शनिवार 25 जुलाई 2026 - 06:03
शहीद रहबर-ए-इंक़िलाब र.ह.का व्यावहारिक और सादगी एक आदर्श हैं।हुज्जतुल इस्लाम अमीर रज़ा मेंहदवी

हौज़ा / हुज्जतुल इस्लाम अमीर रज़ा मेंहदवी ने कहा कि शहीद रहबर-ए-इंक़िलाब (रह.) का जीवन सादगी, अथक परिश्रम और त्याग का ऐसा आदर्श था, जो आज भी समाज और शासकों के लिए मार्गदर्शक है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम अमीर रज़ा मेंहदवी ने कहा कि शहीद रहबर-ए-इंक़िलाब (रह.) का जीवन सादगी, अथक परिश्रम और त्याग का ऐसा आदर्श था, जो आज भी समाज और शासकों के लिए मार्गदर्शक है।

उन्होंने कहा कि शहीद रहबर का शहीद होना उनके जीवनभर के निष्कपट संघर्ष और सेवा का प्रतिफल था। उनका पूरा जीवन समाज के लिए शिक्षा और प्रेरणा का स्रोत है।

मेंहदवी ने बताया कि शहीद रहबर सुबह पाँच बजे से देर रात तक लगातार काम करते थे। उनका मानना था कि देश की सेवा में "सेवानिवृत्ति" जैसी कोई अवधारणा नहीं होती और इंसान को अंतिम सांस तक अपने दायित्व निभाने चाहिए। यदि देश के सभी अधिकारी उनकी मेहनत और कार्यशैली को अपनाएं, तो हर क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति संभव है।

उन्होंने कहा कि सर्वोच्च पद पर होने के बावजूद शहीद रहबर का निजी जीवन एक सामान्य नागरिक से भी अधिक सादा था। वे हमेशा सादगी अपनाने की शिक्षा देते थे। विवाह जैसे अवसरों पर भी वे दूल्हा-दुल्हन और उनके परिवारों को फिजूलखर्ची और अनावश्यक दिखावे से बचने की नसीहत करते थे।

मेंहदवी ने हुज्जतुल इस्लाम अहमद मरवी के हवाले से एक घटना सुनाई कि एक इफ्तार में शहीद रहबर के सामने केवल रोटी, पनीर और हलवा था, जबकि उनके कार्यालय के कर्मचारियों के लिए इससे कहीं अधिक अच्छा और पौष्टिक भोजन तैयार किया गया था। यही सादगी सहरी के भोजन में भी दिखाई देती थी, जहाँ वे बहुत कम भोजन से ही संतुष्ट हो जाते थे।

उन्होंने कहा कि शहीद रहबर का जीवन पूर्णतः ज़ाहिदाना था। क्रांति से पहले मशहद में उनका जैसा जीवन था, वही सादगी उन्होंने सर्वोच्च नेतृत्व के पद पर भी बनाए रखी। उन्होंने कभी भी सार्वजनिक धन का निजी उपयोग नहीं किया और यही सादगी उनके परिवार और संतानों के जीवन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी।

अंत में मेंहदवी ने कहा कि ग़ैबत के दौर में शिया उलमा की परंपरा हमेशा मेहनत, त्याग और जनता के साथ रहने की रही है। शहीद रहबर-ए-इंक़िलाब (रह.) ने अपने व्यवहार से सिद्ध किया कि सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति का जीवन भी अत्यंत सादा होना चाहिए, ताकि वह जनता के दुख-दर्द को समझ सके और उन्हें सत्य का मार्ग दिखा सके।

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