गुरुवार 9 जुलाई 2026 - 14:25
शहीद सुप्रीम लीडर का जनाज़ा मशहद-ए-मुक़द्दस पहुँच गया, शहर-ए-इमाम रज़ा (अ) ऐतिहासिक शव यात्रा के लिए तैयार

तेहरान, क़ुम, नजफ़-ए-अशरफ़ और कर्बला-ए-मौअल्ला में लाखों इंक़लाब-दीवानों की ऐतिहासिक और पुरशकोह तशयी के बाद शहीद रहबर का जिस्म-ए-ख़ाकी मशहद-ए-मुक़द्दस पहुँच गया, जहाँ उनकी आख़िरी आरामगाह के लिए तैयारियाँ मुकम्मल हैं और पूरा शहर ग़म और अंदोह की फ़िज़ा में डूबा हुआ है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, तेहरान, क़ुम, नजफ़-ए-अशरफ़ और कर्बला-ए-मुअल्ला में लाखों इंक़लाब-दीवानों की ऐतिहासिक और पुरशकोह तशयी के बाद शहीद रहबर का जिस्म-ए-ख़ाकी मशहद-ए-मुक़द्दस पहुँच गया, जहाँ उनकी आख़िरी आरामगाह के लिए तैयारियाँ मुकम्मल हैं और पूरा शहर ग़म और अंदोह की फ़िज़ा में डूबा हुआ है।

मशहद-ए-मुक़द्दस में आज शहर की फ़िज़ा सोगवार है, सड़कें और गलियाँ सियाह परचमों से आरास्ता हैं और लाखों अफ़राद अपने महबूब रहबर को आख़िरी बार ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करने के लिए जमा हैं।

मशहद इस अज़ीम क़ाएद को विदा कहने के लिए खड़ा है जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी मज़लूमों, महरूमों और मुस्तज़अफ़ीन की हिमायत में गुज़ारी, ज़ुल्म, इस्तिकबार और सामराज के ख़िलाफ़ हमेशा बुलंद आवाज़ उठाई और किसी भी दबाव या धमकी के सामने सर-ए-तस्लीम ख़म नहीं किया। वह दुनिया भर के मज़लूमों के लिए उम्मीद, हौसले और इस्तिक़ामत की अलामत थे।

मशहद अपने मुजाहिद और शहीद फ़रज़ंद का इस्तिक़बाल इस एहसास के साथ कर रहा है कि उसने तारीख़-ए-मुआसिर की एक अज़ीमतरीन शख़्सियत को खो दिया है, लेकिन उसके अफ़कार, जद्दोजहद और मुज़ाबत का रास्ता हमेशा ज़िंदा रहेगा। अवाम इस रहबर को ख़िराज-ए-तहसीन पेश कर रहे हैं जिसने इज़्ज़त, इस्तिक़लाल और इस्लामी अक़दार पर कभी समझौता नहीं किया और उसी राह में जाम-ए-शहादत नूश किया।

सोगवार अवाम का कहना है कि शहीद रहबर ने अपने जद-ए-अमजद हज़रत इमाम हुसैन (अ.) की सीरत पर अमल करते हुए ज़ुल्म के सामने झुकने से इनकार किया और अपने किरदार से "हैहात मिन्ना ज़िल्ला" के पैग़ाम को नई ज़िंदगी बख्शी। उनकी इस्तिक़ामत आने वाली नस्लों के लिए मशाल-ए-राह रहेगी।

मशहद-ए-मुक़द्दस आज इस अज़्म का भी इज़्हार कर रहा है कि शहीद रहबर के बुलंद मक़ासिद, इस्लामी इंक़लाब के उसूलों और मज़लूमों की हिमायत के मिशन को पूरी क़ुव्वत के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। उनकी तशयी और तद्फ़ीन का यह मरहला ईरान की मुआसिर तारीख़ में वफ़ादारी, क़दरदानी और क़ौमी वहदत की एक यादगार मिसाल के तौर पर याद किया जाएगा।

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