शुक्रवार 18 सितंबर 2026 - 18:19
माता-पिता का बुढ़ापा औलाद के लिए बोझ नहीं, परीक्षा है: मौलाना सय्यद यासीन हुसैन आबिदी

मस्जिद इमाम अली (अ.) कानौदर, गुजरात में नमाज़े जुमा के ख़ुत्बे को संबोधित करते हुए हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन मौलाना सैयद यासीन हुसैन आबिदी ने माता-पिता की सेवा और उनकी रज़ामंदी, जीवनसाथी के अधिकार तथा पारिवारिक जीवन में प्रेम, दया, सम्मान और क्षमा के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि माता-पिता के बुढ़ापे में उनकी सेवा करना औलाद की वास्तविक परीक्षा है और घर को प्रेम तथा सुकून का केंद्र बनाना धार्मिक ज़िम्मेदारी है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, कानौदर, गुजरात की मस्जिद इमाम अली (अ.) में नमाज़े जुमा के ख़ुत्बे को संबोधित करते हुए हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन मौलाना सैयद यासीन हुसैन आबिदी ने माता-पिता के अधिकार, बुढ़ापे में उनकी सेवा, औलाद की ज़िम्मेदारियों, जीवनसाथी के अधिकार तथा पारिवारिक जीवन में प्रेम, सम्मान, धैर्य और क्षमा के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने क़ुरआन करीम की सूरह बनी इसराईल की आयत का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह तआला ने अपनी इबादत के साथ माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है और विशेष रूप से उनके बुढ़ापे को औलाद के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा बताया है।

उन्होंने कहा कि जब इंसान बचपन में माता-पिता का मोहताज होता है तो उनके साथ रहना और उनकी बात मानना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन असली परीक्षा उस समय शुरू होती है जब औलाद अपनी पढ़ाई पूरी करके कमाने लगती है और अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है। ऐसे समय में यह भावना पैदा होना कि अब मुझे माता-पिता की ज़रूरत नहीं है या वे मुझ पर निर्भर हैं, इंसान को घमंड और नाशुक्री की ओर ले जा सकती है।

हालाँकि जिन हाथों ने बचपन में उसे संभाला, जिन आँखों ने उसकी कामयाबी पर खुशी महसूस की और जिन कदमों ने उसे चलना सिखाया, जब वही हाथ-पैर और शरीर बुढ़ापे में कमज़ोर हो जाएँ तो उनकी सेवा और सम्मान करना ही उसकी असली परवरिश और संस्कार की परीक्षा है।

मौलाना सैयद यासीन हुसैन आबिदी ने कहा कि क़ुरआन करीम ने माता-पिता के सामने मामूली से मामूली नाराज़गी का इज़हार करने, यहाँ तक कि उन्हें “उफ़” कहने से भी मना किया है और इसके बजाय उनसे सम्मान के साथ बात करने का आदेश दिया है।

उन्होंने ध्यान दिलाया कि माता-पिता को गाली देना, डाँटना, चिल्लाना या उनका अपमान करना तो दूर की बात है, कभी-कभी इंसान बिना कुछ कहे भी अपने चेहरे के भाव, आँखों के अंदाज़ और व्यवहार से माता-पिता को तकलीफ़ पहुँचा देता है। इसलिए हर व्यक्ति को अपने व्यवहार का हिसाब करना चाहिए।

इमामे जुमा कानौदर ने रिवायतों में माता-पिता की नाराज़गी और नाफ़रमानी की कड़ी निंदा का उल्लेख करते हुए कहा कि इंसान को यह देखना चाहिए कि उसके व्यवहार से उसके माता-पिता खुश हैं या दुखी।

उन्होंने लोगों को नसीहत करते हुए कहा कि अगर माता-पिता जीवित हैं तो उनकी सेवा और क़द्रदानी को ग़नीमत समझें, उनके साथ प्रेम से पेश आएँ और अगर कभी उनका दिल दुखाया हो तो उनसे माफ़ी माँगें।

