रविवार 5 जुलाई 2026 - 14:02
क्रांति के शहीद नेता के विचार: मुस्लिम उम्मत के लिए एक रौशन पैग़ाम

हौज़ा / रहबर-ए-इंक़ेलाब-ए-इस्लामी के अफ़कार पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए बसीरत, वहदत, ख़ुद्दारी, इल्मी बेदारी और अमली जद्दोजहद का एक रौशन पैग़ाम हैं। आपने हमेशा इस्लामी इक्तिदार, इल्मी तरक़्क़ी, ज़ुल्म व इस्तिकबार के ख़िलाफ़ मुज़ाहमत, नौजवानों की फ़िक्री व अख़्लाक़ी तरबियत, और इस्लामी मुआशरे में अद्ल व मअनवियत के फ़रोग़ पर ज़ोर दिया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,इस्लामी इंक़िलाब के रहबर के विचार पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए बसीरत, वहदत, ख़ुददारी, इल्मी बेदारी और अमली जद्दोजहद का रौशन पैग़ाम हैं। आपने हमेशा इस्लामी इक़्तिदार, इल्मी तरक़्क़ी, जुल्म व इस्तिकबार के ख़िलाफ़ मुज़ाहिमत, नौजवानों की फ़िक्री व अख़लाक़ी तर्बियत, और इस्लामी मुआशरे में अदल व मा'नवियत के फ़रोग़ पर ज़ोर दिया।

आपके नज़दीक हक़ीक़ी कामयाबी क़ुरआन-ए-करीम और अहल-ए-बैत अ.स. की तालीमात से तमस्सुक, इस्तिक़ामत और ख़ुदएतमादी में मज़मूर है।

मेरी नज़र में रहबर-ए-इंक़िलाब सिर्फ़ एक दीनी तालिब-ए-इल्म, आयतुल्लाह या मुज्तहिद नहीं थे, बल्कि वह इल्म, अमल, बसीरत और जद्दोजहद का ऐसा रवाँ दरिया थे जो शब-ओ-रोज़ उम्मत की फ़िक्री व रूहानी आबियारी के लिए जारी रहा। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस्लाम, इंसानियत और मज़लूमों की ख़िदमत में वक़्फ़ कर दी। अगरचे दुनिया ने उनके अफ़कार से पूरी तरह इस्तिफ़ादा नहीं किया, लेकिन उनकी फ़िक्र आज भी अहल-ए-हक़ के लिए मशअल ए राह है।

रहबर-ए-इंक़िलाब हमेशा नौजवानों को इल्म, मुतालअ और मीडिया की अहमियत से आगाह करते रहे। आपकी नसीहत थी कि नौजवान मुतालअ की आदत अपनाएँ, गहराई और बारीकबीनी से मसाइल का तज्ज़िया करें, और जदीद ज़राए-ए-एबलाग़ में मुआस्सिर किरदार अदा करें ताकि इस्लामी फ़िक्र और हक़ का पैग़ाम दुनिया तक पहुँचाया जा सके।

ख़ुद आप भी बेशुमार सियासी, समाजी और इंतिज़ामी मसरूफ़ियात के बावजूद मुसलसल मुतालअ करते थे। दीनी उलूम के साथ-साथ तारीख़, अदब, नाविल और दीगर इल्मी मज़ामीन का भी निहायत ग़ौर-ओ-फ़िक्र से मुतालअ फ़रमाते थे।

रहबर-ए-इंक़िलाब की इल्मी वुसअत, फ़िक्री गहराई और ग़ैर-मामूली बसीरत ने उन्हें आलम-ए-इस्लाम की एक मुमताज़ शख़्सियत बना दिया। उनकी तक़रीरें, तहरीरें और अमली ज़िंदगी इस बात का वाज़ेह सुबूत हैं कि किसी भी क़ौम की हक़ीक़ी ताक़त इल्म, ख़ुदएतमादी, इस्तिक़ामत और मज़बूत नज़रियाती बुनियादों में पोशीदा होती है, न कि सिर्फ़ मादी वसाइल में।

रहबर-ए-इंक़िलाब की पूरी ज़िंदगी हमें यह सबक़ देती है कि इल्म हासिल करना, मुसलसल मुतालअ करना, अहल-ए-इल्म से इस्तिफ़ादा करना, ज़माने के तक़ाज़ों को समझना और मीडिया के मैदान में मुआस्सिर किरदार अदा करना हमारी अहम ज़िम्मेदारी है। जब नौजवान इल्म, बसीरत और इख़्लास से आरास्ता होंगे तो वह हर दौर के जुल्म, इस्तिकबार और नाइंसाफ़ी के मुक़ाबले में हक़ व अदालत का परचम बुलंद करने के क़ाबिल होंगे।

आज ज़रूरत इस अम्र की है कि हम रहबर-ए-इंक़िलाब के अफ़कार को सिर्फ़ ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करने तक महदूद न रखें, बल्कि उन्हें अपनी इन्फ़िरादी और इज्तिमाई ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ। यही उनके लिए बेहतरीन ख़िराज-ए-तहसीन और उम्मत-ए-मुस्लिमा के रौशन मुस्तक़बिल की ज़मानत है।

लेखक : गुलफ़ाम हुसैन, जामिअतुल मुस्तफ़ा,

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