शुक्रवार 31 जुलाई 2026 - 09:14
तारीख़ के ज़ख़्म फिर ताज़ा हो गए!

कर्बला सिर्फ़ एक शहर का नाम नहीं, बल्कि हक़, हुर्रियत, वफ़ा, ईसार और ज़ुल्म के मुक़ाबले में इस्तिक़ामत की वह अमर निशानी है, जिसने चौदह सदियों से इंसानियत को एक ज़िंदा पैग़ाम दिया है। यही वजह है कि तारीख़ के मुख़्तलिफ़ दौरों में कर्बला और अहले-बैत-ए-रसूलؐ से जुड़े मुक़द्दस मुक़ामात को निशाना बनाने की कोशिशें होती रही हैं, लेकिन हर दौर में हुसैनؑ की फ़िक्र पहले से ज़्यादा मज़बूत होकर सामने आई है।

लेखक: मौलाना तक़ी  अब्बास रिज़वी कलकत्तवी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! कर्बला सिर्फ़ एक शहर का नाम नहीं, बल्कि हक़, हुर्रियत, वफ़ा, ईसार और ज़ुल्म के मुक़ाबले में इस्तिक़ामत की वह अमर निशानी है, जिसने चौदह सदियों से इंसानियत को एक ज़िंदा पैग़ाम दिया है। यही वजह है कि तारीख़ के मुख़्तलिफ़ दौरों में कर्बला और अहले-बैत-ए-रसूलؐ से जुड़े मुक़द्दस मुक़ामात को निशाना बनाने की कोशिशें होती रही हैं, लेकिन हर दौर में हुसैनؑ की फ़िक्र पहले से ज़्यादा मज़बूत होकर सामने आई है।

तारीख़ी मआख़िज़ के मुताबिक़ पहली सऊदी रियासत के दौर में आले-सऊद के लश्कर ने 21 अप्रैल 1802 ईस्वी (18 ज़िलहिज्जा 1216 हिजरी, ईद-ए-ग़दीर के दिन) कर्बला पर हमला किया। इस हमले की क़ियादत सऊद बिन अब्दुलअज़ीज़ ने की, जबकि कुछ तारीख़ी रिवायतों के मुताबिक़ नज्द से आने वाले हज़ारों अफ़राद इस लश्कर में शामिल थे।

यह हमला ऐसे वक़्त में किया गया जब कर्बला के बहुत से मर्द हज़रात ईद-ए-ग़दीर की मुनासबत से नजफ़-ए-अशरफ़ में अमीरुल मोमिनीन हज़रत अलीؑ के रौज़ा-ए-मुबारक की ज़ियारत के लिए गए हुए थे। हमलावरों ने शहर में दाख़िल होकर हरम-ए-इमाम हुसैनؑ और मुक़द्दसात-ए-कर्बला को नुक़सान पहुँचाया। यह वाक़िया अहले-बैतؑ से मोहब्बत रखने वालों की तारीख़ का एक बेहद दर्दनाक बाब है।

1216 ईस्वी में जब आले-सऊद के लश्कर ने नजफ़ और कर्बला के मुक़द्दस मुक़ामात को निशाना बनाया, तो अहले-बैतؑ से मोहब्बत रखने वालों के दिलों पर एक गहरा ज़ख़्म लगा। आज जब कर्बला के ज़ायरीन को निशाना बनाने की कोई कोशिश होती है तो वही तारीख़ी दर्द फिर ताज़ा हो जाता है।

फ़र्क़ सिर्फ़ वक़्त और जगह का है; कल निशाना अमीरुल मोमिनीन हज़रत अलीؑ का शहर नजफ़ और हरम-ए-इमाम हुसैनؑ था, जबकि आज शहर-ए-हुसैनؑ कर्बला के ज़ायरीन हैं। मगर तारीख़ का सबक़ एक ही है कि अहले-बैतؑ की मोहब्बत को न कभी तलवारों से ख़त्म किया जा सका और न ज़ुल्म व जौर से दबाया जा सका।

कर्बला पर हमला सिर्फ़ एक शहर या एक इमारत पर हमला नहीं था, बल्कि यह उस अज़ीम फ़िक्र को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश थी जो इंसानियत को अद्ल, वफ़ा, क़ुर्बानी और ज़ुल्म के मुक़ाबले में इस्तिक़ामत का दर्स देती है। कर्बला एक जगह से बढ़कर एक मकतब है, एक ऐसी फ़िक्र है जो हर दौर में हक़ और बातिल के बीच फ़र्क़ को वाज़ेह करती है।

हुसैनؑ की मोहब्बत सिर्फ़ एक अक़ीदा नहीं, बल्कि इंसानियत, हुर्रियत, वफ़ादारी और ज़ुल्म के मुक़ाबले में डट जाने का ज़िंदा पैग़ाम है। यही वजह है कि जिन्होंने तारीख़ में कर्बला की आवाज़ को दबाने की कोशिश की, वह ख़ुद तारीख़ के सफ़हों में गुम हो गए, लेकिन हुसैनؑ का नाम और उनका पैग़ाम आज भी करोड़ों दिलों में ज़िंदा है।

यह हक़ीक़त भी क़ाबिल-ए-ग़ौर है कि कर्बला के ज़ायरीन का सफ़र हमेशा से क़ुर्बानी और इश्क़ का सफ़र रहा है। आज भी दुनिया के मुख़्तलिफ़ हिस्सों से लाखों इंसान फ़रज़ंद-ए-रसूल हज़रत इमाम हुसैनؑ का चेहल्लुम मनाने के लिए कर्बला और नजफ़ की जानिब रवाना होते हैं। यह सफ़र सिर्फ़ एक ज़ियारत नहीं, बल्कि पैग़ाम-ए-आशूरा से तजदीद-ए-अहद है; एक अहद कि ज़ुल्म के सामने ख़ामोश नहीं रहा जाएगा और हक़ व इंसाफ़ के रास्ते पर साबित-क़दम रहा जाएगा।

अरबईन-ए-हुसैनी दुनिया के सामने अम्न, इंसानियत, भाईचारे और ईसार का एक बे-मिसाल नमूना है। मुख़्तलिफ़ ज़बानों, क़ौमों और इलाक़ों से ताल्लुक़ रखने वाले इंसान एक ही मक़सद के साथ कर्बला पहुँचते हैं कि वह हुसैनؑ के पैग़ाम-ए-अद्ल और हुर्रियत को ज़िंदा रखें।

ज़ुल्म के अंधेरे कितने ही गहरे क्यों न हों, चराग़-ए-हक़ हमेशा रोशन रहता है। तारीख़ गवाह है कि इश्क़-ए-हुसैनؑ को दबाने की हर कोशिश नाकाम हुई है और आइंदा भी नाकाम रहेगी।

कर्बला, हरम-ए-इमाम हुसैनؑ और ज़ायरीन-ए-सैय्यदुश्शोहदाؑ के ख़िलाफ़ किसी भी क़िस्म की जारहियत बेहद अफ़सोसनाक और क़ाबिल-ए-मज़म्मत है। हम ऐसी हर बुज़दिलाना हरकत की शदीद अल्फ़ाज़ में मज़म्मत करते हैं और वाज़ेह करते हैं कि इश्क़-ए-हुसैनؑ को ज़ुल्म, जौर और ताक़त के ज़ोर पर ख़त्म नहीं किया जा सकता।

अस्सलामु अलैक या अबा अब्दिल्लाहिल हुसैन

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