उन्होंने कहा कि माता-पिता के इंतक़ाल के बाद भी उनके अधिकार समाप्त नहीं होते। उनके लिए दुआ, सदक़ा-ए-ख़ैरात और नेक कामों के ज़रिए ईसाले सवाब किया जा सकता है। उन्होंने माता-पिता के लिए क़ुरआन में सिखाई गई दुआ की ओर भी ध्यान दिलाया कि इंसान अल्लाह से उनके लिए उसी तरह रहमत की दुआ करे, जिस तरह उन्होंने बचपन में उसकी परवरिश की।

ख़ुत्बे के दूसरे हिस्से में उन्होंने जीवनसाथी के अधिकार और पारिवारिक जीवन के तौर-तरीकों पर चर्चा करते हुए कहा कि जिस तरह माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करना ज़रूरी है, उसी तरह पत्नी और बच्चों के साथ भी प्रेम, सम्मान और अच्छे अख़लाक़ से पेश आना धार्मिक शिक्षाओं का हिस्सा है।

उन्होंने कहा कि कुछ लोग घर से बाहर दूसरों के साथ बहुत अच्छे व्यवहार से पेश आते हैं, दोस्तों के साथ समय बिताते हैं और उनके लिए अपना समय और पैसा खर्च करते हैं, लेकिन घर पहुँचने के बाद उनका व्यवहार बदल जाता है। ऐसे व्यवहार पर हर व्यक्ति को विचार करने की ज़रूरत है।

उन्होंने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.) के रिसालतुल हुक़ूक़ में बताए गए जीवनसाथी के अधिकार का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह तआला ने पति-पत्नी के रिश्ते को सुकून और आपसी लगाव का माध्यम बनाया है। इसलिए पति को अपनी पत्नी के साथ सम्मान, नरमी और स्नेह से पेश आना चाहिए।

उन्होंने कहा कि परिवार के लिए समय निकालना, उन्हें साथ लेकर घूमना, उनकी ज़रूरतों और भावनाओं का ध्यान रखना भी पारिवारिक ज़िम्मेदारी का हिस्सा है। घर का सुकून केवल आर्थिक साधनों से नहीं, बल्कि समय, प्रेम, ध्यान और सम्मान से कायम होता है।

मौलाना सैयद यासीन हुसैन आबिदी ने पति-पत्नी के बीच होने वाले मतभेदों के संबंध में धैर्य, माफ़ी और दरगुज़र की अहमियत बताते हुए कहा कि दोनों इंसान हैं और दोनों से गलतियाँ हो सकती हैं। इसलिए एक-दूसरे की हर छोटी-छोटी गलती को जमा करके बार-बार उसका हिसाब लेते रहना घर के सुकून को खत्म कर देता है।

उन्होंने क़ुरआन करीम की उस शिक्षा की ओर भी ध्यान दिलाया कि अल्लाह ने पति-पत्नी के बीच सुकून, प्रेम और दया रखी है। इसलिए घर को अदालत या दुश्मनी का केंद्र बनाने के बजाय प्रेम और दया की जगह बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि बच्चों की परवरिश में घर का माहौल बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर बच्चे अपने माता-पिता के बीच प्रेम, सम्मान, धैर्य और एक-दूसरे को माफ़ करने का व्यवहार देखेंगे तो यही गुण उनकी अपनी शख्सियत का हिस्सा बनेंगे। इसके विपरीत लगातार चीख-पुकार, अपमान और लड़ाई-झगड़े का माहौल उनकी परवरिश पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

ख़ुत्बे के अंत में उन्होंने लोगों को यह संकल्प लेने की नसीहत की कि माता-पिता के जीवित रहते उनकी क़द्र और सेवा की जाए, उनके बुढ़ापे को बोझ न समझा जाए और उनकी रज़ामंदी हासिल करने की कोशिश की जाए।

उन्होंने कहा कि माता-पिता के इंतक़ाल के बाद भी दुआ और नेक कामों के ज़रिए उनसे अपनी वफ़ादारी का इज़हार जारी रखा जाए। साथ ही अपने घरों में भी प्रेम, दया, सम्मान, सहनशीलता और एक-दूसरे को माफ़ करने की भावना को बढ़ावा दिया जाए।

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