हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हौज़ा ए इल्मिया के प्रमुख आयतुल्लाह अली रज़ा आराफी ने कहां,आलम ए इस्लाम के ख़िलाफ़ चल रही मुनज़्ज़म फ़िक्री और तहज़ीबी यलग़ार अब एक नए मरहले में दाख़िल हो चुका है। अहल-ए-इल्म ने तवज्जो दिलाई है कि इस सूरत-ए-हाल में सिर्फ़ दिफ़ाई इक़दामात काफी नहीं होंगे, बल्कि इल्मी और तब्लीगी मैदान में मज़बूत और जारिहाना हिकमत-ए-अमली अपनाना भी वक़्त की अहम ज़रूरत है।
उन्होंने कहा कि आज मुसलमान एक हमह-जहती फ़िक्री और तहज़ीबी मुकाबले का सामना कर रहे हैं। सिर्फ़ दिफ़ाई पोज़ीशन काफी नहीं, बल्कि क़ुरआन व सुन्नत की बुनियाद पर मज़बूत और असरदार फ़िक्री लाएहा-ए-अमल ज़रूरी है।

उन्होंने एलान किया कि माह ए रमज़ान में पचास हज़ार से ज़्यादा मुबल्लिग़ीन को पूरे मुल्क में रवाना किया जाएगा, और बैनुल-अक़वामी सतह पर भी तब्लीगी सरगर्मियों को वुसअत दी जा रही है।
फैज़ीया मदरसे, क़ुम में उस्तादों, मुबल्लिग़ीन और तलबा से ख़िताब करते हुए आयतुल्लाह अराफ़ी ने कहा कि पिछले सालों में इस्लाम, दीनी क़द्रों और इंक़िलाब-ए-इस्लामी के ख़िलाफ़ मुनज़्ज़म मुहिम तेज़ हुई है। सोशल मीडिया और फ़िक्री यलग़ार के ज़रिए नौजवान नस्ल को निशाना बनाया जा रहा है, जिसका असर सिर्फ़ ईरान तक महदूद नहीं बल्कि पूरा आलम-ए-इस्लाम महसूस कर रहा है।
उन्होंने ज़ोर दिया कि हौज़ा और उलमा को मैदान में उतरकर किरदार अदा करना होगा, चाहे एक ही शख़्स की हिदायत क्यों न हो। उनके मुताबिक आज की जंग सख़्त तहज़ीबी जंग है, जिसमें मग़रिबी मादी साक़ाफ़त इस्लामी अफ़कार पर हमला-आवर है। इसलिए मुबल्लिग़ को इल्म, बसीरत, अख़लाक़, इख़लास और दुश्मन की फ़िक्री बुनियादों की गहरी पहचान से लैस होना चाहिए।
आयतुल्लाह अराफ़ी ने कहा कि फ़िक़्ह, कलाम, तफ़्सीर और मुस्तनद इल्मी मसादिर से मज़बूत राब्ता के बग़ैर असरदार तब्लीग़ मुमकिन नहीं। उन्होंने “तरह अमीन” और “तरह हिजरत” जैसे मुख़्तलिफ़ तब्लीगी मंसूबों की तौसीअ का ज़िक्र करते हुए बताया कि स्कूलों और महरूम इलाक़ों में मुबल्लिग़ीन की तादाद में काफ़ी इज़ाफ़ा हुआ है।

प्रमुख हौज़ा ए इल्मिया ने बेनुल-अक़वामी तब्लीग़ को बेहद अहम क़रार देते हुए कहा कि आज हौज़ा का मुख़ातिब आठ अरब इंसान हैं। आलम-ए-इस्लाम को मुश्तरका फ़िक्री चैलेंज का सामना है, इसलिए आलमी सतह पर मुनज़्ज़म और असरदार हिकमत-ए-अमली अपनाना लाज़िमी है।
उन्होंने कहा कि हौज़ा दीनी व साक़ाफ़ती इदारों के लिए माहिर अफ़राद की तरबियत की ज़िम्मेदारी भी क़बूल करता है।
आख़िर में उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में मस्जिद को मरकज़ बनाकर दीनी बेदारी को फ़रोग़ देना और नौजवान नस्ल की फ़िक्री हिफ़ाज़त करना हम सब की मुश्तरका ज़िम्मेदारी है। उलमा हर मुश्किल के बावजूद दीन-ए-ख़ुदा की ख़िदमत के लिए साबित-क़दम हैं।
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