हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, यह विचार शहीद मुताहरी की एक रचना से लिया गया है, जिसमें उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर दिया है कि इमाम हुसैन (अ) के साथियों का चयन क्यों एक जागरूक चुनाव था।
इमाम हुसैन (अ) ने आशूरा की रात अपने साथियों से कहा कि दुश्मन का सामना केवल मुझसे है, मेरे परिवार के लोग किसी को नहीं जानते, जो भी चाहे वह मेरे परिवार के किसी सदस्य के साथ सुरक्षित निकल सकता है। मैं अकेला रह जाऊँगा।
जो नेता लोगों की नाराज़गी और असंतोष का फायदा उठाना चाहता है, वह इस तरह की बात नहीं करता; वह हमेशा “धार्मिक कर्तव्य” की बात करता है। बेशक, धार्मिक कर्तव्य भी था और इमाम हुसैन (अ) ने इसे बताने में कोई कमी नहीं छोड़ी, लेकिन वे चाहते थे कि उस कर्तव्य को पूरी आज़ादी और पूरी समझ के साथ निभाया जाए। वे यह बताना चाहते थे कि दुश्मन ने तुम्हें घेरकर मजबूर नहीं किया है। अगर तुम रात के अंधेरे का फायदा उठाकर चले जाना चाहो, तो कोई तुम्हें नहीं रोकेगा और न ही कोई परेशानी होगी। न दोस्त तुम्हें मजबूर करता है और न दुश्मन। अगर तुम्हें लगता है कि बैअत तुम्हारे लिए एक बंधन या मजबूरी बन गई है, तो मैंने वह बैअत भी हटा दी है। अब केवल चुनाव और आज़ादी है। तुम्हें पूरी समझ, पूरी स्वतंत्रता और बिना किसी भी तरह के दबाव के मुझे चुनना है—न दुश्मन की तरफ से और न दोस्त की तरफ से।
इसी बात से कर्बला के शहीदों का महत्व बढ़ जाता है। तारिक़ बिन ज़ियाद स्पेन की जंग के दौरान, जब उसने स्पेन को जीत लिया और अपनी नौकाओं को उस जलडमरूमध्य से पार कराया, तो उसने आदेश दिया कि केवल 24 घंटे के लिए ही भोजन रखा जाए और बाकी सभी सामान जला दिया जाए, और यहाँ तक कि जहाज़ों को भी आग लगा दी जाए। इसके बाद उसने अपने सैनिकों और अफसरों को इकट्ठा किया और उस विशाल समुद्र की ओर इशारा करते हुए कहा: “हे लोगों! तुम्हारे सामने दुश्मन है और तुम्हारे पीछे समुद्र है। अगर तुम भागना चाहो तो डूबने के सिवा कोई रास्ता नहीं है। अब कोई जहाज़ नहीं बचा है। तुम्हारे पास केवल 24 घंटे का भोजन है, उसके बाद तुम मर जाओगे। तुम्हारा खाना भी दुश्मन के कब्जे में है। अब तुम्हारे पास कोई रास्ता नहीं है।”इस तरह उसने उनके लिए मजबूरी की स्थिति पैदा कर दी। ऐसे में अगर यह सैनिक आख़िरी सांस तक न लड़े, तो और क्या करे?
लेकिन इमाम हुसैन (अ) ने अपने साथियों के साथ तारिक़ बिन ज़ियाद के तरीके के विपरीत व्यवहार किया। उन्होंने यह नहीं कहा कि दुश्मन सामने है, इस तरफ जाओगे तो मारे जाओगे और उस तरफ जाओगे तो भी खत्म हो जाओगे। इसलिए अब कोई रास्ता नहीं बचा है, बस जो कुछ है उसे किसी तरह स्वीकार कर लो। उन्होंने यह नहीं कहा कि तुम तो वैसे भी मारे ही जाओगे, तो आओ मेरे साथ मारे जाओ।
इस तरह की शहादत का कोई वास्तविक मूल्य नहीं रह जाता। एक राजनीतिक नेता इस तरह की रणनीति अपनाता है। लेकिन इमाम ने कहा कि न तो दोस्त तुम्हें मजबूर करता है और न ही दुश्मन; तुम जिसे चाहो उसे चुनो, पूरी आज़ादी के साथ। इसलिए इमाम हुसैन (अ) की क्रांति मूल रूप से एक जागरूक और सोच-समझकर किया गया आंदोलन है।
स्रोत: शहीद आयतुल्लाह मुर्तज़ा मुताहरी, हेमासा-ए-हुसैनी, भाग 1, पेज 125-126।
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