताब करते हुए मौलाना सैय्यद रज़ी हैदर फंदेड़वी ने “इस्लाह-ए-मुआशरा और इमाम हुसैन (अ) की शहादत के असबाब” के विषय पर बेहद जामे, इल्मी और असरदार तक़रीर की। उनके ख़िताब को अलग-अलग मसालिक और तबक़ों से जुड़े लोगों ने बड़ी तवज्जो और अकीदत के साथ सुना।

मौलाना ने अपने बयान में वाज़ेह किया कि वाक़ेआ-ए-कर्बला सिर्फ़ एक तारीखी हादसा नहीं, बल्कि इंसानियत, अख़लाक़, इंसाफ़, आज़ादी और इस्लाह-ए-उम्मत का एक हमेशा ज़िंदा पैग़ाम है।

इमाम हुसैन (अ) ने अपनी अज़ीम कुर्बानी के ज़रिये इंसान को यह संदेश दिया कि समाज में ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी, अख़लाक़ी गिरावट और दीनी बे-हिस्सी के सामने ख़ामोशी इख़्तियार नहीं की जा सकती।

उन्होंने कहा कि रसूल-ए-अकरम (स) बेहतरीन अख़लाक़ के मुकम्मल नमूना थे और इमाम हुसैन (अ) ने उन्हीं अख़लाक़-ए-मोहम्मदी को अपने किरदार, गुफ़्तार और अमल के ज़रिये ज़िंदा रखा। सच्चाई, अमानतदारी, माफ़ी, इंसान-दोस्ती, इंसाफ़ और रहमदिली वे ख़ूबियाँ हैं जिन्हें रसूल-ए-ख़ुदा ने समाज में फैलाया और इमाम हुसैन (अ) ने मैदान-ए-कर्बला में इन क़द्रों की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर दी।

मौलाना सय्यद रज़ी हैदर फंदेड़वी ने क़ुरआन मजीद की तालीमात की रोशनी में बयान किया कि दीन-ए-इस्लाम इंसानी ज़िंदगी के हर शोबे में रहनुमाई करता है। क़ुरआन इंसान को अच्छे अख़लाक़, इंसाफ़, आपसी एहतराम, समाजी ज़िम्मेदारी और पाकीज़ा ज़िंदगी की तालीम देता है, जबकि वाक़ेआ-ए-कर्बला इन्हीं क़ुरआनी तालीमात की अमली तफ़्सीर है।

उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि इमाम हुसैन (अ) की शहादत के असबाब में समाजी बे-हिस्सी, हक़ से दूरी, ज़ुल्म के सामने ख़ामोशी, अख़लाक़ी पतन और दीनी क़द्रों की कमज़ोरी अहम थीं। अगर आज का इंसान कर्बला के पैग़ाम को समझ ले, तो समाज से नफ़रत, भ्रष्टाचार, नाइंसाफ़ी और अख़लाक़ी बुराइयों का ख़ात्मा संभव है।

मौलाना ने कहा कि मोहर्रम का मक़सद सिर्फ़ ग़म और मातम का इज़हार नहीं, बल्कि अपने किरदार, अख़लाक़ और समाजी रवैयों का मुहासिबा भी है। इमाम हुसैन (अ) की याद इंसान को बुराइयों से बचने, अच्छाइयों को फैलाने, अमन और मोहब्बत को क़ायम करने तथा एक अच्छे और सभ्य समाज के निर्माण का सबक़ देती है।

ख़िताब के आख़िर में उन्होंने ख़ास तौर पर नौजवान नस्ल को क़ुरआन और अहलेबैत (अ) की तालीमात से जुड़े रहने, अख़लाक़-ए-मोहम्मदी को अपनाने और समाज में मोहब्बत, भाईचारा, सहिष्णुता और इंसानी क़द्रों को बढ़ावा देने के लिए अपना किरदार अदा करने की नसीहत की।

वाक़ेआ-ए-कर्बला क़ुरआनी तालीमात की अमली तफ़्सीर है।मौलाना सैयद रज़ी हैदर फंदेड़वी

हाज़िरीन ने इस इल्मी, फ़िक्री और रूहानी ख़िताब को मौजूदा समाजी हालात में बेहद अहम और असरदार क़रार दिया।

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha