हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,रसूल-ए-अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा स.ल.व. की पाक सीरत इंसानियत के लिए अमन, रहमत, भाईचारे और अच्छे अख़लाक़ का बेहतरीन नमूना है। आपकी शिक्षाएँ उम्मत को आपसी एकता, मोहब्बत और भाईचारे के साथ अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थामने का संदेश देती हैं।
لَّقَدْ کَانَ لَکُمْ فِی رَسُولِ اللّٰہِ أُسْوَۃٌ حَسَنَۃٌ لِّمَن کَانَ یَرْجُو اللّٰہَ وَالْیَوْمَ الْآخِرَ وَذَکَرَ اللَّہَ کَثِیرًا
निस्संदेह तुम्हारे लिए रसूलुल्लाह स.ल.व.की ज़ात में बेहतरीन नमूना-ए-हयात है, हर उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और आख़िरत के दिन की उम्मीद रखता है और अल्लाह को बहुत अधिक याद करता है।(सूरह अल-अहज़ाब: 21)
हुस्न-ए-आव्वल, ख़ल्क़-ए-आव्वल, नूर-ए-आव्वल, ख़ातम-उन-नबिय्यीन, सय्यद-उल-मुरसलीन, हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा स.ल.व. की मुबारक ज़ात अच्छे अख़लाक़ और पाकीज़ा सीरत के लिहाज़ से ऐसा रोशन आफ़ताब है, जिसकी हर झलक में हुस्न-ए-अख़लाक़ नज़र आता है।
आप स.ल.व. की पाक ज़ात में हज़रत ईसाؑ का हिल्म, हज़रत मूसाؑ का जोश और हज़रत अय्यूबؑ का सब्र पाया जाता है। आपने इस्लाम की तब्लीग़ के लिए बस्तियों और वीरानों में अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाया और मुख़ालिफ़ीन की पत्थरबाज़ी तथा तरह-तरह की कठिनाइयाँ सहन कीं। हज़रत इब्राहीमؑ की तरह वतन छोड़ा और हिजरत की, लेकिन इसके बावजूद पूरी मानवता को अमन, मोहब्बत, रहमत और सलामती का पैग़ाम दिया।
हज़रत सुलैमान की तरह दुनिया में हिकमत और इंसाफ़ की मिसाल कायम की। ग़रज़, वे तमाम ख़ूबियाँ और बेहतरीन विशेषताएँ जो पहले नबियों में पाई जाती थीं, वे सभी अपने कमाल के दर्जे में हुज़ूर-ए-अकरम स.ल.व. की ज़ात में मौजूद थीं।
आपमें हज़रत यूसुफ़ؑ जैसा हुस्न, हज़रत ईसाؑ जैसी रूहानी शक्ति और हज़रत मूसाؑ जैसा चमत्कारी हाथ है। जो ख़ूबियाँ तमाम ख़ूबसूरत लोगों में पाई जाती हैं, वे अकेले आपमें मौजूद हैं।
इस्लाम एक शाश्वत धर्म और अमर सिद्धांत है।
यह अमन व सलामती का ज़रिया और सुलह व शांति का स्रोत है। इस्लाम से पहले दुनिया के हालात बेहद खराब थे। समाज में सैकड़ों बुराइयाँ और अनगिनत ख़राब रस्में प्रचलित थीं। तौहीद की जगह शिर्क, भलाई की जगह बुराई, अमन की जगह युद्ध और न्याय की जगह ज़ुल्म व अत्याचार ने ले ली थी।
समाज में महिलाओं को कोई सम्मान प्राप्त नहीं था। बेटियों को ज़िंदा दफ़न कर दिया जाता था। छोटी-छोटी बातों पर युद्ध छिड़ जाता और वे युद्ध कई वर्षों तक चलते रहते थे। शराबखोरी, जुआ और अंधविश्वास उनकी रंग-रंग में समाए हुए थे।
इंसानियत कराह रही थी, तड़प रही थी और ऐसे मसीहा का इंतज़ार कर रही थी जो पूरी दुनिया का दर्द अपने दिल में समेट सके; जो इन जाहिलाना रस्मों, स्वयं बनाए गए धार्मिक व सामाजिक बंधनों, सांस्कृतिक और नैतिक पतन, फ़ितना-फ़साद, विध्वंस और अंधविश्वास का अंत कर सके।
ऐसी महान हस्ती की ज़रूरत थी जो ऐसी क्रांति लेकर आए जिससे अंधविश्वास समाप्त हो, जहालत और गुमराही के अंधेरों तथा ज़ुल्म व अत्याचार की ज़ंजीरों को तोड़ा जा सके और गरीबों, विधवाओं, अनाथों तथा कमज़ोरों के शोषण को रोका जा सके
आख़िरकार रब्बुल-आलमीन की रहमत जोश में आई। ज़ुल्म और बर्बरता के अंधकार में हिदायत का ऐसा सूरज उदय हुआ, जिसकी रोशनी से हर ओर उजाला हो गया।
يَا صَاحِبَ الجَمَالِ وَ يَاسَيِّدَ الْبَشَرْ
مِنْ وَجْهِکَ الْمُنِیْرِ لَقَدْ نُوِّرَ الْقَمَ
لَا یُمْکِنُ الثَّنَاءُ کَمَا کَانَ حَقَّہ
ऐ साहिब-ए-जमाल और ऐ सरवर-ए-बशर,
आपके रोशन चेहरे से चाँद भी रोशन हो गया।
आपकी प्रशंसा का वह हक़ अदा करना संभव नहीं, जिसके आप योग्य हैं।
उम्मत की एकता
अल्लाह तआला क़ुरआन-ए-मजीद में इरशाद फ़रमाता है:
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
وَاعْتَصِمُواْ بِحَبْلِ اللّهِ جَمِيعًا وَلاَ تَفَرَّقُواْ وَاذْكُرُواْ نِعْمَتَ اللّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ كُنتُمْ أَعْدَاءً فَأَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِكُمْ فَأَصْبَحْتُم بِنِعْمَتِهِ إِخْوَانًا
(सूरह आले-इमरान: 103)
और तुम सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो और आपस में फूट न डालो। और अपने ऊपर अल्लाह की उस नेमत को याद करो, जब तुम एक-दूसरे के दुश्मन थे, तो उसने तुम्हारे दिलों में मोहब्बत पैदा कर दी और तुम उसकी नेमत से आपस में भाई-भाई बन गए।
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